Home स्थापना दिवस बड़ी कीमत चुकाकर बना रहे हैं हम नया भोपाल

बड़ी कीमत चुकाकर बना रहे हैं हम नया भोपाल

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प्रकाश साकल्ले, पूर्व अपरसंचालक, जनसंपर्क

भोपाल राजा भोज की कीर्ति पताका के साक्षी इस महानगर की महिमा का वर्णन करना दुष्कर कार्य है। ताल तलैया और शैल शिखरों की यह नगरी हर शख्स को प्रभावित या यूं कहें, आकर्षित करती है और देशभर से आकर यहां बसने वाले परिवारों को अपना बनाकर यही रहने के लिए प्रेरित करती है। नवाबों या बेगमों ने इस शहर को स्थापत्य कला के भवन, बटुआ या जरदोजी की कला से सुसज्जित किया। देश की आजादी के बाद 1 नवंबर को मध्यप्रदेश की राजधानी बनने के पश्चात आज तक इस शहर के बदलाव ने अनेक सोपान तय किए हैं। पहले मध्यप्रदेश सीपी और बरार का हिस्सा हुआ करता था।

जब नागपुर से भोपाल आकर शासकीय सेवकों का एक बड़ा वर्ग यहीऔ बस गया इसलिए इसे बाबुओं की नगरी भी कहा जाने लगा था। मैं जब वर्ष 1963 के जून माह में भोपाल आया, तब मेरी उम्र 13 वर्ष थी। मेरे पिताजी वन विभाग में होशंगाबाद से स्थानांतरित होकर आए थे। उन दिनों शासकीय क्वार्टर कम संख्या में थे अत: पिताजी ने हमीदिया अस्पताल के पास हवा महल रोड पर एक किराए का मकान लिया क्योंकि उनका दफ्तर बड़ी झील के किनारे फायर ब्रिगेड के पीछे स्थित था, जो कि घर से मात्र 5 मिनट की पैदल यात्रा से पहुंचा जा सकता था। उन दिनों भोपाल का मौसम इतना खुशनुमा रहता था कि सर्दी गर्मी और बरसात में कभी किसी किस्म की परेशानी नहीं होती थी अर्थात मौसम बड़ा संतुलित था।

मुझे लगता है कि भोपाल नगरी मालवा और बुंदेलखंड की मिली-जुली संस्कृति और जलवायु का प्रतिबिंब है। उन दिनों गर्मी के दिनों में हम जब छत पर सोते थे तो रात में कई बार रजाई ओढऩे की नौबत आ जाती थी। वजह थी प्रचुर मात्रा में हरियाली और जल स्रोतों के साथ ही ऊंची-नीची घाटियों की श्रंखला जो कि भोपाल को अन्य नगरों से अलग करती है। उन दिनों भोपाल की आबादी बहुत कम थी और हिंदू मुस्लिम मिली-जुली संस्कृति थी। वर्ष 1979 में पिताजी को जब टीटी नगर दशहरा मैदान के समीप तीन मंजिले भवन में एक क्वार्टर आवंटित हुआ तो मुझे नए भोपाल को नजदीक से जानने6समझने का अवसर मिला। उन दिनों शहर पुराने और नए भोपाल के साथ ही भील और बैरागढ़ जैसे चार हिस्सों में बंटा हुआ था। पुराने भोपाल में तांगे प्रचलन में थे ऑटो टेंपो टैक्सी जैसे वाहनों के आने की वजह से तांगे परसों में चले गए और अब तो वाहनों की तेजी से बढ़ती संख्या से बड़े-बड़े जाम की नौबत आ रही है। परिवर्तन प्रकृति का नियम है।

आज के भोपाल के पर नजर डालें तो जमीन आसमान का फर्क महसूस होता है। जल्दी आने की तेजी से महानगर की श्रेणी में आ जाएगा। मेरा व्यक्तिगत मत है कि स्वर्गीय एमएन बुच जैसे दृढ़ निश्चय प्रशासक और लौह पुरुष तथा बुलडोजर मैन का तमगा हासिल करने वाले पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय बाबूलाल गौर ने इस शहर को एक स्वप्न दृष्टा की तरह बड़ा योगदान दिया है। चाहे वह वीआईपी रोड हो या रोशनपुरा, सबसे पहले बने मल्टीस्टोरी भवन बेतवा अपार्टमेंट हो या इन दोनों को श्रेय देना होगा।

आज के भोपाल को साफ सुथरा बनाने के साथ ही अटल पथ और बुलेवर्ड स्ट्रीट के रूप में फर्राटा भरने में सक्षम सड़कें, मेट्रो की तेजी से तैयारी और हबीबगंज जैसे वर्ल्ड क्लास स्टेशन की रूपरेखा को साकार करने में निरंतर सक्रिय मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान के योगदान को भी स्वीकार करना होगा। हालांकि प्रगति और सुविधा की इस भागदौड़ की कीमत भी हमें चुकानी पड़ रही है। स्मार्ट सिटी के नाम पर काटे गए हजारों पेड़ और नष्ट की गई हरियाली का खामियाजा हमें भुगतना पड़ रहा है। कोरोनावायरस एक रुप से मिल रही ऑक्सीजन की कमी को हर भोपाल वासी ने महसूस कियाऋ आधुनिकीकरण की अंधी दौड़ के बावजूद भोपाल शहर को एक शांत स्वयं और बसने योग्य शहर के रूप में पहचाना जाना इस एक नई दिशा प्रदान करता है। मुझे भोपाल से प्यार है जीवन भर रहेगा।

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