10 में सिर्फ तीन युवा ही जानते हैं, क्या था आपातकाल का काला दौर

Share on facebook
Facebook
Share on twitter
Twitter
Share on linkedin
LinkedIn
Share on pinterest
Pinterest
Share on pocket
Pocket
Share on whatsapp
WhatsApp

आपातकाल की वर्षगांठ पर भोपाल के युवाओं से बात की विशाखा और नीतिका ने

भोपाल। स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक काला अध्याय आपातकाल का आया था, जिसमें लाखों लोगों को अकारण जेल में डाल दिया गया था। संविधान बदल दिया गया था। समाचार-पत्रों पर सेंसरशिप लगा दी गई थी, लेकिन आज के युवा आपातकाल के इस काले अध्याय को बहुत कम जानते हैं। आज शनिवार 25 जून को आपातकाल की वर्षगांठ है। 25 जून 1975 को भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री और कांग्रेस की नेत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू कर दिया था। आपातकाल लगाकर जनता के मौलिक अधिकार छीन लिए थे। विपक्षी नेताओं को जेलों में डाल दिया गया। न्यायपालिका पर अंकुश लगा दिया गया था। ‘स्वदेश ने आज के युवाओं और कॉलेज के छात्रों से आपातकाल के संबंध में प्रश्न किया। काफी संख्या में छात्रों से आपातकाल के संबंध में प्रश्न पूछने पर चौकाने वाली जानकारी सामने आई। जानकारी के अनुसार औसतन दस छात्रों में सिर्फ तीन छात्रों को ही आपातकाल की घटना की पूरी जानकारी है। कुछ छात्रों ने सोशल मीडिया, किताबों में आपातकाल के संबंध में कुछ पढ़ा है, लेकिन पूरी जानकारी नहीं है। जबकि आज के युवाओं में से काफी संख्या ऐसे युवाओं की है, जिनके घर, परिवार और आसपास के लोग आपातकाल में जेल की सलाखों में रहे हैं। काफी यातनाएं सही हैं।

आइए जानते हैं,मिडिया के छात्रों से आपातकाल के संबंध में उनके विचार

सोशल मीडिया से मिली जानकारी

हां, मैने आपातकालीन के बारे में सुना हैं। सोशल मीडिया पर मैंने इस बारे में जानकारी प्राप्त की। मुझे पता चला की 1975 में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपातकाल लगाया था, जो की मुंबई में होने वाले दंगों की वजह से शुरू हुआ था। हिंदुस्तान में सबसे ज्यादा आर्थिक समस्या उसी समय पर हुई थी। गरीबी और बेरोजगारी उस समय पर बहुत बढ़ गई थी। आपातकालीन लगाने से हमारी दुनिया में छवि खराब हुई थी। लोगों ने मान लिया था की सरकार से देश संभाला नही जा रहा हैं। वापस छवि अच्छी करने के लिए आर्थिक रूप से मजबूत होना होगा और जब कोई अच्छा नेता, जैसे-अटल बिहारी वाजपेई या नरेंद्र मोदी। नागरिक अभी भी जागरूक नहीं हैं और देश में आए दिन होने वाले दंगे होते हुए देख कर लगता हैं कि इतिहास दोहराया जा सकता हैं। क्योंकि पहले भी आपातकालीन लगाने का कारण लोकतंत्र ही था। अगर सरकार कड़े फैसले ले तो यह दोहराया नहीं जा सकता हैं। समाचार से लोग भड़क जाते हैं और कई बार समाचार की सोच को है अपनी सोच बना लेते हैं। इस लिए समाचार से जागरूकता नहीं बड़ी हैं। मुझे लगता हैं की यह दोहराया जा सकता हैं। मैने कभी इस बारे में पाठ्य पुस्तकों में नहीं पढ़ा हैं। नागरिक अधिकारों के बारे में 2 प्रतिशत नागरिक ही जागरूक हैं।

ये भी पढ़ें:  भारतीय नौसेना ने आजादी के अमृत महोत्सव पर ट्राई सर्विसेज स्पोर्ट्स मीट का आयोजन किया

शुभम, उम्र-24

ऑनलाइन लेख पढ़कर जाना
हां, मैंने इस बारे में सुना हैं। समाचार से मुझे इस मुददे के बारे में जानकारी हुई। पूरी जानकारी मेने गूगल पर दिए गए लेख से प्राप्त की। आपातकालीन का मुख्य कारण था कि जनता अपने प्रधानमंत्री से नाराज थी और इंदिरा गांधी जो की उस वक्त की प्रधानमंत्री थीं, वह अपनी तानाशाही चलाना चाहती थीं। अगर यह परिस्थिति दोबारा आए और तब नेता अपनी गलती मानले तो छवि वापिस ठीक हो सकती हैं। हां, अब लोग पहले से जागरूक हैं। हां समाचार से जानकारी बड़ी हैं, क्योंकि आम आदमी हर जगह जाके सही जानकारी प्राप्त नहीं कर पाता हैं। नेता पर निर्भर करता है, कि यह दोहराया जा सकता है या नहीं। पाठ्य-पुस्तकों में इसका कोई वर्णन नहीं किया गया है। नागरिक अधिकारों की जानकारी सिर्फ 20 प्रतिशत नागरिकों को हैं और बाकी के लोगो को इसकी सही जानकारी नहीं हैं।

ये भी पढ़ें:  'गालीबाज' नेता श्रीकांत त्यागी मेरठ से गिरफ्तार, सोसायटी में महिला से की थी बदसलूकी

अवनीश, छात्र, उम्र-20

पिता से मिली जानकारी
हां, मैंने आपातकालीन के बारे में अपने पापा से सुना है। उन्होंने बताया कि आपातकाल में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी हर चीज के फैसले लेती थीं, कोई पार्टी की सरकार नही थी। हां इससे देश की छवि धूमिल हुई, क्योंकि लोगों ने प्रधान मंत्री के बारे में गलत छवि बना ली थी। इस छवि से मुक्त होने के लिए जो नेता हम चुने उस में इतनी क्षमता होनी चाहिए कि यहां दोबारा ना हो। हां, समाचार को इस मुददे के बारे में जानकारी देने का श्रेय जाता हैं। नौजवान जागरूक हैं, इस लिए यह गटना धोराई नहीं जा सकती। पाठ्य पुस्तकों से कभी इसकी कोई जानकारी नहीं मिली मुझे। 85 प्रतिशत नागरिक, नागरिकता अधिकारों प्रति जागरूक हैं।

गुंजन, उम्र-26

किताबों में और अपने शिक्षकों से मिली जानकरी

हॉ , मैंने आपातकाल के बारे में सुना है आपातकाल के बारे में सर्वप्रथम मैंने किताबों में और अपने शिक्षकों से इस बारें मेॆ बताया कि यह कैसे लगता है क्यों लगता हेै और किस परिस्थितियों मे यह लगाया जाता है । आपातकाल के दौरान आम-नागरिकों के अधिकारो को खारिज कर दिया जाता है , उनका कोई मूल्य नहीं होता इसलिए मुझे नहीं लगता आपातकाल अब कोई लगाना चाहेगा । आपातकाल के समय देश और साथ ही साथ लोगो का काफी नुकसान होता है क्योंकि इस समय कार्य ढप पड़ जाता है और कई दफा तो ये होता है कि अगर लोग बाहर निकलते है सामुहिक रूप से तो उनको पुलिस पकड़ ले जाती है और साथ ही साथ बिना किसी जुर्म के उनको जेल में डाल देती थी ।

ये भी पढ़ें:  पीवी सिंधु ने बैडमिंटन के विमेन्स सिंगल्स में जीता गोल्ड मेडल, फाइनल में कनाडा की शटलर को हराया


सुचि तिवारी उम्र -23


स्कूल से मिली जानकारी

मैंने अपनी स्कुली शिक्षा के दौरान आपातकाल के बारें में अपने शिक्षकों से सुना और पढ़ा था । अगर कहा जाए तो आपातकाल ने पूरे संविधान में और भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों पर विश्व विरादरी पर एक धब्बे का तो काम किया हैं । क्योंकि आपातकाल के समय हुआ यह था कि हमारे देश के सभी लोकतांत्रिक मूल्यों, अधिकारों को एकाएक बंद कर दिया गया। तो जाहिर सी बात है कि भारत का जो लोकतांत्रिक इतिहास बहुत पुराना है और उस पर आपातकाल लगाना राष्ट्र पर धब्बे लगाने के समान ही है। आज का समय मीडिया का हैं। हो सकता है सभी लोग तकनीकी रूप से जानकारी नहीं रखते हो लेकिन भोडे बहुत लोग जानकारी जरूर रखते हैं। देश में अब आपातकाल लगाए जाने की संभावना बहुत मुश्किल हैं। आपातकाल के दुष्परिणामों को देखते हुए अब संविधान में भी कई बार संशोधन किए गए हैॆं कि अब एकाएक आपातकाल लग नहीं सकता हैं।

आनंद कौशल उम्र -28

 

Never miss any important news. Subscribe to our newsletter.

Leave a Reply

Recent News

Related News