Home स्थापना दिवस मैं भोपाल बोल रहा हूं…

मैं भोपाल बोल रहा हूं…

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-घनश्याम मैथिल, ‘अमृत

मैं भोपाल हूं। मेरा ऐतिहासिक महत्व रहा है। राजे-महाराजे और नवाब मेरे शासक रहे। 15 अगस्त 1947 को जब सारा देश स्वतंत्र हो गया हो परन्तु तत्कालीन परिस्थतियों के चलते मैं गुलाम ही रहा। लेकिन यहां के वाशिंदों के संघर्षों ने मुझे इस देश का हिस्सा बनाया। भले ही इसके लिए उन्होंने गोलियां तक खाई। तब कहीं जाकर 1जून 1949 को मैं भारत वर्ष का हिस्सा बना।

स्वंत्रता के बाद तक मेरा अस्तित्व एक कस्बे से अधिक कुछ नहीं था ,मात्र नवाब साहब की अहमदाबाद स्थित कोठी से उनकी शिकारगाह चिकलौद तक एकमात्र सड़क ,वह भी लाल मुरम और मिट्टी की बनी ,सो जब नबाब साहब की गाड़ी या बग्गी निकले तो हर तरफ गर्द या गर्दा यानी धूल ही धूल परदा-नशीं बुर्के में ढंकी हुई महिलाएं इसके साथ पान का प्रचलन वो भी जर्दे वाला ,तब मुझे जर्दा ,गर्दा और पर्दा वाला शहर नाम नवाजा गया कुछ लोग यहां मंगलवारा ,बुधबारा मोहल्लों में किन्नरों की बड़ी संख्या के कारण ..ठिठोली में नामर्दा शब्द भी इसमें जोडने से बाज नहीं आते।

मैं तो आज़ादी।के बाद कई दिनों तक सीहोर जिले का हिस्सा था मुझे सन 1972 में जिले का दर्जा मिला । मुझे याद है वो दौर भी जब मेरी सड़कों पर चिमनियों द्वारा उजाला किया जाता था यानी लाइट बिजली जब नहीं थी तब मेरी क्या हालत होगी कल्पना करो ,मेरा आकर सिर्फ पुराना शहर ही था वो भी एक परकोटे के अंदर घिरा हुआ और उसमें जुमेराती दरवाजे जैसे अन्य दरवाजे थे। आजादी के बाद जब में मध्यप्रदेश की राजधानी बना तो सारे देश से अनेक सरकारी कर्मचारी यहां आकर बसे तब तात्याटोपे नगर का निर्माण हुआ ,इसके साथ ही भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स भी मेरे विकास में मील का पत्थर साबित हुआ।

यहां टी टी नगर के साथ भेल क्षेत्र के रूप में मैंने आकार लेना शुरु किया। बैरागढ़ आज संत हिरदाराम नगर भी सिंधी शरणार्थियों की एक नगरी जो आज नगर का बड़ा व्यापारिक केंद्र है मेरा गौरव है। फिर तो मेरी भौगोलिक परिस्थितियों मेरी प्राकृतिक सुंदरता और मेरे समावेशी स्वभाव के कारण एक बार जो यहां आया यहीं का होकर रह गया। आज मुझे गर्व ही की देश ही नहीं दुनियां के मानचित्र पर मेरी साहित्यिक सांस्कृतिक पहचान है , यहां भारत भवन , रविंद्र भवन जैसे साहित्यिक सांस्कृतिक गतिविधियों के बड़े केंद्र बने।

आकाशवाणी दूरदर्शन के बड़े केंद्रों के साथ अनेक महत्वपूर्ण पत्र पत्रिकाओं के प्रकाशन केंद्र हैं ,यहां का वनविहार ,इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय, ट्राइबल म्यूजिम मेरी पहचान हैं। आज में कस्बे से नगर और महानगर के रूप में आपके सम्मुख हूँ ,मेरा सड़क, रेल और वायुमार्ग से देश तथा दुनिया से सीधा जुड़ाव है ,आप मेरी प्राकृतिक सुंदरता को बनाये रखें मेरे तालाब मेरे प्राण है मेरी पहाडिय़ां मेरा शरीर मेरी हरियाली मेरी सांसें हैं,जरा इनका ख्याल रखिये ,मैं भोपाल हूँ आपका अपना भोपाल….

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