Home अमृत महोत्सव सब परस्पर जुड़े

सब परस्पर जुड़े

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अभी नाशपाती का फल लगा या आम लगा या सेव लगा, वृक्ष पर लगा। इसे तुम खा जाओ। जो रसधार नाशपाती में बहती थी, 24 घंटे बाद वह तुम्हारा खून बन जाएगी। तुम्हारी हड्डी बनने लगेगी। तुम्हारी मज्जा हो जाएगी। तुम्हारा मस्तिष्क बन जाएगी। फिर एक दिन मरोगे, तब तुम खाद बन जाओगे। फिर कोई वृक्ष तुममें से रस ले लेगा। फिर फल बन जाएगा। तुम जब वृक्ष से एक नाशपाती को तोड़कर ला रहे थे तो ऐसा मत सोचना यह सिर्फ नाशपाती है।

तुम्हारे बाप दादा उसमें हो सकते हैं क्योंकि सभी जमीन में गिर जाते हैं, फिर जमीन में मिल जाते हैं। सब खाद बन जाते हैं। फिर एक फल बनते हैं। वृक्ष आदमियों में उतरते रहते हैं। आदमी वृक्षों में उतरते रहते हैं। एक वर्तुल है। एक वर्तुल घूम रहा है। जो चांद तारों में है, वह तुम्हारे शरीर में आ जाता है। जो तुम्हारे शरीर में है वह चांद तारों में चला जाता है।

हम सब जुड़े हैं। हम पृथक नहीं हैं। हम पृथक हो ही नहीं सकते। हम सब परस्पर निर्भर हैं। न कोई परतंत्र है और ना कोई स्वतंत्र है। हमारे जीवन की स्थिति को ठीक नाम देना है तो वह है ‘परस्पर तंत्रता’ इंटरडिपेंडेंस। हम एक दूसरे से लहरों की तरह जुड़े हैं। इस जोड़ के प्रति जागो।
ओशो

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