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भारत बायोटेक 70 करोड़ कोवैक्सिन के डोज हर साल बनाएगी: उत्पादन बढ़ाने के लिए सरकार से मिलेंगे डेढ़ हजार करोड़

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हैदराबाद। देशभर में बढ़ते कोरोना केस के बीच एक अच्छी खबर आई है। भारत बायोटेक ने कोवैक्सिन का उत्पादन का फैसला किया है। कंपनी अब हर साल वैक्सीन के 70 करोड़ डोज तैयार करेगी। कंपनी ने अपने हैदराबाद और बेंगलुरु के कई प्लांट में वैक्सीन का प्रोडक्शन बढ़ाना शुरू कर दिया है। उन्हें मैक्सिमम लिमिट तक उत्पादन पहुंचाने में दो महीने का समय लगेगा। कंपनी के पास ग्लोबल कंपनियों के साइज की प्रोडक्शन कैपेसिटी है। वित्त मंत्रालय ने कोवैक्सिन का प्रोडक्शन बढ़ाने के लिए कंपनी को 1,567.50 करोड़ रुपए एडवांस देने का ऐलान किया है।

हर महीने तैयार की जाएंगी 5.35 करोड़ वैक्सीन

कंपनी ने कहा कि वह जुलाई से हर महीने 5.35 करो? वैक्सीन तैयार करना शुरू कर देगी। कंपनी इनएक्टिवेटेड वैक्सीन बनाती है। इस तरह की वैक्सीन सुरक्षित होती है, लेकिन उसमें काफी जटिलता होती है। इसको तैयार करना भी महंगा पड़ता है। इसलिए लाइव वायरस वैक्सीन के मुकाबले उनका उत्पादन कम होता है।

नई टेक्नोलॉजी के कारण तेजी से प्रोडक्शन बढ़ा पाई कंपनी

सरकार ने दो तरह की वैक्सीन का इस्तेमाल करते हुए जनवरी से वैक्सीनेशन अभियान शुरू किया था। इसमें से एक भारत बायोटेक की कोवैक्सिन है। बता दें कि वैक्सीन की उत्पादन क्षमता बढ़ाने में काफी समय और करोड़ों रुपए लगते हैं। इसके बाद भी भारत बायोटेक ने कम समय में कोवैक्सिन की उत्पादन क्षमता तेजी से बढ़ा ली है। इसकी एक बड़ी वजह ये है कि कंपनी के पास खास तौर पर तैयार बीएसएल-3 प्लांट है। भारत में यह अपनी तरह का पहला मैन्युफैक्चरिंग प्लांट है, जिसे कंपनी की जरूरत के हिसाब से बनाया गया है। इसमें ज्यादा शुद्धता वाली इनएक्टिवेटेड वैक्सीन मैन्युफैक्चर करने, टेस्ट करने और रिलीज करने की क्षमता है।

दूसरे देशों के पार्टनर भी तलाश रही है कंपनी

कंपनी दूसरे देशों के पार्टनर भी तलाश रही है, ताकि वैक्सीन का प्रोडक्शन तेजी से बढ़ाया जा सके। इन कंपनियों के पास कंप्लीट बायोसेफ्टी के साथ बड़े पैमाने पर बेचने लायक इनएक्टिवेटेड वायरल वैक्सीन बनाने का अनुभव है। कंपनी ने कहा है कि उसके पास कैपेसिटी के हिसाब से वैक्सीन में इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल और पैकेजिंग मटेरियल उपलब्ध है।

इनएक्टिवेटेड वैक्सीन क्या होती है?

इनएक्टिवेटेड वैक्सीन में डेड पैथोजेनिक (मृत रोगजनक) होते हैं। ये किसी इंसान की बॉडी में जाकर अपनी संख्या नहीं बढ़ाते। हमारा शरीर इसे बीमारी का बाहरी हमला ही मानता है और इसके खिलाफ एंटीबॉडी बनाना शुरू कर देता है। इससे बीमारी का कोई खतरा नहीं होता है।

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