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ईश्वर ही एकमात्र गुरु हैं

जो ईश्वर से प्रेम करता है, वह एक शिक्षक बनने में कदापि प्रसन्न नहीं हो सकता। वह जानता है कि ईश्वर ही एकमात्र गुरु है। मैं स्वयं को आपके चरणों की रज के समान अनुभव करता हूं। आपमें से प्रत्येक में मैं उस सर्वशक्तिमान परमात्मा को देखता हूं, इसी अनुभूति के कारण मैं ऐसा कहता हूं। मुझे इस धरती से बहुत पहले ही चले जाना था। मैं इस शरीर को दिव्य ज्वाला में विलीन कर देना और मैल को जला देना चाहता हूं, ताकि यह शरीर, जो अनंत ईश्वर से पृथक दिखाई देता है, मेरा अंग न रहे। एक दिन मैं चला जाऊंगा, परंतु जब तक मैं इस पृथ्वी पर हूं, जो मेरी इच्छाओं के साथ अंतसंपर्क में है और मुझ पर विश्वास करते हैं, उन्हें यह बताने में मुझे महानतम प्रसन्नता होगी कि मैं केवल यह चाहता हूं कि उनकी रुचि उस ‘प्रकाश’ में हो, जिसने मुझे अवर्णनीय सांत्वना, स्वतंत्रता और आश्वासन दिया है। अंधकार से परे, समस्त प्रकाशों के प्रकाश… वे सभी हृदयों में विराजमान हैं। उस प्रकाश में मैं उन सबको देखता हूं, जो आए थे और चले गए। मैं समस्त सृष्टि को देखता हूं, और उन घटनाओं को भी देखता हूं, जो अनेक वर्ष पूर्व घटित हुई थीं। विश्व का इतिहास उस पार शाश्वत अभिलेखागार में संरक्षित है। यह एक दूसरा ही आयाम है। यहां इस सीमित जगत में हम लंबाई, चौड़ाई और मोटाई देखते हैं, परंतु एक और लोक है, जहां यह तीन आयाम नहीं हैं, सब पारदर्शी है। प्रत्येक वस्तु केवल चेतना है। स्वाद का भाव चेतना है। सुगंध का भाव चेतना है। हमारी भावनाएं, हमारे विचार और हमारा शरीर और कुछ नहीं केवल चेतना है। जिस प्रकार हम स्वप्न में देख, सुन, सूंघ, चख और स्पर्श कर सकते हैं, उसी प्रकार उस उच्चतर लोक में हम इन सब संवेदनाओं को विशुद्ध चेतना द्वारा अनुभव करते हैं। इस समय आपसे बातें करते हुए भी मैं यही देख रहा हूं। मैं इस शरीर में नहीं हूं, मैं जो कुछ भी विद्यमान है, उस सबका एक अंश हूं। ये सब वस्तुएं जिन्हें मैं देख रहा हूं, मेरे लिए उतनी ही वास्तविक हैं, जितने कि इस कमरे में बैठे हुए आप सब। इस बात का बोध करने के लिए कि ईश्वर सर्वत्र है, आपको जाग्रत होना पड़ेगा। आपको यह समझना पड़ेगा कि आप स्वप्न देख रहे हैं। आप सब इस स्वप्न में यहां बैठे हैं, और इस स्वप्न के एक भाग हैं। अनेक बार मैं इस कमरे को अनंतता में देखता हूं, और कई बार अनंतता को इस कमरे में देखता हूं। सभी वस्तुओं का जीवन उसी एक शाश्वत स्रोत की देन है। मानवीय प्रेम की लालसा न करें, यह समाप्त हो जाएगा। मानवीय प्रेम के पीछे ईश्वर का आध्यात्मिक प्रेम है। उसे खोजें। घर के लिए या धन के लिए या प्रेम के लिए या मित्रता के लिए प्रार्थना न करें। इस संसार की किसी वस्तु के लिए प्रार्थना न करें। ईश्वर जो कुछ आपको देते हैं, केवल उसी में आनंदित रहें। अन्य सब कुछ माया की ओर ले जाता है। मनुष्य पृथ्वी पर केवल ईश्वर को जानना सीखने के लिए आया है, वह किसी और कारण से यहां नहीं है। यही ईश्वर का सच्चा संदेश है। जो उन्हें खोजते हैं और उनसे प्रेम करते हैं, उन सबको वे उस महान जीवन के विषय में बताते हैं, जहां कोई पीड़ा नहीं है, कोई वृद्धावस्था नहीं है, कोई युद्ध नहीं है, कोई मृत्यु नहीं है— केवल शाश्वत आश्वासन है। उस जीवन में कुछ भी नष्ट नहीं होता। वहां केवल वर्णनातीत आनंद है, जो कभी फीका नहीं पड़ता—एक आनंद जो नित्य नवीन रहता है। अत इस कारण ईश्वर की खोज करना उचित ही है। वे सभी भक्त जो सच्चाई से उन्हें खोजते हैं, वे उन्हें अवश्य प्राप्त करेंगे। जो ईश्वर को प्रेम करना चाहते हैं और उनके साम्राज्य में प्रवेश करने की लालसा रखते हैं और जो सच्चे हृदय से उन्हें जानना चाहते हैं, वे उन्हें पा लेंगे। दिन और रात उनके लिए आपके मन में इच्छा सदा बढ़ती रहनी चाहिए। वे आपको दिए गए वचन को अनंतता तक निभा कर आपके प्रेम का प्रत्युत्तर देंगे और आप अंतहीन आनंद और सुख को जान जाएंगे। सब प्रकाश है, सब आनंद है, सब शांति है, सब प्रेम है। वे ही सब कुछ हैं।

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