Home अमृत महोत्सव उनका बड़प्पन और मेरा हासिल

उनका बड़प्पन और मेरा हासिल

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उम्र सीढिय़ाँ चढ़ती रहीं, मन के मौसम भी बदलते रहे पर तजुरबों में घुल गए वो लम्हे अब भी महकते हैं जो जि़ंदगी के लंबे सफऱ में पहली पादान बने थे। सच्चे कर्मयोगियों ने भला कब अपनी साधना के दिन गिने हैं! लेकिन समय और समाज की आँखों ने उनके पुरूषार्थ को कभी-भी अनदेखा नहीं किया। उनकी सृजन-संपदा का लेखा-जोखा लिए वक़्त के किसी मोड़ पर फिर आवाज़ें अपना घेरा बड़ा करती हैं और कृतज्ञता के रसभीने बोल झरने लगते हैं। हिन्दी पत्रकारिता के आखर जगत में उनके नाम, काम और पिचहत्तर बरसों के बीच फैली पहचान को इसी सदाशयता के साथ याद किया जा सकता है। एक शब्द शिल्पी के रूप में उनके हस्ताक्षर राजेन्द्र शर्मा के नाम से पाठकों तक पहुँचे लेकिन मुझ अकिंचन के होठों पर एक अख़बार का संपादक ‘भाई साब के संबोधन के साथ बरसों बाद भी वही अनुराग लिए ठहरा है। इस ठहराव के साथ उनकी सौम्य आभा भीतर तक तैर जाती है। आदर उमड़ आता है। आभार के साथ माथा झुक जाता है।


….ये नब्बे के दशक के आखिऱी साल थे। साहित्यिक-सांस्कृतिक रुझानों और उन्हीं के साथ जुड़े कुछ अनगढ़ सपनों को संजोये अपने निमाड़ जनपद (खंडवा) से निकलकर मैं भोपाल का वाशिंदा बन गया था। पहली ही नजऱ में इस शहर के सांस्कृतिक पर्यावरण ने सम्मोहित कर लिया था। गतिविधियों में आवाजाही बढ़ी तो साहित्य और कलाओं की विभूतियों से परिचय और अपनापा भी बढ़ा। आकाशवाणी के लिए बतौर उद्घोषक, गायक और वार्ताकार सक्रियता शुरू हुई। उन्हीं दिनों हिन्दी भवन की ‘अन्तरंग’ काव्य गोष्ठी में अग्रणी आलोचक और कालांतर में भारतीय ज्ञान पीठ, दिल्ली के निदेशक डा. प्रभाकर श्रोत्रिय से भेंट हुई।

उन दिनों वे हिन्दी भवन से ही प्रकाशित राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की पत्रिका ‘अक्षरा’ का संपादन कर रहे थे। उन्हें एक युवा संपादकीय सहयोगी की ज़रूरत थी और उन्होंने इस भूमिका के लिए मुझे चुन लिया। नियति का निराला खेल कि मुझे अनायास ही साहित्यिक पत्रकारिता का वरेण्य गुरू श्रोत्रियजी के रूप में मिल गया। ‘अक्षरा’ में काम करते हुए मेरे लिए लेखन, संपादन और संपर्कों का नया क्षितिज खुला।

श्रोत्रियजी ने जब बहुत नज़दीक से मेरी साहित्यिक-सांस्कृतिक अभिरूचियों को जाना तो एक दिन हितैषी भाव से सलाह दी- ‘विनय, तुममें एक गंभीर सांस्कृतिक पत्रकार बनने की संभावना मैं देख रहा हूँ। भोपाल कला-संस्कृति के प्रमुख गढ़ के रूप में देश-दुनिया के नक़्शे पर उभर रहा है। तुम्हें इस दिशा में अपने क़दम बढ़ाना चाहिए। मेरा अनुमान और आशीष है कि तुम बड़े यश के भागी बनोगे! बस, रास्ते से विचलित न होना।’ संयोग देखिए कि उन्हीं दिनों वरिष्ठ साहित्यकार डा. देवेन्द्र दीपक से भी हिन्दी भवन में ही परिचय हुआ। उन्होंने भी पूरी आत्मीयता और सहमति प्रकट की।

भोपाल के मीडिया से उन दिनों मेरा कोई राब्ता न था। सवाल यह कि पहल कहाँ, कैसे की जाए? तब दीपकजी की सलाह पर प्रेस कॉम्प्लेक्स के ‘स्वदेश भवन’ गया। वो जाड़े की गुनगुनी दोपहर थी। इमारत में प्रवेश करते ही सामने एक सुन्दर और व्यवस्थित से कमरे में सौम्य-सुदर्शन और सुगंभीर छवि से मंडित व्यक्तित्व पर निगाहें ठिठक गयी।

यह संपादक का कक्ष था जिसके दरवाज़े खुले थे। मन ने कहा कि इस कमरे में आसानी से पहुँचा और संपादक से मिला जा सकता है। यही हुआ। अभिवादन, अपना परिचय, मिलने की वजह और डा. दीपक तथा श्रोत्रियजी का संदर्भ देते हुए स्वदेश के प्रधान संपादक से इस पच्चीस वर्षीय युवक की यह पहली और सहज भेंट थी। वही राजेन्द्र शर्मा मेरे सामने थे जो कुछ अरसा पहले ही मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा की कुकड़ेश्वर यात्रा पर अपना बेबाक, निडर और तथ्यात्मक संपादकीय ‘पटवाजी, यह ठीक नहीं’ लिखकर पूरे देश में चर्चित हो गये थे। मेरे जेहन में भी राजेन्द्र शर्मा का यही संदर्भ था। लेकिन ‘उस संपादकीय’ में आद्योपांत आक्रामकता का जो ताप था उससे निर्मित पूर्वाग्रही छवि से बिलकुल अलहदा उपस्थिति मेरे सामने थी।

मंद स्मित, विनम्र और सादगी की महिमा से आच्छादित इस शख्स ने संक्षिप्त संवाद किया और सांस्कृतिक संवाददाता के रूप में मेरी नियुक्ति कर दी। कहा कि शाम को 6 बजे के बाद स्थानीय संपादक पोतदारजी (सूरज पोतदार) और समाचार प्रमुख रामभुवनसिंह कुशवाह से मिलकर काम शुरू कर दो। शाम को नियत समय पर फिर स्वदेश कार्यालय पहुँचा। पारिवारिक सहकार का माहौल था। पोतदारजी को दोपहर में राजेन्द्रजी से हुई मुलाक़ात का हवाला दिया। अत्यंत प्रसन्नता के साथ पोतदारजी ने चाय पिलाकर मेरा स्वागत किया।

संपादकीय विभाग में मौजूद रामभुवनसिंह कुशवाहा, अनिल साधक, ओ.पी. श्रीवास्तव, राकेश दुबे, रमेश ठाकुर, सुरेश शर्मा, प्रदीप जायसवाल और रमेश दुबे से मेरा परिचय करवाया। यह स्वदेश के भोपाल संस्करण में सांस्कृतिक संवाददाता की पहली आमद थी। अगले दिन से भारत भवन, रवीन्द्र भवन में होने वाली नियमित सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और छोटे सभागारों तथा लेखकों के घर होने वाली साहित्यिक कवि गोष्ठियों की रिपोर्टिंग और उन पर समीक्षात्मक टिप्पणियों का सिलसिला शुरू हो गया।

मेरे उत्साह और सांस्कृतिक समाज तथा पाठकों से मिले बेहतर प्रतिसाद को देखते हुए राजेन्द्रजी ने ‘स्वदेश’ में कला की ख़बरों का पृष्ठ निश्चित कर दिया। खजुराहो और तानसेन समारोह जैसी गतिविधियों पर पूरे-पूरे पृष्ठ के फीचर्स प्रकाशित होने लगे। कला-साहित्य की विभूतियों के साक्षात्कारों की श्रंखला शुरू हुई। विशेषांक संयोजित हुए।

‘स्वदेश’ की सांस्कृतिक पहचान के बढ़ते दायरे से प्रसन्न होकर राजेन्द्रजी ने मुझे कला-संस्कृति का एक पूरा साप्ताहिक पृष्ठ ही दे दिया। मुझे याद है, उन दिनों गुणी चित्रकार धु्रव वानखेड़े पृष्ठों की साज-सज्जा (लेआउट) आदि के लिए ‘स्वदेश’ से जुड़ गये थे। उनके संयोजन में कला-संस्कृति का यह पृष्ठ और भी निखर आता था। शहर की गतिविधियों से वाबस्ता होकर मैंने राजेन्द्रजी के बौद्धिक कद को भी कऱीब से जाना।

जब मुझसे कहा-लेखनी को और निखारो

एक प्रयोग ‘सांध्य स्वदेश’ का भी किया। तब ग्वालियर से हरिमोहन शर्मा ने भोपाल आकर इस नए संस्करण के संपादन का दायित्व सम्हाला था। नंदा शुक्ला और कृष्णकांत उपाध्याय भी उसमें सहयोगी बने थे। इस सायंकालीन में भी कला-संस्कृति की ख़बरें प्रमुखता से छापने के आदेश राजेन्द्रजी ने दिये थे। उन दिनों ‘स्वदेश’ कार्यालय में पत्रकारिता, साहित्य, कला, शिक्षा और समाज सेवा से जुड़ी अनेक अज़ीम शख्सियतों की आवाजाही को मैं ग़ौर से देखता और परिचय, सान्निध्य तथा संवाद का कोई मौक़ा नहीं गवाता।

एक दिन ऊंचे-पूरे, भरे बदन, घनी मूंछों वाले धोती-कुरता धारी एक व्यक्ति का आगमन हुआ। आते ही उन्होंने पड़ौस के कमरे में बने कांच के केबिन में टेबल-कुर्सी सम्हाली और कुछ लिखने में लीन हो गये। उनके व्यक्तित्व में कुछ ऐसा सम्मोहन था कि मैं मिलने का लोभ संवरण न कर सका। साहस बटोरा और केबिन में चला गया। उन्हें प्रणाम किया। जब मैंने अपना नाम बताया तो मुस्कुराते हुए मेरी पीठ थपथपायी। कहा- ‘कितना सुन्दर और भावपूर्ण लिखते हो। मैं कला-संस्कृति की तुम्हारी ख़बरें रूचि लेकर पढ़ता हूँ। आशीर्वाद तुम्हें। अपनी लेखनी को निखारो।

  • विनय उपाध्याय, निदेशक, वैश्विक कला केंद्र, रवीन्द्रनाथ टैगोर विवि भोपाल
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