Home स्थापना दिवस माजी की यादों से पिंड छुड़ाता शहर

माजी की यादों से पिंड छुड़ाता शहर

53
0

चालीस-पचास बरस पुराने भोपाल को याद कीजिये। घर की ड्योढ़ी पर टाट के पर्दे, टखनों से ऊपर वाले पायजामे और घुटनों से नीचे पान की छीटों वाले कुर्ते पहने भोपाली पटियों पर राग बतोले करते नुमायां हो जाएंगे। ये वो दौर था जब मोती मस्जिद से वाया इब्राहिमपुरा, बुधवारा चार बत्ती और चौक से पीर गेट तक का रास्ता ये भाई लोग पैदल ही तय किया करते थे। वक्त की इतनी इफरात थी कि रास्ते मे किसी की खैरियत पूछने में ही घन्टा भर निकल जाता। नए भोपाल में तब वल्लभ भवन, रविन्द्र भवन, एमएसीटी की इमारतें आकार ले रहीं थीं। नरोन्हा साब के जमाने में बाबू और अफसर ओल्ड सेक्रेटेरियट में नौकरी करने आया करते थे। अस्सी से नब्बे की दहाई में जब सतपुड़ा-विंध्याचल में विभागाध्यक्ष दफ्तर लगने लगे थे, वहां की पार्किंग में सिर्फ सरकारी चार पहिया गाडिय़ां नजर आती थीं। बाबू लोग सायकल से दफ्तर आते थे। आज हाल ये है कि ज्यादार बाबू लोग अपनी कारों से आते हैं।


आरिफ मिर्जा

भोपाल के विकास ने हजारों पेड़ों की बलि लेली है। विकास की अंधी दौड़ ने भोपाल के मूल चरित्र को छीन लिया है। लोग आत्मकेंद्रित हो गए हैं। हाल ये है कि भाई लोग रूबरू मिलने के बजाय सोशल मीडिया पर एक दूसरे की खैरियत जानते हैं। बहुत दिनों बाद मिलने पर तपाक से गले मिलने के बजाए पूछा जाता है – आजकल नजर नहीं आते एफबी पर। गोया के पटियेबाडजी का लुत्फ मेट्रोसिटी के अंदाज में कहीं खो गया है। अगर ये कहा जाए कि आज के भोपाल की पहचान बदल गई है, रिवायतें बदल गई हैं या किसी हद तक भोपाली जुबान का लहजा बदल गया है तो कुछ गलत न होगा। ये नवाबी ठसक से निकलता हुआ, माज़ी की यादों से पिंड छुड़ाता हुआ शहर बनता जा रहा है। गोया की कभी भोपाल की पहचान रहीं सेकंड वर्ल्ड वार की विलीज जीपें, नॉर्टन, बीएसए और जावा बाइकों का दौर हवा हो चुका है।

इनकी जगह आपको नए और पुराने भोपाल की सड़कों पर बीएमडब्ल्यू, मर्सिडीज जैसी गाडिय़ां फर्राटा भरते दिखाई दे जाएंगी। नौजवानों में अब को खां, केसे हो खां जैसे जुमलों की जगह हाय ब्रो, हाय डूड जैसे स्लेंग्स आते जा रहे हैं। ये नई पहचान गढ़ता हुआ महानगर है। और हो भी क्यूं न। किसी ?माने में कालेजों के नाम पर सिर्फ सेफिया, हमीदिया, गांधी मेडिकल कालेज और एमएलबी जैसे लेंडमॉर्क के साथ ही अब भोपाल एजुकेशन का हब बन गया है। ज्यूडिशियल अकादमी, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फारेस्ट मैनेजमेंट सहित बीसियों हाई लेवल के शिक्षा संस्थान यहां खुल गए हैं। यकीनन अपनी पर्दा, गर्दा, जर्दा और नामर्दा जैसी कदीमी पहचान को ये शहर कहीं पीछे छोड़ चुका है। दूसरे लब्जों में कहा जाए तो भोपाल स्मार्ट हो चुका है। भोपाली बतोलों में अब इंस्टा, फेसबुक और वाट्सएप का तबका लग गया है। नई पीढ़ी शतरंज की बारीकियों में वक््त बर्बाद करने और पान खाकर थूकने की गौरवशाली परंपरा से बाहर आ चुकी है। थोड़ा सा फ्लेशबैक में जाइये। यही कोई चालीस-पचास बरस पुराने भोपाल को याद कीजिये। घर की ड्योढ़ी पर टाट के पर्दे, टखनों से ऊपर वाले पायजामे और घुटनों से नीचे पान की छीटों वाले कुर्ते पहने भोपाली पटियों पर राग बतोले करते नुमायां हो जाएंगे।

ये वो दौर था जब मोती मस्जिद से वाया इब्राहिमपुरा, बुधवारा चार बत्ती और चौक से पीर गेट तक का रास्ता ये भाई लोग पैदल ही तय किया करते थे। वक्त की इतनी इफरात थी कि रास्ते मे किसी की खैरियत पूछने में ही घन्टा भर निकल जाता। नए भोपाल में तब वल्लभ भवन, रविन्द्र भवन, एमएसीटी की इमारतें आकार ले रहीं थीं। नरोन्हा साब के जमाने में बाबू और अफसर ओल्ड सेक्रेटेरियट में नौकरी करने आया करते थे। अस्सी से नब्बे की दहाई में जब सतपुड़ा-विंध्याचल में विभागाध्यक्ष दफ्तर लगने लगे थे, वहां की पार्किंग में सिर्फ सरकारी चार पहिया गाडिय़ां नजर आती थीं।

बाबू लोग सायकल से दफ्तर आते थे। आज हाल ये है कि ज्यादार बाबू लोग अपनी कारों से आते हैं। वाहन पार्किंग की जगह तलाशनी होती है। कभी भोपाल की मेन सवारी तांगा हुआ करता था। आठ-बारह आने में तांगे वाले पूरे शहर का चक्कर लगाया करते थे। बाकी वो दिन हवा हुए जब खलील खां फाख्ता उड़ाते थे। अब तो पचपन-साठ साल के भोपालियों का हुलिया बदल गया है। ये अब जीन्स और लिनेन में नजर आते हैं। ब्रांडेड गाड़ी पे फर्राटा भरते उनके कानों में हेडफोन लगा होता है। नए और पुराने शहर के भोपाली पुरानी किराना दुकानों के बजाए वालमार्ट और डीबी मॉल जैसे ठिकानों से शॉपिंग करते हैं। नए भोपाल की शानदार लिंक रोड्स पर आज जो नॉन स्टॉप ट्रैफिक चलता है कोई पैंतीस बरस पहले तक यहां पांच सात मिनट में कोई बाइक या कार निकलती थी। लेकिन अब भोपाल की तस्वीर बदल चुकी है। बड़ेे तालाब पर केबल स्टे ब्रिज और गिन्नौरी वाले आर्च ब्रिज ने शहर की तस्वीर ही बदल दी है। गांधी मेडिकल कालेज से जीएडी क्रॉसिंग तक बने फ्लाइओवर ने ट्रैफिक को रफ्तार दे दी है। इसी तरह लालघाटी से बैरागढ़ और एयरपोर्ट रोड वाले ग्रेड सेपरेटर पर भोपाली अस्सी की स्पीड से फर्राटा भरते हैं। जाहिर बात है भोपाल स्मार्ट हो गया है। बाकायदा स्मार्ट सिटी आकार ले रही है।

नार्थ टीटी नगर में स्मार्ट सिटी के अपार्टमेंट और हमीदिया अस्पताल को विस्तार देतीं गगनचुम्बी इमारतें भोपाल को मेट्रो सिटी का लुक दे रही हैं। यदि सब कुछ ठीक रहा तो नए और पुराने शहर में दो तीन सालों में मेट्रो ट्रेन दौडऩे लगेगी। मेट्रो का काम भी बहुत तेजी पकड़ चुका है। हबीबगंज को होशंगाबाद रोड से जोडऩे वाला सावरकर सेतु अपनी आप ही मिसाल बन चुका है। यहीं से बोर्ड आफिस चौराहे तक एक फ्लाइओवर का काम भी जारी है। सुभाष आरओबी भी जल्द ही शुरू होगा। ये बात और है कि भोपाल के विकास ने हजारों पेड़ों की बलि लेली है। विकास की अंधी दौड़ ने भोपाल के मूल चरित्र को छीन लिया है। लोग आत्मकेंद्रित हो गए हैं। हाल ये है कि भाई लोग रूबरू मिलने के बजाय सोशल मीडिया पर एक दूसरे की खैरियत जानते हैं। बहुत दिनों बाद मिलने पर तपाक से गले मिलने के बजाए पूछा जाता है – आजकल नजर नहीं आते एफबी पर। गोया के पटिएबाजी का लुत्फ मेट्रोसिटी के अंदाज में कहीं खो गया है।

Previous articleकोई भी समय प्रतिभा से खाली नहीं
Next articleयुवा पीढ़ी को भारत के इतिहास का ज्ञान होना चाहिए, भारत के प्रति पाकिस्तान, चीन का रवैया बदला नहीं है, : मोहन भागवत

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here