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रामजन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के पहले चरण का कार्य पूरा, बुनियाद से बयां हो रही भव्यता

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अयोध्या। रामनगरी अयोध्या से राम भक्तों के लिए अच्छी खबर आई है। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का काम तेजी से आगे बढ़ रहा है। राम मंदिर निर्माण के पहले चरण का कार्य पूरा हो गया है। रामजन्मभूमि पर बन रहे मंदिर की भव्यता बुनियाद से ही बयां हो रही है। इसकी तस्दीक गुरुवार को हो रही थी, जब रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपतराय मीडिया को आमंत्रित कर मंदिर निर्माण की गतिविधियों की स्थलीय जानकारी दे रहे थे। न्यास के मुताबिक दिसंबर 2023 तक मंदिर निर्माण का काम पूरा हो जाने की उम्मीद है।


रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपतराय प्रांगण में कुछ फासले पर थे और उनसे मुखातिब होने के पूर्व नजर भूमि की सतह पर उभर रही एक विशद-विस्तीर्ण चट्टान पर जाकर ठहर जा रही थी। हालांकि अगले पल यह समझते देर नहीं लगी कि यह चार सौ गुणे तीन सौ वर्ग फीट में तैयार हो रही राम मंदिर की नींव है और जिसे शिलाओं के चूर्ण, बारीक शिलाखंडों और सीमेंट के मिश्रण से कृत्रिम चट्टान के रूप में ढाला गया है। यह चट्टान 12 से 14 मीटर तक ऊंची है। हालांकि अभी यह नींव आगे के निर्माण के लिए तैयार नहीं हुई है।


विशाल चट्टान रूपी नींव को अगले दो-तीन दिनों में अंतिम स्पर्श दिए जाने के बाद 1.5 मीटर ऊंची कंक्रीट की एक और परत चढ़ाई जाएगी। इसके बाद अगले चरण का निर्माण शुरू होगा और यह भी सतह की नींव की तरह व्यापकता की परिचायक होगा। यह प्रस्तावित मंदिर की आधारभूमि होगी, जिसे स्थापत्य की भाषा में प्लिंथ कहा जाता है। आधारभूमि की सतह 16 फीट मोटी होगी और इसे मिर्जापुर तथा बंसीपहाड़पुर की शिला पट्टिकाओं के साथ संगमरमर से निर्मित किया जाएगा। आधारभूमि निर्माण की तैयारियां मौके से बखूबी परिभाषित होती हैं।

नींव के लिए विशाल झील की तरह खोदी गई भूमि के कुछ ही फासले पर आधारभूमि के लिए लाई गईं शिला पट्टिकाएं स्वयं छोटे से पहाड़ की आकृति में डटी दिखती हैं, तो विस्तृत चट्टान रूपी नींव के सुदूर दूसरे छोर पर एक छोटे किंतु सम्मानित प्रतीत हो रहे स्तंभ पर भगवा ध्वज लहराता नजर आता है। इसके बारे में स्वयं चंपतराय स्पष्टीकरण देते हैं। यह बताते हुए कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत वर्ष पांच अगस्त को इसी स्थल पर भूमिपूजन किया था और इसी स्थल पर रामलला का विग्रह युगों से विराजमान रहा है। भव्य मंदिर और दिव्य गर्भगृह निर्माण के साथ रामलला पुन: इसी स्थल पर स्थापित किए जाएंगे। इसी के साथ ही वे दोहराते हैं, दिसंबर 2023 तक मंदिर निर्माण के साथ यहां बनने वाले गर्भगृह में रामलला का दर्शन संभव हो सकेगा।

चंपतराय ने मंदिर निर्माण की गति को लेकर भी आश्वस्त किया। कहा, बरसात और मौसम की अन्यान्य प्रतिकूलता के बावजूद मंदिर निर्माण की प्रक्रिया अपेक्षित गति से आगे बढ़ रही है। निर्माण की प्रक्रिया में सहयोगी कार्यदायी संस्थाओं के अधिकारियों एवं कर्मचारियों को प्रशंसित करते हुए तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव कहते हैं, नींव के निर्माण में दो-दो, तीन-तीन शिफ्टों में लगातार चौबीसो घंटे काम चलता रहा है और आगे भी निर्माण की ऐसी ही गति बनी रहेगी। इस दौरान तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के सदस्य डॉ. अनिल मिश्र, एक अन्य सदस्य एवं निर्मोही अखाड़ा के महंत दिनेंद्रदास, विहिप के प्रांतीय प्रवक्ता शरद शर्मा सहित मंदिर निर्माण की कार्यदायी संस्था एल एंड टी के प्रोजेक्ट मैनेजर विनोद मेहता एवं टाटा कंसल्टेंट इंजीनियर्स के प्रोजेक्ट मैनेजर विनोद शुक्ल भी मौजूद रहे।

बेजोड़ होगी प्रस्तावित मंदिर की भव्यता

रामजन्मभूमि पर प्रस्तावित मंदिर की भव्यता बेजोड़ होगी। 360 फीट लंबा, 235 फीट चौड़ा एवं 161 फीट ऊंचा मंदिर तीन तल का होगा। भूतल में 160, प्रथम तल में 132 एवं द्वितीय तल में 74 स्तंभ लगेंगे। मंदिर में एक मुख्य शिखर सहित पांच उप शिखर एवं इतने मंडप भी होंगे। मंदिर में यूं तो एक मुख्य द्वार तथा उप द्वारों सहित कुल 12 द्वार होंगे। भव्य मंदिर को आकार देने की तैयारियों के साथ स्वयं चंपतराय भी भव्यता से अभिभूत नजर आते हैं। बताते हैं, अकेले मंदिर ही पौने तीन एकड़ तथा मंदिर का संपूर्ण परकोटा 6.5 एकड़ का है। यद्यपि वे राम मंदिर सहित संपूर्ण 70 एकड़ के रामजन्मभूमि परिसर में प्रस्तावित सांस्कृतिक उपनगरी की ओर गौर कराने की जरूरत नहीं समझते, जो कल्चरल कैपिटल ऑफ दी वर्ल्ड के रूप में रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की ओर से प्रस्तावित है।

मिटने के दर्द के साथ राम मंदिर के काम आने का गौरवबोध भी

गुरुवार का दिन उन मंदिरों की टोह लेने का अवसर था, जो जनवरी 1993 में अधिग्रहण के साथ अपना स्वत्व, अपनी पहचान और अपने लोगों से वंचित हो गए थे। हालांकि नौ नवंबर 2019 को रामलला के हक में आए सुप्रीम फैसले के साथ ही यह तय हो गया था कि अधिग्रहण के चलते पहले से ही अपना वजूद खो रहे मंदिरों की भूमि राम मंदिर के निर्माण में प्रयुक्त होगी। इसके बावजूद कभी रामनगरी की पहचान से जुड़े रहे अंतिम श्वांस गिनते इन मंदिरों को देखना मार्मिक था।

राम मंदिर की नींव जिस भूक्षेत्र पर विस्तीर्ण दिखती है, उसे पहचानना कठिन होता है। हालांकि एक कोने में सिमटे भवन के आंशिक हिस्से से स्पष्ट होता है कि मंदिर की नींव रामजन्मभूमि के मूल परिसर सहित मानस भवन और साक्षी गोपाल मंदिर की सतह पर निर्मित है। नींव से लगे अन्य भूखंड से प्राचीन जन्मस्थान की याद ताजा होती है, तो दूसरी ओर फकीरेराम मंदिर, कौशल्या भवन एवं केकयी कोपभवन भी बैरीकेडिंग के पीछे से झांकते नजर आते हैं, जो यह बताते हैं कि कुछ दिनों बाद उनका अस्तित्व सदा के लिए खत्म हो जाएगा। हालांकि इस समर्पण में राष्ट्रीय अस्मिता के परिचायक राम मंदिर में प्रयुक्त होने का गौरवबोध भी बयां होता है।

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