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राजधानी को और गुणवत्तायुक्त शिक्षा की जरुरत

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एमके पुरोहित, लेखक

प्रदेश की राजधानी भोपाल में हाल के वर्षों में स्कूल और कॉलेज दोनों में शिक्षा की तस्वीर बदली है। आज से तकरीबन चालीस साल पहले राजधानी में जहां गिने-चुने सरकारी स्कूल और कॉलेज थे, वहीं आज निजी स्कूलों और कॉलेजों की भरमार है। कुछ सालों पहले अभिभावक पढऩे के लिए अपने बच्चों को भोपाल के बजाय इंदौर भेजना पसंद करते थे लेकिन आज स्थिति काफी बदल चुकी है। गांवों से बच्चे अच्छी शिक्षा हासिल करने की उम्मीद में बड़ी संख्या में राजधानी की ओर आकर्षित हो रहे हैं। आज भोपाल भी एजुकेशन हब बनने की ओर अग्रसर है। शहर के ज्यादातर स्कूल-कॉलेजों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की ओर ध्यान दिया जा रहा है। फिर भी मेट्रो जैसी सुविधाओं की और गुणवत्ता वाली शिक्षा की जरूरत है ताकि शहर के बच्चों को इंदौर या भोपाल की ओर रुख नहीं करना पड़े।

सामयिक रूप से शिक्षा के उद्देश्यों को नए सिरे से परिभाषित करना जरूरी है। एक शिक्षक, एक साथ कितनी कक्षाओं के कितने बच्चों को भली-भांति पढ़ा सकेगा, इस बारे में गम्भीरतापूर्वक विचार करने की जरूरत है। शिक्षण, प्रशिक्षण और परीक्षण की विधियों में भी नयापन लाना होगा। उम्र के हिसाब से बच्चों को कितना सिखाया जाना चाहिए, ऐसे कोई मानक नहीं हैं। एक दौर था जब शासकीय स्कूलों के शिक्षकों की विद्यार्थियों के भविष्य निर्माण में अहम भूमिका मानी जाती थी। इसलिए हर विषय के लिए अलग शिक्षक होते थे। फिर वक्त के साथ शिक्षकों की जिम्मेदारियां बढ़ी व बंटती गईं। परिणाम सामने है, सरकारी और गैर शासकीय कामों के कारण शिक्षक अपना मूल कार्य पर अपेक्षित ध्यान नहीं दे पा रहे हैं। सरकारी स्कूलों में ज्यादा क्वालिफाइड शिक्षक होने के बावजूद शिक्षा की गुणवत्ता का स्तर घटा है।

यही वजह है कि अभिभावक का रुख प्राइवेट स्कूलों की तरफ हो गया। कहते हैं, बदलाव होता है तो अच्छे परिणाम भी आते हैं। एक दौर तक नि:शुल्क शिक्षा ज्यादा महत्वपूर्ण हुआ करती थी लेकिन आज अभिभावक बच्चों की शिक्षा और भविष्य को लेकर कोई समझौता करने को तैयार नहीं हैं। शिक्षा का स्वरूप भी व्यापक हो गया है। पहले चुनिंदा विषयों तक अध्ययन सीमित था लेकिन अब अध्यापन की कई आधुनिक तकनीक विकसित हो गई है। इसमें प्राइवेट स्कूलों की अहम भूमिका है। पाठ्यपुस्तकें व पाठ्यक्रम बदलते जा रहे हैं परंतु उनके अनुरूप स्कूलों में साधन-संसाधन की कमी है। शिक्षकों को विभिन्न पदनाम दे दिए गए हैं।

इससे शिक्षक अप्रत्यक्ष ही तनाव में रहने लगे हैं, असर पढ़ाई पर हो रहा है। सरकार को एक जैसी कार्य नीति, पदनाम, वेतन नीति बनाना होगी। शिक्षा में परिवर्तन के लिए प्रबंधन, शिक्षकों में तालमेल बनाया जाना चाहिए। लगातार बदलते शैक्षिक परिदृश्य में स्कूली शिक्षा को बेहतर बनाने के प्रयास की जरूरत है। शिक्षक समाज का संवदेनशील अंग होता है। विद्यार्थी शिक्षकों से हर वक्त संपर्क में रहना चाहते हैं, विशेषकर प्राथमिक स्तर पर। इसलिए स्कूलों को कार्यालयीन कामकाज से वास्तव में मुक्त कर शिक्षण को प्रभावी बनाने पर जोर देना होगा।

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