Home स्थापना दिवस उतार चढ़ाव से भरी रही भोपाल विजय दशमी उत्सव की यात्रा

उतार चढ़ाव से भरी रही भोपाल विजय दशमी उत्सव की यात्रा

27
0

पुराने भोपाल नगर का विजय दशमीं उत्सव आज भी इसी मैदान में होता है । तब वह मैदान नहीं था एक खेत था । खेत को साफ करके पूजन का आयोजन हुआ । भोपाल में सार्वजनिक उत्सव की शुरुआत 1846 में हुई ।

  • रमेश शर्मा

मध्यप्रदेश का हृदय स्थली मध्यप्रदेश और उसका आतंरिक शक्ति केन्द्र भोपाल जो 1956 के बाद मध्यप्रदेश की राजधानी भी बना । जिस तरह इस भूभाग का इतिहास उतार चढ़ाव से भरा है वैसे ही उतार चढ़ाव इसकी परंपराओं में भी रही । भोपाल दशहरा उत्सव की यात्रा भी इन्हीं उतार चढ़ाव से भरी रही और आज भव्यतम स्वरूप में हमारे सामने है । इतिहास के आख्यानों में जितना पीछे दृष्टि जाती है, विजय दशमी उत्सव का उल्लेख भी मिलता है । प्राचीन भोपाल वैदिक शिक्षा का एक बड़ा मुख्यालय था जिसका केन्द्र आज का चौक बाजार हुआ करता था । वहां सभामंडल में विजय दशमी पर शस्त्र पूजन का वर्णन है । पहले शस्त्र की साधना और फिर पूजन ।

समय के साथ इस परंपरा पर ग्रहण लगा । सभा मंडल और वैदिक शिक्षा का केन्द्र नष्ट हो गया और ठीक उसी स्थान पर जामा मस्जिद ने आकार ले लिया । विजयादशमी उत्सव भोपाल में मानों अवरुद्ध हो गया लेकिन आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में आधी अधूरी परंपरा बनी रही । समय के साथ राष्ट्रीय चेतना की ऊर्जा भोपाल भी पहुंची और 1920-21 के आसपास मानवीय और साँस्कृतिक परंपरा के पुनर्स्थापना की बातें आरंभ हुईं । जिन्हे आरंभ ने भोपाल नबाब शासक ने दबाने का प्रयत्न किया । दमन के लिये उन्होंने न केवल अपनी पुलिस और पुलिस से संरक्षित असामाजिक तत्वों को ही छूट दी अपितु बाहर से लाकर बड़ी संख्या में खानाबदोश आक्रामक प्रवृति के लोगों को बसाने का क्रम आरंभ कर दिया ।

आरंभ में रियासत का कितना दबाब रहा होगा इसका अनुमान केवल इस एक बात से लगाया जा सकता है कि चौक की जामा मस्जिद के नीचे जो दुकानदार थे, उन्हे अपनी दुकानों के भीतर दीवाली पर लक्ष्मी पूजन की अनुमति नहीं थी । लेकिन लगभाग आठ वर्षों के संघर्ष के बाद भोपाल नगर में 1928 में हिन्दू सेवा संघ अस्तित्व में आया । इसकी पहली बैठक मंदिर कमाली में हुई । हिन्दूसेवा संघ की पहली बैठक में सर्वश्री चतुरनारायण जी मालवीय, ठाकुर लालसिंह, भाई उद्धव दास मेहता जी मेहता, भगवानदास जी राठी, जमना प्रसाद जी मुखरैया और शिवचरण लाल जी सहित कुल आठ लोग उपस्थित थे । आगे चलकर हिन्दूमहासभा, प्रजामंडल, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, कांग्रस या अन्य संगठनों में लोग गये वे इसी संगठन से गये ।

इस संगठन ने पहला बड़ा आंदोलन 1937 में किया गिरफ्तारियां हुईं और 1938 में पहले सार्वजनिक गणेशोत्सव का आयोजन किया गया लेकिन वह किसी सार्वजनिक स्थल पर न हो पाया अपितु चौक बाजार में एक निजी दुकान में झाँकी लगाई गयी । इसके बाद सार्वजनिक दशहरा उत्सव का आयोजन 1940 में हुआ । पहले आयोजन में चल समारोह नहीं निकला था और दुर्गा जी की झाँकियाँ ही लगीं थीं । बस केवल शस्त्र पूजन, राम जी की पूजन तक ही शेष था । पुराने भोपाल नगर का विजय दशमीं उत्सव आज भी इसी मैदान में होता है । तब वह मैदान नहीं था एक खेत था । खेत को साफ करके पूजन का आयोजन हुआ । भोपाल में सार्वजनिक उत्सव की शुरुआत 1846 में हुई । तब भोपाल शासक ने ब्रिटेन की शासन प्रणाली की तर्ज पर एक फार्मूला बनाया कि केन्द्रीय सत्ता राजा के हाथ में लेकिन नीचे सभी वर्गों-समूहों के प्रतिनिधियों का मंत्री मंडल बने । ऐसा मंत्री मंडल गठन भी हो गया था ।

उसमें हिन्दू महासभा की ओर से मास्टर भैरोंप्रसाद सक्सेना और भाई उद्धव दास मेहता ने हिन्दू समाज को साँस्कृतिक और सामाजिक के उत्सवों को सार्वजनिक रूप से भी मनाने की अनुमति देने की माँग रखी । नबाब हमीदुल्ला खाँ ने स्वीकारा और छोला परिसर में अनुमति दे दी । आयोजन छोला मैदान में हुआ और इस आयोजन में नवाब ने अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिये शाही बिछात देने की भी घोषणा की जो भोपाल राज्य के भारतीय गणतंत्र में विलीन होंने तक आती रही । यह भोपाल का पहला विजयदशमी सार्वजनिक उत्सव था जो पूरी उमंग के साथ आयोजित हुआ । हालांकि 1947 और 1948 का विजया दशमी उत्सव हलके तनाव और भय के वातावरण में बीता । इसका कारण यह था कि देश में स्वतंत्रता आ गयी थी लेकिन नबाब भोपाल ने स्वयं को पाकिस्तान में मिलने की खुली घोषणा कर दी थी । इसके विरुद्ध जन आँदोलन और दमन का क्रम चला । इसी बीच महात्मा गाँधी जी की हत्या भी हो गयी थी । नबाब को बहाना मिला ।

नबाब ने इस घटना की आड़ लेकर अधिकांश मैदानी कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया । इस कारण 1947 और 1948 का विजयादशमी उत्सव मानो औपचारिकता में बीता । उत्सव आयोजन की परंपरा तो न टूटी पर उमंग नदारद थी । इसमें पुन: रंगत 1949 से लौटी । जून 1949 में भोपाल राज्य भारतीय गणतंत्र का हिस्सा बना और नगर भर उत्सवों के आयोजन हुये जिसकी झलक विजयादशमी उत्सव में भी देखने को मिली । लगा पूरा नगर उमड़ पड़ा था । उस वर्ष की उमंग और उत्साह देखने लायक थी । 1952 में डॉ. शंकरदयाल शर्मा भोपाल राज्य के मुख्यमंत्री बने । वे मुख्यमंत्री के रूप में विजयादशमी पर छोला मैदान पहुंचे । समय के साथ भोपाल के विभिन्न स्थानों से टोलियाँ जाने लगीं और 1950 से विधिवत चल समारोह का आयोजन आरंभ हुआ । इस चल समारोह में यह प्रयास किया गया कि नगर के हर मोहल्ले और हर वर्ग की सहभागिता रहे इसे ध्यान में रखकर चल समारोह का मार्ग, रावण निर्माण का काम, भरत मिलाप का स्थल, ही नहीं ग्यारस के दिन देवी झाँकी विसर्जन निर्धारित किया गया । रावण निर्माण का काम पुराने नगर के गुलियादाई मुहल्ले में होता था । इस काम की देखरेख डॉ. शंकरदयाल शर्मा का परिवार करता था । पुराने नगर का रावण आज भी वहीं बनता है ।

आरंभ में यह समारोह केवल जन भागीदारी पर सीमित था । 1957 के बाद शासन के विभिन्न विभागों ने मैदान में साफ सफाई या अन्य सहयोग का काम संभालने का दायित्व नगर निगम और अन्य सहयोगी शासकीय विभागों ने संभाल लिया । 1957 के बाद ही भोपाल तात्या टोपे नगर (जो बोलचाल में टी टी नगर कहा जाता है) और भेल मैदान पर भी विजय दशमी उत्सव आरंभ हुये । इस तरह भोपाल में विजयादशमी उत्सव आयोजन की संख्या एक से बढ़कर तीन हो गयी थी जो अब लगभग दस से ऊपर है । विजयदशमी उत्सव पर मुख्यमंत्री जी के जाने की जो परंपरा भोपाल राज्य के समय डॉ. शंकरदयाल शर्मा ने आरंभ की थी वह बीच बीच में कुछ अपवाद को जोड़ लगभग पचास वर्षों तक जारी रही । प्रकाश चंद सेठी, अर्जुन सिंह, सुन्दर लाल पटवा तो ऐसे मुख्यमंत्री रहे जो तीनो आयोजनों में जाते थे । बाद में आयोजनों की संख्या बढऩे के कारण, बाबू लाल गौर, शिवराज सिंह चौहान कुछ उत्सव आयोजन में ही जाते थे । जैसे जैसे भोपाल का विस्तार हुआ विजय दशमी उत्सव की संख्या बढ़ती गयी । अब शाहपुरा, विट्टन मार्केट, कोलार रोड, बाग सेवनियां, आनंद नगर आदि लगभग एक दर्जन स्थानों पर विजय दशमी उत्सव आयोजन होने लगे । फिर भी सबसे गरिमामय आयोजन पुराने भोपाल में छोला का ही माना जाता है । इस आयोजन में निकलने वाले चल समारोह में राम रथ के आगे पुलिस बैंड मार्च करता है । पुलिस बैंड सामान्यत: मार्च नहीं करता ।

एक स्थान पर बैठकर धुन बजाते हैं । लेकिन पुराने भोपाल के इस विजयदशमी चल समारोह में राम रथ के आगे पुलिस बैंड मार्च करता है । इसकी शुरुआत 1977 में हुई थी । इसके लिये आँदोलन हुआ और तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरेन्द्र कुमार सकलेचा और भाई उद्धवदास मेहता ने समझौते का रास्ता निकाला और पुलिस बैंड मार्च करने की परंपरा आरंभ हुई । यह वर्ष यदि दशहरे को अनुदान के रूप में शासन की सहायता के लिये मील का पत्थर है तो हिन्दूउत्सव समिति मै गतिरोध के लिये । यह वस्तुत: दो अध्यक्षों का निजी विवाद रहा जो सार्वजनिक हुआ था । और इसी साल संस्था का विधिवत पंजीयन भी किया गया । 1980 में तत्कालीन मंत्री रसूल अहमद सिद्धिकी के प्रयत्न से शासन ने छोला मैदान की बाउन्ड्री वाल तैयार की । पुराने भोपाल में उत्सव आयोजन के लिये गठित हिन्दूउत्सव समिति 1977 में गतिरोध भी आया पर इसका प्रभाव उत्सव के आयोजन पर न पड़ा, वह अपनी गरिमा के साथ संपन्न हुआ ।

समय के साथ विजय दशमी उत्सव के साथ दुर्गा उत्सव आयोजन भी जुड़ गया है भोपाल में यह उत्सव एक प्रकार से जन उत्साह और उल्लास का प्रतीक है । लेकिन एक परिवर्तन भी आया । आरंभिक काल के विजयदशमी उत्सव में समाज की सर्व भागीदारिता सुनिश्चित थी । तैयारी केवल रावण के पुतले बनाने, और दहन तक सीमित न थी । विशेषकर हर क्षेत्र के अपने अखाड़े हुआ करते थे । कुछ वर्ग विशेष भी अपना अखाड़ा चलाया करते थे । इन अखाड़ों में दो प्रकार की तैयारी होती थी । एक तो शरीर सौष्ठव और कला का प्रदर्शन । कला प्रदर्शन मै शरीर क्षमता की भंगिमाएं और शस्त्र संचालन दोनों प्रकार की कलाये सम्मिलित हुआ करती थीं ।

विशेषकर मल्ल विधा और एक से अधिक प्रतिद्वंद्वियों से स्वयं की रक्षा कैसे करें। इसका प्रदर्शन पूरे चल समारोह के मार्ग में होता था । निसंदेह तब सजावट, दिखावट या भव्यता पर इतना जोर न था । समाज को जोडऩे और समाज की क्षमता बढ़ाने पर अधिक जोर हुआ करता था । समय के साथ आयोजन की भव्यता में विस्तार हुआ है । जो वर्तमान समय और और आयोजन समितियों के समस्त जनों के प्रयत्नों का परिणाम है ।

Previous articleमध्यप्रदेश में फिल्मों की शूटिंग
Next articleआज भी नहीं बदला भोपाल का ‘रंगजगत’

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here