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डिग्रियों पर विवाद और ज्ञान की महिमा

  • प्रमोद भार्गव
    अकसर तर्क अंहकार को जन्म देता है, जो अपरिपक्व ज्ञान पर आधारित होता है। हमारे देश में प्रमाण-पत्र और उपाधि (डिग्री) आधारित शिक्षा यही कर रही है। भारत में प्रतिभाओं की कमी नहीं है, लेकिन शालेय शिक्षा कुशल-अकुशल की परिभाषाओं से ज्ञान को रेखांकित किए जाने के कारण महज कागजी काम से जुड़े डिग्रीधारी को ही ज्ञान का अधिकारी मान लिया है। जबकि परंपरा अथवा काम के प्रति श्रमसाध्य समर्पण के बूते कौशल – दक्षता हासिल कर लेने वाले राजनेता, समाजसेवी, फिल्म, टीवी व लोक कलाकार, शिल्पकार मारवाड़ी व्यापारी और किसान को अशिक्षित व अज्ञानी माना जाता है। डिग्री बनाम योग्यता जैसे विवादास्पद मुद्दे से जुड़े ऐसे मामले हाल ही में महात्मा गांधी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संदर्भ में सामने आए हैं। इसी समय विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने 23 फर्जी विश्वविद्यालय और अन्य उच्च शिक्षा संस्थानों की सूची जारी की है। क्या हम इन संस्थानों से अपेक्षा रख सकते हैं कि उनका डिग्री बांटने का आधार योग्यता रहा होगा? जिन केंद्रीय विश्वविद्यालयों को उत्तम शिक्षा देने के लिए खड़ा किया गया था, उनमें से बीते पांच साल के भीतर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा वर्ग के 19 हजार से ज्यादा छात्र बीच में ही संस्थान छोड़ गए। केंद्रीय शिक्षा राज्यमंत्री सुभाष सरकार ने हाल ही में राज्यसभा में यह जानकारी दी है। जिस देश में उच्च शिक्षा के ऐसे बदतर हाल हों,वहां के सत्ता के कर्णधार उन लोगों की डिग्रियों पर प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं, जो देश-दुनिया में अपनी महानता के बहुआयाम स्थापित कर चुके हैं।इसे उच्च डिग्रीधारियों की सोच की विडंबना ही कहा जाएगा।
    सफल टीवी कलाकार व राजनेत्री स्मृति ईरानी के संदर्भ में भी यह सवाल ने उस समय तूल पकड़ा था,जब मात्र बारहवीं कक्षा पास होने के बावजूद नरेंद्र मोदी ने उन्हें शिक्षा की सभी संभावनाओं से संबद्ध मानव संसाधन विकास मंत्री बना दिया था। उच्च शिक्षा से लेकर सभी भारतीय तकनीकी संस्थान इसी मंत्रालय के अधीन हैं। इसलिए सवाल उठाया गया था कि जो व्यक्ति खुद इंटर तक पढ़ा है, वह शिक्षा के उच्चतम मानकों को कैसे समझेगा? इस सोच में डिग्री आधारित आभिजात्यवादी मानसिकता रही थी। आधुनिक व अंग्रेजी शिक्षा की इस देन ने हमारे मस्तिष्क के दायरे को संकीर्ण किया है। इससे उबरे बिना कल्पनाशील प्रतिभाओं को उनकी मेधा के अनुरूप स्थान मिलना मुश्किल है। अब यह मुद्दा जम्मू कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा द्वारा राष्ट्रपिता महात्मा और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल द्वारा नरेंद्र मोदी की डिग्री पर उठाए सवालों पर गर्माया हुआ है। सिन्हा ने आईटीएम ग्वालियर में डॉ. राममनोहर लोहिया स्मृति व्याख्यानमाला में अकारण महात्मा गांधी शैक्षिक योग्यता पर बात करते हुए कहा कि ‘उनके पास एक भी विश्वविद्यालय की डिग्री नहीं थी। उनके पास केवल हाई स्कूल का डिप्लोमा था। उन्होंने वकालत करने के लिए अर्हता प्राप्त की थी,कोई कानूनी डिग्री उनके पास नहीं थी।’
    हालांकि देश और दुनिया ने उनका लोहा किसी कथित डिग्री से नहीं आजादी के संघर्ष और सत्य व अहिंसा के सिद्धांत से माना। इस सिद्धांत के आदर्श किसी पाठ्यक्रम की किताब से नहीं, बल्कि भारतीय दर्शन के मूल से उन्होंने आत्मसात किए थे। ‘गीता’ उनकी प्रेरणा की मुख्य आधार रही है। तत्पश्चात भी गांधी के परपोते तुषार गांधी ने जवाब देते हुए कहा कि ‘उन्होंने 10 वीं की परीक्षा राजकोट के अल्फ्रेड हाई स्कूल से उत्तीर्ण की थी।लंदन से भी दसवीं परीक्षा के समकक्ष मैट्रिकुलेशन परीक्षा पास की थी। यही नहीं लंदन विश्वविद्यालय से संबद्ध इनर टेंपल विधि महाविद्यालय से कानून की पढ़ाई की और परीक्षा उत्तीर्ण की।इसके अलावा उन्होंने लातिन और फ्रेंच में दो डिप्लोमा हासिल किए थे।’ यानी या तो एमटेक होने के बावजूद सिन्हा का ज्ञान अधूरा है या वे पूर्वग्रही मानसिकता से ग्रस्त हैं। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिग्री मांगने पर गुजरात उच्च न्यायालय ने अरविंद केजरीवाल पर 25 हजार का जुर्माना लगा दिया।तब भी उन्होंने एक बार फिर मोदी की शैक्षिक योग्यता पर प्रश्न उठाते हुए कहा कि ‘आज देश के सामने एक ही प्रश्न है कि क्या इक्कीसवीं सदी में देश के प्रधानमंत्री पढ़े लिखे होना चाहिए या नहीं? यदि पीएम पढ़े होंगे तो कोई बहलाकर कहीं भी उनसे हस्ताक्षर नहीं करा पाएगा।’ केजरीवाल वही मुख्यमंत्री हैं,जिनके सरकार के शिक्षा मंत्री शराब नीति घोटाले में और सत्येंद्र जैन मनी लांड्रिंग के आरोप में दिल्ली की तिहाड़ जेल में हैं। इस सिलसिले में भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने ठीक ही कहा है कि सत्येंद्र और मनीष से तो दस्तखत किए जाएंगे, लेकिन केजरीवाल खुद केवल पढ़ेंगे और भ्रष्टाचार कराएंगे, ताकि कोई दूसरा निपटे।’खैर इस लेखक का उद्देश्य डिग्री से योग्यता की तुलना करना नहीं है, बल्कि जन्मजात योग्यता का मूल्यांकन करना है। कुछ दिन पहले खबर आई थी कि मंगलुरू के किसान गणपति भट्ट ने नारियल और सुपारी के पेड़ों पर चढ़ने वाली बाइक बनाने में सफलता प्राप्त की है। इसी तरह द्वारिका प्रसाद चौरसिया नाम के एक युवक ने पानी पर चलने के लिए जूते बनाए हैं। उत्तरप्रदेश के इस युवक की इस खोज के पीछे की कहानी थी कि उसने सुन रखा था,साधु संत साधना के बाद पानी पर चल सकते हैं। द्वारिका ने तप का आडंबर तो नहीं किया, लेकिन अपनी कल्पनाओं को पंख देकर एक ऐसा जूता बनाने की जुगाड़ में जुट गया, जो पानी पर चल सके। इस तकनीक को इजाद करने में वह सफल भी हुआ और पानी पर चलने वाले एक जोड़ी जूतों का आविष्कार कर लिया। इन दोनों खोजों को ‘नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन‘ ने मान्यता भी दी है। इस प्रतिष्ठान के प्रोफेसर अनिल गुप्ता और उनकी टीम देश में मौजूद ऐसे लोगों को खोज रहे हैं, जो कम मूल्य के ज्यादा उपयोगी उपकरण बनाने में दक्ष हैं।