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बिलासपुर के किसान का कमाल, खेतों में उगाई गुलाबी और पीले रंग की फूलगोभी

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रायपुर। बिलासपुर जिले के मल्हार के किसान जदुनंदन वर्मा इन दिनों चर्चा में हैं। उन्होंने अपने खेत में कुछ ऐसा किया है जो अमूमन देखने को नहीं मिलता। अब तक आपने सफ़ेद रंग की फूलगोभी ही बाजार में मिलती हुई देखी होगी, लेकिन जदुनंदन वर्मा ने कुदरती तौर पर गुलाबी और पीले रंग की गोभी उगाकर सभी को चौंका दिया है। खास बात यह है कि इनमें किसी भी तरह का बाहरी कलर इस्तेमाल नहीं किया गया है।
गुलाबी और पीले रंग की एक फूलगोभी पूरी तरह से नैचुरल है और ऑर्गेनिक खेती के जरिए इसे तैयार किया गया है। वर्मा ने बताया कि फिलहाल प्रयोग के तौर पर 60 डिसमिल में उन्होंने 300 पौधे लगाए थे। कुछ समय पहले उन्होंने स्विटजरलैंड की सिजेंटा कंपनी के बीज लिए थे और इसके बाद उन्होंने अपने खेतों में लगाया है। वर्मा ने बताया कि उन्हें खेती में नए-नए प्रयोग करने का शौक है और इसी के चलते यह मुमकिन हो पाया है।
लोग 3 गुना कीमत देने को तैयार
गुलाबी और पीले रंग की फूलगोभी की तस्वीरें जब सोशल मीडिया में आने लगी तो इलाके में जदुनंदन वर्मा की यह फसल चर्चा में आ गई। लोग इनसे अब यह फूल गोभी 3 गुना कीमत पर खरीदना चाहते हैं। जदुनंदन वर्मा ने बताया कि 6 से 7 रुपए प्रति किलो के हिसाब से वह सामान्य सफेद फूल गोभी बेचा करते थे। लेकिन अब इसे लोग 20 रुपए तक का दाम देने के लिए तैयार हैं। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक महाराष्ट्र में इसी तरह की फूलगोभी 80 रुपए किलो के दाम में बाजार में बिकती है। वर्मा की फसल तैयार है जल्द ही बाजार में भी आ जाएगी।
इम्यूनिटी बढ़ाएगी ये फूलगोभी
वर्मा ने बताया कि कंपनी और कुछ एक्सपर्ट से चर्चा में पता चला कि अन्य फूलगोभी मे प्रोटीन न के बराबर होता है। जबकि इसमें अधिक मात्रा में प्रोटीन होता है। इसमें कैल्शियम, फास्फोरस, मैग्नीशियम, जिंक जैसे गुण पाए जाते हैं। यह बुजुर्ग और गर्भवती महिलाओं के लिए बेहद जरूरी हैं। यह गुण लोगों की इम्यूनिटी के लिए भी अहम माने गए हैं।
जदुनंदन ने बताया कि मैने खुद इस गोभी को खाकर देखा है। प्रयोग के तौर पर इसका असल स्वाद समझने के लिए मैंने इसे सलाद के तौर पर खाया। इसके स्वाद में मुझे हल्कापन लगा जैसे सामान्य गोभी हल्की सी स्वाद में तेज होती है उसकी एक गंध होती है, मगर इस गोभी में ऐसा नहीं है।
कभी दूसरों के खेतों में थे मजदूर, आज कमा रहे लाखों
जदुनंदन वर्मा आज अपने गांव में अपनी खेती को लेकर बेहद मशहूर हैं, लेकिन कुछ साल पहले तक वह दूसरे के खेतों में मजदूरी करते थे। पलायन कर के आसपास के जिलों में मजदूरी करने जाते थे। मगर अपनी मेहनत के दम पर इन्होंने 7 एकड़ जमीन लीज पर लेकर खेती शुरू की। धीरे-धीरे अपने काम को आगे बढ़ाया और अब इनका खुद का खेत है।
लगभग पौने 2 एकड़ के अपने खेत में केला, फूलगोभी, टमाटर, शिमला मिर्च और गांठ गोभी की खेती कर रहे हैं। बचपन गरीबी और अभाव में बीता तो स्कूल छोड़ दिया था। लगभग 30 साल बाद इन्होंने फिर से दसवीं की कक्षा पास की और कुछ नया सीखने की लगन की वजह से खेती में ही डिप्लोमा कोर्स किया। हर साल जदुनंदन लगभग 3 लाख रुपए की आय खेतों से हासिल करते हैं।
बनना चाहते थे वैज्ञानिक, अब बेटा पूरा करेगा सपना
जदुनंदन वर्मा बताते हैं कि इन्हें पढ़ने और खेती किसानी के नए-नए प्रयोगों को करने का बेहद शौक था। इसी वजह से वह कृषि वैज्ञानिक बनना चाहते थे। मगर गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाले वर्मा को जिस उम्र में पढ़ाई करनी थी, तब हाथ में फावड़ा और कुदाली आ गई और वह मजदूरी करने लगे। मगर अब अपने बेटे को पढ़ा रहे हैं। कृषि वैज्ञानिक बनने का सपना बेटा रोहन पूरा करेगा। 12वीं के बाद अब वो एग्रीकल्चर युनिवर्सिटी में एडमिशन की तैयारी में जुटा हुआ है।
खुद सीखी नई चीजें, औरों को भी सिखाते हैं
जदुनंदन ने कई बार जिले के कृषि अधिकारियों से भी संपर्क किया और यह कहा कि उन्हें ट्रेनिंग दी जाए मगर सरकारी अफसरों का रवैया कुछ खास गंभीर नहीं था। इस वजह से इंटरनेट के जरिए जदुनंदन वर्मा खेती किसानी के नए तरीकों को सीखते हैं और अपने आसपास के गांव के किसानों को भी सिखाते हैं। इसी वजह से गांव में इनका दूसरा नाम कृषि वैज्ञानिक भी है।
खेत में काम करने के अलावा वर्मा ने अपनी समझ को बढ़ाने के लिए खेती में इस्तेमाल होने वाले प्रोडक्ट की एक छोटी दुकान भी शुरू की, जिससे वह कई कंपनियों के संपर्क में रहते हैं और उनसे कुछ नया जानने समझने को भी मिलता है, साथ ही साथ परिवार की आय के साधन भी बढ़ जाते हैं।
करते हैं ऑर्गेनिक खेती
जदुनंदन वर्मा ने बताया कि उनके पास गाय नहीं है, इस वजह से उनके पास गोबर नहीं होता। ऐसे में वो पड़ोसियों से गोबर लाकर ना सिर्फ खाद तैयार करते हैं बल्कि नीम के पत्ते और दूसरी चीजों से कुदरती कीटनाशक भी तैयार करते हैं। उन्होंने बताया कि उनके खेत में अब पहले के मुकाबले कम कीड़े लगते हैं।
यह प्रयोग वो आसपास के दूसरे किसानों को भी सिखा रहे हैं, लेकिन यह थोड़ा मेहनत और समय देने वाला काम है इसलिए किसान अक्सर रासायनिक प्रोडक्ट की तरफ भागते हैं। वर्मा ने कहा कि मेरी कोशिश है कि मैं ऑर्गेनिक काम ही करूं यदि शासन की तरफ से कोई सहयोग मिले तो मैं शायद अपने काम को और बेहतर तरीके से कर पाऊंगा।

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