Home अमृत महोत्सव तब अखबार सिर्फ कागज और स्याही का खेल नहीं था

तब अखबार सिर्फ कागज और स्याही का खेल नहीं था

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‘अपनी विचारधारा पर अविचलित रहते हुए सर्वप्रिय होना कोई राजेन्द्रजी से सीखे।’ ‘हमारी आवाज’ को जन जन तक फ़ैलाने और फिर उसे ‘स्वदेश’ की आवाज़ बनाने में राजेन्द्रजी का योगदान पत्रकारिता के इतिहास में मील का पत्थर ही कहा जाएगा। एक साधारण से स्थानीय समाचारपत्र को राष्ट्रीय पहचान दिलाने के साथ ही उसे पत्रकारिता का ऐसा स्कूल बनाया जहां कलम पकडऩे वाले नवोदित छात्रों ने एक दिन देश के जाने माने पत्रकारों में अपनी धाक जमा दी।

अपनी विचारधारा पर अविचलित रहते हुए सर्वप्रिय होना कोई राजेन्द्रजी से सीखे। प्रखर राष्ट्रवाद को समर्पित समाचारपत्र का सम्पादकीय कक्ष सभी विचारधाराओं के ध्वजवाहकों का स्वागत कक्ष बन सकता है, यह राजेन्द्र जी के कार्यकाल में ही देखा गया। उनकी मधुर मुस्कान और आत्मीय व्यवहार के सामने समस्त वैचारिक मतभेद तिरोहित हो जाते थे।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र के रूप में जाना जाने वाला अखबार मार्क्सवादी नेता बादल सरोज, शैली शैलेन्द्र, कांग्रेसी भगवान सिंह यादव और समाजवादी विष्णुदत्त तिवारी जैसों को भी अपना घर सा लगता था तो राजेन्द्रजी के अपनेपन के ही कारण। हमारी तो शामें ही स्वदेश परिसर में कटतीं थीं। सम्पादक के नाम पत्र, फि़ल्म समीक्षा से ले कर ‘सांची कहौं’ वहीं लिखना सीखा। किस प्यार से वह मांजते चले गए कि कपड़े का एक छोटा सा दुकानदार अपने आपको व्यंग्यकार समझ कर इतराने लगा और उसकी पहचान ही ‘सांची कहौं’ वाले राज चड्ढा हो गई।

ग्वालियर में राजेन्द्र शर्माजी का कार्यकाल स्वदेश ही नहीं, इस अंचल की पत्रकारिता का स्वर्णयुग था। सीमित संसाधनों में भी ‘स्वदेश’ ग्राहक संख्या ही नहीं, अपनी विश्वसनीयता, प्रमाणिकता, निष्पक्षता और लोकप्रियता की दृष्टि से भी प्रथम पायदान पर था। अनेक अवसरों पर स्वदेश ने खोजी पत्रकारिता के बल पर तत्कालीन सरकारों को मुश्किल में डाल दिया था। काला चना घोटाला, तेंदूपत्ते की कालाबाज़ारी, दूषित पेयजल की सप्लाई आदि ज्वलन्त विषयों को सबसे पहले और प्रभावी तरीके से उठाकर उसने अपने पत्रकार धर्म का निर्वाह किया था।

एक परिवार रहा ‘स्वदेश’
बोर्ड की परीक्षाओं में चल रही धांधली और नकल को उजागर करने के लिए आने वाले पेपर (परीक्षा पत्र) को स्वदेश ने एक दिन पहले ही छाप कर देश भर में तहलका मचा दिया था। ‘स्वदेश’ सचमुच एक परिवार था आज के मीडिया की तरह औद्योगिक घराना नहीं। अपने स्टॉफ से जो आत्मीयतापूर्ण व्यवहार राजेन्द्रजी का था, वह शायद ही कहीं देखने में आया हो। साधारण प्रूफ रीडर भी उनके परिवार का ही सदस्य था।

काम ‘स्वदेश’ का हो अथवा उसकी निजी समस्या से सम्बंधित, रात के 2 बजे भी उसे अपने प्रधान संपादक को नींद से उठाने का अधिकार प्राप्त था। बीमारी हो या बेटी की शादी, राजेन्द्र भाई साहब के रहते उसे कोई चिंता नहीं थी। तब अखबार सिफऱ् कागज़ और स्याही का खेल नहीं था, उसमें स्नेह, पसीना और खून सब का सांझा था। राजेन्द्र भाई साहब! एक विचारक,एक स्वयंसेवक,एक मार्गदर्शक, एक अभिभावक और सबसे बढ़कर एक आदर्श मित्र के नाते हम सब ग्वालियर वाले आपको बहुत याद करते हैं।

  • राज चड्ढा, व्यंग्यकार व सामाजिक कार्यकर्ता, ग्वालियर
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