Home स्थापना दिवस बदल कर भी न बदला ‘भोपाल

बदल कर भी न बदला ‘भोपाल

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रमा निगम, वरिष्ठ साहित्यकार

इन बूढ़ी होती हुई आंखों ने भोपाल को अपने पैदाइशी दौर से अब तक शनै:-शनै: परिवर्तित होते नजदीक से देखा है। तब भी और अब भी जब भी मेहमान घर आते तो उन्हें भोपाल और उसके आस -पास का हिस्सा विशेष रूप से घुमाने जरूर ले जाया जाता। इन जगहों में मुख्य रूप से भीमबैठका की गुफाएं, सांची,ट्राईबल म्यूजियम,अपर लेर,वन विहार नेशनल पार्क ,वर्तमान में सैर सपाटा,भोजपुर का शिव मंदिर,ताजुल मसाजिद,गौहर महल,रायसेन का किला,लक्ष्मी नारायण मंदिर एवं उसमें स्थित बिड़ला म्यूजियम,गुफा मंदिर आदि और भी बहुत कुछ। उस समय मुख्य रूप से दो ही बाजार होते थे।

पुराने भोपाल वाले सिटी में खरीदारी करते थे वहीं नये भोपाल वाले न्यू मार्केट में । लेकिन तब से लेकर अब तक लोगों की यह धारणा नहीं बदली है कि सिटी सस्ता है न्यू मार्केट से और बाद में बने अन्य बाजार जिनमें दस नम्बर मार्केट भी शामिल है महंगा है। उस समय भोपाल का विस्तार बहुत अधिक नहीं हुआ था । जिस कोलार में आज इतनी घनी आबादी हो गई है लोग वहां रहने जाना नहीं चाहते थे । कारण था शहर से दूर है और यातायात के साधन भी सीमित हैं। और ऐसा ही हाल भोपाल के अन्य दूर दराज के इलाकों का था। लेकिन अब यहां अच्छी खासी भीड़,रौनक के साथ ही बाजार,अस्पताल,मॉल,स्कूल जैसी मूलभूत सुविधाए उपलब्ध हैं।

भोपाल की आबादी की बात कहें तो अनुमानत: 2021 में हम 27,75,090 हैं। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल राजा भोज की नगरी झीलों का शहर अपनी प्राकृतिक सुंदरता तथा दर्शनीय स्थलों के लिये जग प्रसिद्ध है। अपने जीवन के 58 वर्षों में मैंने भोपाल को बहुत सारे उतार चढ़ाव के साथ चढ़ते उतरते देखा है। तब भोपाल को पुराना भोपाल और नये भोपाल के रूप में जाना समझा जाता था। भोपाल के परिवर्तनों को यहां के बाशिंदों ने तबियत से आत्मसात किया। इसका परिणाम हरियाली और हरे भरे दरख्तों की जगह बड़ी-बड़ी लम्बी चौड़ी सड़कें और उनके आस-पास बने सीमेंट कांक्रीट के जंगलों ने ले ली। अब भोपाल में पहले जैसी हरियाली देखने को नहीं मिलती है।

पहले भोपाल में इतनी गर्मी महसूस नहीं होती थी जितनी की अब महसूस होती है। विगत 41वर्षों में मेरा कभी स्वदेश समाचार पत्र पढऩा नहीं छूटा । यह क्रम अनवरत अब भी वैसा ही जारी है। ढाई सीढ़ी की मस्जिद,ताजुल मस्जिद,छोटा तालाब, बड़ा तालाब,लेडिया तालाब,गरम गड्ढा ,बेनजीर ग्राउंड,उबेदिया स्कूल,सुल्तानिया स्कूल और रॉयल मार्केट के पास बैंक की बाउंड्री पर बैठकर ताजिये और झांकियों को निकलते हुए देखना मेरे जीवन के अविस्मरणीय पल रहे हैं। भोपाली पर्दानशीं महिलाओं और तांगों को कैसे भूल सकते हैं। उन दिनों पर्दानशीं महिलाय़ें गली मोहल्लों बाजारों में चहल कदमी करती हुई और तांगे की सवारी करती हुई खूब देखी जाती थीं।

तांगे भी खास रूप से जब महिलाओं को जाना हो तब घर के दरवाजे पर तांगा लगा दिया जाता था और उसमें महिलायें बैठे जातीं । उसके बाद उसे कपड़े से चारों तरफ से कवर कर दिया जाता था। तब तांगे की रवानगी होती थी। यह दृश्य उस समय आम थे। धीरे-धीरे तांगे भोपाल की सड़कों से गायब हो गये और उनकी जगह भटसुअर (लम्बी नाक वाला टेम्पो) मिऩी बसों, मैजिक,ओला टेक्सी,ऑटो नें ले ली और अब मैट्रो का इंतजार। पटिया सभ्यता का उदय भोपाल में हुआ।भोपाल मतलब पटिया और पटिया मतलब भोपाल।

जब से सोशल मीडिया के पटिये आ गये हैं भोपाली भी उन्हीं पटियों पर विराजमान हो गये हैं। और वहीं सूरमा भोपाली की तरह अपनी-अपनी लम्बी चौड़ी फेंक रिये हैं। भोपाल की हाकी नें इस देश को बहुत उत्तम खिलाड़ी दिये हैं। लेकिन क्रिकेट व अन्य खेलों से हाकी पिछड़ गई।इसका अफसोस भोपाल को लंबे समय से है। मेरे भोपाल नें बहुत दर्द भी झेले हैं । गैस त्रासदी का दर्द हम कैसे भूल सकते हैं और फिर कोरोना का कहर जगजाहिर है। याद तो उन दिनों होटलों पर मिलने वाली नमक की चाय की बहुत आती है। एक चुटकी नमक की चाय और गले की खराश दूर।

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