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चीन को भारत का जबाव, दोनों देश की सीमा के आखिरी गांव में आयोजित किया राष्ट्रीय बौद्ध सम्मेलन

चीन द्वारा हाल ही में अरुणाचल प्रदेश की 11 जगहों का नामकरण करने की कोशिश की गई थी, जिसके बाद अब भारत ने इसका करारा जवाब दिया है। भारत की ओर से अरुणाचल प्रदेश में भारत-चीन सीमा पर बसे आखिरी गांव जेमिथांग में गोरसम स्तूप में नालंदा बौद्ध धर्म पर सोमवार को एक दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन में 600 बौद्ध प्रतिनिधि शामिल हुए। इसके साथ ही इस सम्मेलन में अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने भी शिरकत की। यह बेहद दुर्लभ है कि हिमालयी क्षेत्र के बौद्ध नेता इतनी बड़ी संख्या में एक साथ आए हैं। भारत के पक्ष में इसे एक जोरदार समर्थन माना जा रहा है। वहीं दूसरी ओर चीन का तिलमिलाना तय माना जा रहा है।
दरअसल अरुणाचल के तवांग में तिब्बती बौद्ध धर्म का दूसरा सबसे बड़ा और अहम मठ है। पांचवें दलाई लामा के सम्मान में साल 1680-81 में मेराग लोद्रो ग्यामत्सो ने इस मठ की स्थापना की थी। तवांग मठ और तिब्बत के ल्हासा में स्थित मठ के बीच ऐतिहासिक संबंध रहे हैं। तवांग मठ के चलते ही अरुणाचल के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में रहने वाली कुछ जनजातियों का तिब्बत के लोगों से सांस्कृतिक संबंध है। यहां के मोनपा आदिवासी तिब्बती बौद्ध धर्म को ही मानते हैं।
जेमीथांग ही वो जगह, जहां से दलाई लामा पहली बार भारत में दाखिल हुए :
कार्यक्रम में अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने कहा कि बौद्ध संस्कृति ना सिर्फ संरक्षित करने की जरूरत है, बल्कि इसका प्रचार करने की भी जरूरत है। खांडू ने कहा कि राज्य में बौद्ध आबादी का एक बड़ा हिस्सा है और सौभाग्य से उन्होंने धार्मिक उत्साह के साथ अपनी संस्कृति और परंपराओं को सुरक्षित रखा है। पेमा खांडू ने ये भी कहा कि जेमीथांग ही वो जगह है, जहां से दलाई लामा पहली बार भारत में दाखिल हुए। ऐसे में यहां सम्मेलन का आयोजन अहम है। पेमा खांडू ने ये भी कहा कि नालंदा विश्वविद्यालय के स्कॉलर्स आचार्य संतरक्षिता और नागार्जुन आदि ने ही तिब्बत में बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार किया। मुख्यमंत्री ने कहा कि मुझे गर्व है कि हम अरुणाचली ऐसा ही कर रहे हैं।

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