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स्वस्तिक का बायां हिस्सा होता है गणेश जी का शक्ति स्थान, हमेशा रोली, हल्दी या सिंदूर से बनाएं स्वस्तिक

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नई दिल्ली। भारतीय संस्कृति की पहचान बने स्वस्तिक चिह्न को दरअसल गूढ़ रहस्यों से जुड़ा हुआ माना जाता है। ‘स्वस्तिक क्षेम कायति, इति स्वस्तिक:’ अर्थात कल्याण करने वाला प्रतीक है स्वस्तिक। हिंदु धर्म की हर पूजा-अर्चना में पवित्र स्वस्तिक जरूर उपस्थित होता है। ऋग्वेद में इसे सूर्य का प्रतीक माना गया है और उसकी चार भुजाओं को चार दिशाओं की उपमा दी गई है। सिद्धांत सार ग्रंथ में इसे विश्व ब्रह्मांड का प्रतीक चित्र माना गया है। इसकी चार भुजाएं ब्रह्मांड की ऊर्जा के फैलाव की दिशा बताती हैं। अन्य ग्रन्थों में चार युगों से भी इसे जोड़ा गया है। इसे गणपति का चिह्न कहा जाता है।
अन्य ग्रन्थों में चार युगों से भी इसे जोड़ा गया है। इसे गणपति का चिह्न कहा जाता है। स्वस्तिक का बायां हिस्सा गणेश जी की शक्ति का स्थान माना जाता है, जिसका बीज मन्त्र ‘गं’ होता है। इसमें जो चार बिंदियां होती हैं, उनमें गौरी, पृथ्वी, कच्छप और अनंत देवताओं का वास बताया जाता है। इसे बनाते समय भी विशेष ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि दो सीधी रेखाएं एक-दूसरे को काटते हुए आगे चलकर जब अपने दायीं ओर मुड़ें तो ही इसका स्वरूप कल्याणकारी बनता है। इसे बायीं ओर मोड़ कर बनाना कार्य-अनुष्ठान के लिए अशुभ हो जाता है।
आजकल भले ही यह सजावटी चीजों में भी बनाया जाने लगा हो, लेकिन यह अति पवित्र और कल्याणकारी ऊर्जा लिए मंगल चिह्न है, जो घर, कार्यालय या किसी भी महत्व की चीज में देवों के पूजन के प्रतीक रूप में बनाया जाना चाहिए। वास्तु में भी माना जाता है कि किसी भी स्थान की नकारात्मकता दूर करने के लिए स्वस्तिक बना देना उस स्थल की ऊर्जा के लिए कल्याणकारी होता है। सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार, जिस मनुष्य के शरीर में रेखाएं स्वस्तिक का चिह्न बनाती हैं, वह परम भाग्यशाली माना जाता है। माना जाता है कि ऐसा मनुष्य जहां भी जाता है, उसका अनुकूल प्रभाव दूसरों पर पड़ता है, जिससे दूसरे लाभान्वित होते हैं। हिंदू धर्म में ही नहीं, कई अन्य धर्मों में भी इसका उल्लेख मिलता है। बौद्ध मान्यता में इसे वानस्पतिक संपदा का प्रतीक माना गया है। इसे बनाने का भी विधान है। धार्मिक कार्यों में सदैव रोली, हल्दी या सिंदूर से स्वस्तिक बनाना चाहिए।

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