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इस शहर को आप क्या नाम देंगे

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पुराने शहर में घरों के बाहर गप्पियों और फुर्सतियों के लिए लगने वाले पटिये गायब होते गए और उंगली में चूना लपेटे यह बोलने वाले ‘अरे खां, क्या हो रिया है, उदयपुरे तक जा रिया हूं कम होते गए। पानी में कैल्शियम की कमी के कारण चूना खाते रहने वाले शहर में अंगुली का चूना अब दुश्मन के कुरते पर लगाया जाने लगा। जर्दा खाने वाले घटे तो पर्दा भी पुराने भोपाल तक सिमट गया। पीढयि़ों के बदलाव के साथ मुस्लिम ही नहीं, बैरागढ़ के सिंधियों की बोलचाल व रहन-सहन में भी अंतर आ गया। यहां से भी बरी साईं के बोल गायब हो गए और साथ ही लडढूमल, तोलाराम जैसे नाम भी। पुराने भोपाल में रहने वाले बहुत से लोगों ने अपने गली वाले मकान बेचकर नए भोपाल में घर ले लिए, वहां का खुलापन देखकर।

शिवकुमार विवेक, पत्रकार

भो पाल को आप क्या कहेंगे। किसका शहर। कैसा शहर। मुझे कोई उपमा या उपाधि नहीं सूझ रही है। यह असल में अब मंथन का विषय है जिसके कई जवाब आ सकते हैं। पहले ऐसा नहीं था। इस शहर को कई खिताब दिए जाते रहे। कई नामों-उपमानों से नवाजा जाता रहा है यह शहर। कभी इसे ‘नवाबों का शहरÓ कहा जाता था तो कभी ‘बाबुओं का शहर’। एक नामचीन संपादक ने इसे ‘जर्दा, पर्दा, नामर्दा का शहर कहा था। (पर्दा से गर्दा भी जुड़ दाती थी, जो भोपाल में भरपूर थी)। नामर्दा का शहर सुनने में अपमानकारी लगता था लेकिन उनका संकेत मंगलवारा की तरफ था। तब मंगलवारा मध्यप्रदेश में किन्नरों (माफ करें, इस शब्द से हिमाचल प्रदेश के एक खास इलाके के लोग नाराज होते हैं।) का सबसे बड़ा मोहल्ला था और उनकी धाक पूरे शहर में थी। जिस तरह अब शहर पर जर्दे की जर्द नहीं दिखती, वैसे ही अब बाबुओं की हस्तक्षेपकारी उपस्थिति नजर नहीं आती।

बाबू से दो मतलब होते थे-ब्यूरोक्रेट्स, जो शहर के सबसे अभिजात्य व्यक्ति होते थे और कर्मचारी, जो राजधानी के सबसे जरूरी किरदार थे। पान की पीकें मारते और लटके जेबों वाली बुशर्टों वाले ये लोग ज्यादातर इसी नस्ल के थे। वे प्रदेश के अलग-अलग गांवों-कस्बों-शहरों से आए थे। सरकारी क्वार्टरों में उम्र बिताकर या तो उन्हें वतन लौट जाना था या बुढ़ापे में कहीं आशियाना बना लेना था। बना भी लिया, तो भी सरकारी क्वार्टरों का ताउम्र का पट्टा कटा हुआ था। बड़े-बड़े अकड़ैल अफसर..और वे साहिबान जिनके बुशर्ट की क्रीज भी कम न हो, बदरंग, दरारों और सीलन भरे क्वार्टरों का मोह नहीं छोड़ पाते थे। अपने सगे हाथों से बनाए घरों को किराए पर उठाकर वे इस मुफ्त वाली आवास व्यवस्था के प्रवर्तक थे। ये क्वार्टर शहर में इस कदर चौतरफा पसरे थे कि इनके बिना जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती थी।

नया शहर इन क्वार्टरों के अलावा कुछ नहीं था। जो कुछ बचता था, वह तंग गलियों वाला पुराना शहर था। टीटीनगर जिसे कुछ अच्छी जनरल नॉलेज वाले लोग तात्याटोपे नगर के नाम से जानते थे, के दो बाजुओं को मिलाकर नया भोपाल बनता था जिन्हें नार्थ और साउथ टीटीनगर कहा जाता था। इनमें रहने वाले लोगों के पते में ये दो शब्द लिखे होने से ही राज्य के दूसरे हिस्से के लोग समझ लेते थे कि ये सरकार के खास कारिंदे का मुकाम है। लोग मानते थे कि ये सरकारी मेहमान या तो पिछले जन्मों के अच्छे कर्मों वाली पुण्यात्मा हैं या ऊंची पहुंच वाले हैं। नेताओं के रिश्तेदार तो ईश्वर के यहां से ही आवंटन लेकर आते थे। क्वार्टर के कारण इन्हें रिश्ते भी अच्छे मिलते थे। यानी क्वार्टर कई पीढयि़ों के इंतजाम का जरिया था। सो, कुछ लोगों के जीवन का मकसद ही सरकारी क्वार्टर था। कुछ ने अपनी आने वाली पीढ़ी को भी इसलिए सरकारी नौकर बना दिया ताकि क्वार्टर पर पुश्तैनी कब्जा बना रहे।

पत्रकारों ने भी तो ऐसा ही किया, जिन्हें तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने उदार हाथों से क्वार्टर बांटे थे। ये क्वार्टर 1100 क्वार्टर, 1250 क्वार्टर जैसे नामों से जाने जाते थे। मिनी बसें इस क्षेत्र में सर्पीले मार्गों से गुजरती थीं जिनके बस स्टॉप भी नंबरों में हुआ करते थे। इन नंबरों से वे इलाके-मोहल्ले इन्हीं नामों से भी पहचाने जाने लगे। जैसे सात नंबर, पांच नंबर। शहर की जीवनरेखा कही जाने वाली मिनी बस वालों ने नबंर वाली बयही नहीं आधे-आधे नंबरों के स्टॉप भी हो गए जैसे साढ़े पांच नंबर।इस तरह भोपाल नंबरों वाला शहर बन गया। जब नार्थ और साउथ टीटीनगर के क्वार्टर तोड़कर बहुमंजिला मकान बनाने का प्रस्ताव आया तो कई लोगों के लिए भूकंप से उजडऩे जैसा अहसास हुआ। अब इन क्वार्टरों की तस्वीरें प्रदर्शनी की वस्तु हैं। ये क्वार्टर कभी नहीं लौटेंगे। वे लोग भी अब नहीं आएंगे। बाबुओं की वह प्रतिष्ठा नहीं लौटेगी। क्योंकि अब यह शहर कुछ दूसरे लोगों का भी हो चुका है।

जब भोपाल बामशक्कत प्रदेश की राजधानी बना तो शाहजहांनाबाद के पुराने छोटे-छोटे बंगलों में पुराना सचिवालय लगा करता था, जहां आज कलेक्टोरेट है। मिंटो हाल में विधानसभा बनी। इसी तरफ नया भोपाल बसना शुरू हुआ। टीटीनगर और फिर न्यू मार्केट। न्यू मार्केट भोपाल की नई संस्कृति का केन्द्र हुआ। इस तरफ शहर की आधुनिकता के पग बढ़ते दिखने लगे। पुराने भोपाल के चौक के मुकाबले नए भोपाल का न्यू मार्केट खड़ा था। मेरे एक रूमानी मित्र कहते थे-सुबहे चौक, शामे न्यू मार्केट। दो संस्कृतियों के दो छोर। चौक में बुर्के से झांकती खूबसूरती तो न्यू मार्केट में जींस-टीशर्ट में बिंदास सौंदर्य। बाद में यह शहर होशंगाबाद रोड की तरफ रेंगा तो महाराणा प्रताप नगर यानी एमपी नगर और अरेरा कॉलोनी बसी।

पहले जहां टीटीनगर शहर का आखिरी छोर हुआ करता था, अस्सी के दशक में हबीबगंज अंतिम सिरा हो गया। हबीबगंज के रेलवे क्रासिंग के दूसरी तरफ तो हम बेवतन हो जाते थे। केवल बरकतुल्लाह विवि सुनसान में खड़ा था। एमपी नगर में प्रेस कांप्लैक्स में एक बिस्कुट का पैकेट तक नहीं मिलता था। खाना खाने के लिए सात नबंर स्टॉप के ढाबों-टपरों पर जाना पड़ता था। आज उन्हें ढूंढऩा चाहें तो उनकी जगह भी खोजना संभव नहीं है। 1996 में अरेरा हिल्स पर नया विधानसभा भवन बना जिसपर वास्तु प्रेत की छाया से आज भी विधायक सहमे रहते हैं। इस पहाड़ी की चोटी पर पहले केवल लक्ष्मीनारायण मंदिर व वल्लभ भवन हुआ करता था। इस मंदिर की कल्पना तत्कालीन वित्त मंत्री बसंत राव प्रधान और तत्कालीन राज्यपाल हरिविनायक पाटस्कर के संध्या भ्रमण के दौरान आई और तब बिड़लाजी से संपर्क किया गया। अस्सी-नब्बे के दशक से भोपाल की हर हरी-भरी पहाड़ी पर भूमाफिया की नजरें गईं वहीं सरकार ने बसाहट के लिए ग्रीन बेल्टों को आवासीय भूमि में परिवर्तित करना शुरू किया। चूना भट्टी चौराहे पर पहले जहां हम चूने के चार-छह ड्रम पड़े देखते थे और आगे जाने को बेमतलब समझते थे, वहां ग्रीन बेल्ट खत्म कर कॉलोनियों को बसाने का रास्ता खोला गया।

बदली भोपाल की पहचान

भोपाल जैसे-जैसे फैला, बाबुओं का शहर, नवाबों का शहर खोता गया। मुस्लिम बहुल भोपाल का भूगोल बदला तो समाज-अर्थशास्त्र भी बदल गया। आसपास के गांवों-कस्बों और दूरदराज से लोगों का आने का क्रम तेज हुआ, तो यह शहर मिलीजुली जनसंख्या और संस्कृति का शहर हो गया। पुराने शहर में घरों के बाहर गप्पियों और फुर्सतियों के लिए लगने वाले पटिये गायब होते गए और उंगली में चूना लपेटे यह बोलने वाले ‘अरे खां, क्या हो रिया है, उदयपुरे तक जा रिया हूंÓ कम होते गए। पानी में कैल्शियम की कमी के कारण चूना खाते रहने वाले शहर में अंगुली का चूना अब दुश्मन के कुरते पर लगाया जाने लगा। जर्दा खाने वाले घटे तो पर्दा भी पुराने भोपाल तक सिमट गया। पीढयि़ों के बदलाव के साथ मुस्लिम ही नहीं, बैरागढ़ के सिंधियों की बोलचाल व रहन-सहन में भी अंतर आ गया। यहां से भी बरी साईं के बोल गायब हो गए और साथ ही लडढूमल, तोलाराम जैसे नाम भी। पुराने भोपाल में रहने वाले बहुत से लोगों ने अपने गली वाले मकान बेचकर नए भोपाल में घर ले लिए, वहां का खुलापन देखकर।

लेकिन कई लोगों ने इस खुले शहर को भी पुराने शहर की तरफ तंग बनाना नहीं छोड़ा। यह आदमी की फितरत है। ऐसे में फिर एक नए शहर की जरूरत पैदा होती है। और नए भोपाल के बाद नया सुपर भोपाल भदभदा पहाडयि़ों पर उभरने लगा। जो भोपाल के साथ हो रहा है, अमूमन हर शहर के साथ आज यही हो रहा है। लोगों का तांता चला आ रहा है। रिहायशी जगह और सुविधाओं को टोटा होता जा रहा है। सरकार इस आप्रवासी आबादी के इंतजाम में ही लगी रहती हैं। शहर की खुली-खुली आबोहवा के कारण यह शहर जल्दी ही बाहरी लोगों को रास आ जाता है। खासतौर पर उन प्रदेशों के लोग तो लौटना ही नहीं चाहते जहां भीड़, अपराध और आजीविका का संकट शहरों की सूरत को बिगाड़ चुका है। ऐसे में हम राजधानी की संस्कृति को किस खांचे में ढालने की कल्पना करें। यह खांचा अपने आप तैया होगा, कब, पता नहीं। लेकिन जो लोग आसपास से आए हैं, उन्हें भोपाल का यह बदलाव सुखद लगता है कि भोपाल अपनी जड़ों की तरफ लौट रहा है। जिन पहचानों को हमलावरों या आप्रवासी आक्रमणकारियों ने बदल दिया था, उसे फिर समझा जा रहा है। राजा भोज और कमलापति इन्हीं जड़ों के पोषक-पालक थे। मेरे ख्याल से हर महानगर आज इसी तरह के संक्रमण से गुजर रहा है।

भोपाल के दो रचनाकार- बुच और बाबूलाल

वैसे तो भोपाल की रचना में राजा भोज के योगदान की बातें सामने आ रही हैं लेकिन शहर के बीसवीं सदी में बदलाव के लिए जिन दो आदमियों को याद करना चाहिए उनमें से एक हैं नगर निगम के वर्षों तक आयुक्त रहे एमएन बुच और दूसरे स्थानीय स्वायत्त शासन मंत्री के रूप में छाप छोडऩे वाले बाबूलाल गौर। बुच को ऐसा प्रशासनिक अफसर माना जाता है जिनके पास शहर के नियोजन की एक दृष्टि थी। वह कई व्यवस्थाओं के मामले में काफी आगे की सोचते थे। वह नगर निगम के अफसर से लेकर राज्य सरकार के प्रमुख सचिव तक बने और 1984 में निवृत्त हो गए। बाबूलाल गौर शहर को खुला-खुला बनाने और नए स्वरूप में ढालने के लिए सतत सक्रिय रहने वाले शख्स थे।

उन्होंने कई सड़कों को चौड़ा करने के लिए अतिक्रमणों पर जिस तरह हथौड़ा चलवाया, उससे उन्हें बुलडोजर मंत्री कहा जाने लगा था। इसमें उनका कोई कोताही नहीं रखना दुर्लभ गुण था। जब बैरागढ़ में उन्होंने सड़क के दोनों ओर की अट्टालिकाएं तुड़वाईं तो उनके ड्राइंग रूमों में स्ट्रीट लाइट के खंबे तक निकले थे। सोचिए, ऐसे में कितना दवाब रहा होगा लेकिन गौर ने इस इलाके से चुनाव हार जाने का जोखिम तक उठाकर यह काम किया। नगर के लिेए उनकी सक्रियता इस हद तक थी कि छुट्टी के दिन तक उनका काफिला किसी न किसी इलाके में घूमता दिखता था और किस चौराहे पर आटो के लिए स्टैंड बन सकता है और कहां खाली जगह पड़ी है, यह भी उनकी अंगुलियों पर होता था। पु_ा मिल के श्रमिक के रूप में काम करके आगे बढऩे वाले गौर प्रदेश के मुख्यमंत्री तक बने। वे जब विधायक थे तब दिन भर गांवों में खाक छानकर शाम को अखबारों के दफ्तर में आकर बैठते थे। खबर बनवाते थे और गप्पें लड़ाते थे। उनके भीतर का आम आदमी आखिर तक जिंदा रहा। बाद में तो ऐसे राजनेता आए जो अतिक्रमण हटाने की जगह कायम रखने की लड़ाई लड़ते थे।

तीन पैर के भटसुअर से लाल बसों तक

वो चवन्नी आ रही है, नहीं वे, उधर देख अठन्नी है। भोपाल की मिनी बसों के स्टाफ की यह ‘भद्र भाषा थी जिसे सवारियों के सामने बोलने में उन्हें कोई हिचक नहीं होती थी। इन मिनी बसों का हर इलाके में बोलबाला था। कुछ मार्ग ही भटसुअरों के लिए आरक्षित थे। ‘भटसुअर तीन पहिये वाले काले वाहन का देसी नाम था जिसे देश के अलग-अलग शहरों में लोग अलग-अलग नामों से पुकारते थे। उत्तरप्रदेश के मेरठ तरफ मैंने इसका नाम ‘गणेश सुना। पहली बार जब भोपाल आया और पुराने शहर की एक नुक्कड़ सभा में भाषण दे रहे तत्कालीन मंत्री बाबूलाल गौर के श्रीमुख से भटसुअर नाम सुना तब समझा कि यह टेम्पो नामक वाहन का स्थानीय संस्कारित संस्करण है।

पुराने भोपाल से सुभाष नगर फाटक का राजमार्ग इनके लिए आरक्षित था। प्रेस कांप्लैक्स तक कोई वाहन नहीं आता था, सो शाम को काम निबटाकर मैं, दैनिक भास्कर के तत्कालीन संपादक श्याम सुंदर ब्योहार के साथ सुभाषनगर फाटक तक पैदल यात्रा करके इसी टैंपों में लटक लिया करता था। रास्ते में ब्योहार साब पंजाब के मुख्यमंत्री प्रतापसिंह कैरों से लेकर मप्र के मंत्री गुलाबचंद तामोट तक के किस्से सुनाकर सफर को आसान बना देते थे। बाद में यह त्रिपाद वाहन या त्रिचक्रीय यात्री भार वाहक कहां गायब हो गए, पता नहीं चला। कोई स्थानीय संग्रहालय बनाकर समय की सुरंग में खो जाने वाली वस्तुओं का संग्रहालय बनाकर रखना चाहिए। इसमें वो कैमरा भी होगा जिसे तिपाई पर कपड़ा ओढ़ाकर रखा जाता था और ठक-ठक चलने वाली डीजल की चक्की भी होगी, जिसकी आवाज गांवों में तीन-चार मील तक सुनाई देती थी और गांव वाले अपने-अपने गेहूं लेकर दौड़े जाते थे। बात मिनी बसों की थी।

इनमें सवारी बैठती तो क्या थी, बैठने का किसी तरह उपक्रम करती थी। कई मुड्ढे और मेकशिफ्ट सीटें भी लगी होती थीं और अच्छे कंडक्टर की खूबी यह होती थी कि वह एक इंच भी जगह पैरों से खाली न रहने दे। थोड़ी सी संद निकालकर जेबकतरे फिट हो जाते थे जिन्होंने एक बार मेरी भी जेब काट ली थी। ये मिनी बस चालकों और रूट पर तैनात पुलिस के प्यादों की आय के अतिरिक्त साधन हुआ करते थे। 2006 के आसपास जब राजधानी में सिटी लिंक की बड़ी बसें चलने लगीं तब इन मिनी बसों का साम्राज्य खत्म हुआ।

…झीलों की नगरी भोपाल में आपका स्वागत है

जी हा, मैं झीलों की नगरी भोपाल हूँ। आप बेशक मुझे झीलों के साथ शैल-शिखरों की नगरी भी कह सकते हैं। मुझे अफसोस ! है तो सिर्फ इस बात का की आप लोग मुझे सिर्फ नवावों का और बेगमों का शहर के नाम से ही जानते हैं।

आज आप थोड़ा पीछे और अतीत में गए, मुझे अच्छा लगा और परमारकालीन प्रतापी राजा भोज जिन्होंने ‘ताल तो भोपाल ताल और सब तलैय्यां जैसे वृहद तालाब का निर्माण 11वीं शताब्दी में करवाया और राजा भोज के 365 छोटी बड़ी नदियों नालों से मिलकर बने ताल को भोजताल और भोजपाल से मैं भोपाल बना और ‘कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली मुहावरे वाले मेरे निर्माता को भोपाल ताल में एक भव्य प्रतिमा के रूप में जगह मिली। वक्त कब कहाँ ठहरता है यह सदैव गतिशील और परिवर्तनशील भी है। मैं कभी मूलत: गौंड साम्राज्य का हिस्सा रहा हूँ ,और रानी कमलापति यानी ‘ताल तो भोपाल ताल और सब तलैय्यां, रानी तो कमलापति और सब रनैय्यां के रूप में सुविख्यात मेरी शासक ने जब पारिवारिक विवाद और विपदा के कारण नबाब दोस्त मोहम्मद खान से सहायता क्या मांगी कि मेरी दुनियां ही बदल गयी। तब भोपाल की राजधानी जगदीशपुर का नाम इस्लाम नगर हो गया।

इतिहास गवाह है कि सत्ता परिवर्तन का विरोध करने वाले लोगों के लहू से लाल हुई मिट्टी यहां लाल घाटी कहलाई, वहीं असमय मारे गए हलाल किये गए लोगों के खून से रँगी नदी हलाली नदी मेरा कभी न भूलने वाला दर्द है। पूरा देश भले 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हो गया हो परन्तु यहॉं के नबाव तो मुझे अपना गुलाम ही बनाये रखना चाहते थे, सो मेरी आजादी के लिए अलग से यहां के वाशिंदों ने भोपाल विलीनीकरण आंदोलन चलाया, स्वतंत्र राष्ट्र में भी अनेक यातनाएं झेलींं। भला हो लौहपुरुष सरदार पटेल का कि उनके इस्पाती संकल्पों से मैं भी 1948 में स्वतंत्र होकर 1जून 1949 को भारत वर्ष का हिस्सा बना। आजादी के बाद तक मैं और मेरा अस्तित्व एक कस्बे से अधिक कुछ नहीं था, मात्र नवाब साहब की अहमदाबाद स्थित कोठी से उनकी शिकारगाह चिकलौद तक एकमात्र सड़क ,वह भी पक्की नहीं लाल मुरम और मिट्टी की बनी, सो जब नबाब साहब की गाड़ी या बग्गी निकले तो हर तरफ गर्द या गर्दा यानी धूल ही धूल और परदा-नशीं बुर्के में ढंकी हुई ख्वातीन, महिलाएं इसके साथ पान का प्रचलन वो भी जर्दे वाला। मैं तो आजादी के बाद कई दिनों तक सीहोर जिले का हिस्सा था। मुझे सन 1972 में जिले का दर्जा मिला।

मुझे याद है वो दौर भी जब मेरी सड़कों पर चिमनियों द्वारा उजाला किया जाता था यानी लाइट बिजली जब नहीं थी तब मेरी क्या हालत होगी कल्पना करो, मेरा आकर सिर्फ पुराना शहर ही था वो भी एक परकोटे के अंदर घिरा हुआ और उसमें जुमेराती दरबाजे जैसे अन्य दरबाजे थे। आजादी के बाद जब में मध्यप्रदेश की राजधानी बना तो सारे देश से अनेक सरकारी कर्मचारी यहां आकर बसे तब तात्याटोपे नगर का निर्माण हुआ, इसके साथ ही भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स बी एच ई एल भी मेरे विकास में मील का पत्थर साबित हुआ। यहां टी टी नगर के साथ भेल क्षेत्र के रूप में मैने आकार लेना प्रारम्भ किया। बैरागढ यानी सन्त हिरदाराम नगर भी सिंधी शरणार्थियों की एक नगरी जो आज नगर का बड़ा व्यापारिक केंद्र है मेरा गौरव है।

फिर तो मेरी भौगोलिक परिस्थितियों मेरी प्राकृतिक सुंदरता और मेरे समावेशी स्वभाव के कारण एकबार जो यहां आया यहीं का होकर रह गया। आज मुझे गर्व ही की देश ही नहीं, दुनिया के मानचित्र पर मेरी साहित्यिक सांस्कृतिक पहचान है। यहां भारत भवन, रवींद्र भवन जैसे साहित्यिक सांस्कृतिक गतिविधियों के बड़े केंद्र है।ं यहां आकाशवाणी दूरदर्शन के बड़े केंद्रों के साथ अनेक महत्वपूर्ण पत्र पत्रिकाओं के प्रकाशन केंद्र हैं ,यहां का वनविहार, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय संग्रहालय, ट्राइबल म्यूजिम मेरी पहचान हैं। आज में कस्बे से नगर और महानगर के रूप में आपके सम्मुख हूँ ,मेरा सड़क, रेल और वायुमार्ग से देश तथा दुनियां से सीधा जुड़ाव है , आप मेरी प्राकृतिक सुंदरता को बनाये रखें मेरे तालाब मेरे प्राण है मेरी पहाडिय़ां मेरा शरीर मेरी हरियाली मेरी सांसे ,मेरा इनका ख्याल रखिये ,मैं भोपाल हूँ आपका अपना भोपाल। प्रणाम।

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