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स्वदेश विशेष: कब है शंकराचार्य जयंती, जानें उनसे जुड़े कुछ अनछुए तथ्य

कौन थे शंकराचार्य के गुरु

भगवत गोविंदपाद जिनको शंकर जैसे प्रतिभासंपन्न और हिंदू धर्म के पुनरुत्थान के कार्य में लगे महापुरुष ने अपना गुरु बनाया, कौन थे? वेदांत तत्वज्ञान का स्रोत वेद मंत्र है। इसको संसार के समक्ष प्रकट करने वाले महर्षि बादरायण थे। महर्षि ने अपने पुत्र एवं शिष्य शुकदेव मुनि को यह ज्ञान प्रदान किया। शुकदेव ने भी शंकराचार्य की भांति बचपन से ही संन्यास ले लिया था। वे जीवन पर्यंत इस वेदांत प्रधान वैदिक धर्म का प्रचार करते रहे। बद्रिकाश्रम में उन्होंने अनेक शिष्यों को इसकी शिक्षा दी। शुकदेव के उप वर्ष और गौड़पाद नामक दो शिष्य हुए। गौड़पाद ही शंकराचार्य के गुरु थे।

गॉड पाद दक्षिण भारत के रहने वाले थे बचपन से ही उनकी इच्छा थी कि वे जीवन में कोई महान कार्य करें अतः वे महर्षि पतंजलि के पास विद्या अध्ययन के लिए गए। अनुशासन भंग करने के संदेह में महर्षि पतंजलि ने गौड़पाद को तिरस्कृत करते हुए अभिशाप दिया – जाओ किसी योग्य शिष्य को ढूंढकर महाभाष्य पढ़ाना. जब तक तुम किसी को पढ़ आओगे नहीं, तब तक महाभाष्य तुमको याद रहेगा। मैं अब किसी को महाभाष्य नहीं पढ़ाऊंगा। गुरु को प्रणाम करके क्षुब्धमन से गौड़पाद वहां से चले। घूमते-घूमते उज्जयिनी के पास उनको एक व्यक्ति मिला। उसे देखकर गौड़पाद का मन बरबस उसकी और खिंच गया। उन्हें विश्वास हो गया कि यही व्यक्ति है जिसकी वह इतने दिनों से खोज कर रहे हैं। उसका नाम चंद्र शर्मा था। उसके मन में व्याकरण पढ़ने की तीव्र अभिलाषा थी। गौड़पाद ने उसे ग्राम व्याकरण पढ़ाया। उसके पश्चात वे हिमालय में श्री बद्रिका आश्रम को चले गए और शुकदेव मुनि से वेदांत धर्म की शिक्षा लेकर गौड़पदाचार्य हो गए। शंकराचार्य के गुरु गोविंदपाद इन्हीं गौड़पादाचार्य के शिष्य थे। प्राचीन पुस्तकों से पता चलता है कि गोविंदपाद ही चंद्र शर्मा थे।

आदि शंकराचार्य जीवन क्रम

-शंकराचार्य उच्च कोटि के संन्यासी, दार्शनिक और अद्वैतवाद के प्रवर्तक के रूप में प्रसिद्ध हैं।

-आचार्य शंकर का जन्म विक्रम संवत 845 तदनुसार सन 788 में वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को केरल के ग्राम कालडी में हुआ।

-बचपन से ही शंकर शांत एवं गंभीर स्वभाव के थे। उनकी बुद्धि बहुत तेज थी। उन्होंने 1 वर्ष की आयु में मलयालम और संस्कृत बोलना आरंभ कर दिया था।

-3 वर्ष की आयु में उनके पिता का देहांत हो गया था।

-32 वर्ष के छोटे से जीवन में उन्होंने ऐसे कार्य कर दिखलाएं जो उनसे चौगुनी उम्र वाला व्यक्ति भी संपन्न नहीं कर सकता।

-इस अल्प आयु में उन्होंने सुप्रसिद्ध ‘ब्रह्मसूत्र भाष्य’ के अतिरिक्त 11 उपनिषदों तथा गीता के भाष्यों की रचना की।

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