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पादपों को सबसे पहले परिचित करानेवाला ग्रंथ है वृक्ष आयुर्वेद : सबसे पहले भारत में हुई पादपों की पहचान, ऋषि पराशर वनस्पति विज्ञान के जनक

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  • बीएचयू बॉटनी विभाग के विभागाध्यक्ष बोले- फादर ऑफ बॉटनी है ऋषि पराशर

शोधार्थी डॉ. निवेदिता शर्मा

एजेंसी, नई दिल्ली

विश्व भर में वनस्पति विज्ञान के जनक के रूप में जिनका सम्मान के साथ नाम लिया जाता है वह ग्रीस के प्रसिद्ध दार्शनिक एवं प्रकृतिवादी थिओफ्रैस्टस हैं। जबकि अब इस संबंध में आया शोध बता रहा है कि विश्व में यदि सबसे पहले पादपों की पहचान कहीं हुई तो वह भारत है। यहां इसके लिए पराशर ऋषि ने प्रमाणिक ग्रंथ लिखा है जिनमें तमाम पादपों की पहचान, जड़, तने को लेकर बहुत ही सूक्ष्म तरीके से की गई है।

मिट्टी को लेकर वन एवं पर्यावरण मंत्रालय भारत सरकार में अनुसंधानकर्ता रहते हुए शोध करने वाली डॉ. निवेदिता शर्मा ने अपने एतिहासिक संदर्भों के अध्ययन के आधार पर व बॉटनी के अब तक के हुए अध्ययनों के निष्कर्ष के तहत वनस्पति विज्ञान का पितामह होने का श्रेय किसी को दिया जाना चाहिए तो वह ऋषि पराशर हैं। जिन्होंने सबसे पहले वनस्पति विज्ञान को लिपिबद्ध करने का काम किया है।

दरअसल, ईसा पूर्व 372 में एरेसस में जन्में थिओफ्रैस्टस के अब तक प्राप्त वनस्पति विज्ञान संबंधी दो निबंधों के आधार पर पूरी दुनिया में यह स्थापित कर दिया गया कि वे ही सर्वप्रथम वनस्पति विज्ञान से दुनिया को परिचित करनेवाले वैज्ञानिक हैं, जबकि वृक्ष आयुर्वेद को लेकर निकाली गई काल गणना के बाद अब यह स्पष्ट हो गया है कि उनसे छह हजार साल पूर्व ऋषि पराशर ने इस ग्रंथ को लिखकर यह सिद्ध कर दिया था कि भारत के लिए यह विषय नया नहीं है।


महाभारत काल से पहले की है ऋषि पराशर की उपस्थिति: ऋषि पराशर के बारे में एतिहासिक संदर्भों में कहें तो वे महर्षि वसिष्ठ के पौत्र हैं। महाभारत ग्रंथ को इतिहासकार अपनी काल गणना के अनुसार ईसा से कम से कम पांच हजार साल पुराना बताते हैं, यहां पराशर शर-शय्या पर पड़े भीष्म से मिलने गये थे। पौराणिक आख्यानों में आया है कि परीक्षित के प्रायोपवेश के समय उपस्थित कई ऋषि-मुनियों में वे भी थे। उन्हें छब्बीसवें द्वापर के व्यास के रूप में भी मान्यता दी गई।

वृक्ष आयुर्वेद में है वनस्पति विज्ञान के कई रहस्यों की चर्चा

अपनी बात को पुख्ता करने के लिए वे वृक्ष आयुर्वेद के उदाहरण के साथ उनके लिखे अन्य ग्रंथों के बारे में भी बताती हैं। वे कहती हैं कि इस एक ग्रंथ में ही किसी बीज के पौधे बनने से लेकर पेड़ बनने तक संपूर्णता के साथ वैज्ञानिक विवेचन दिया गया है, वह विस्मयकारी है। इस वृक्ष आयुर्वेद पुस्तक के छह भाग हैं- (पहला) बीजोत्पत्ति काण्ड (दूसरा) वानस्पत्य काण्ड (तीसरा) गुल्म काण्ड (चौथा)वनस्पति काण्ड (पांचवां) विरुध वल्ली काण्ड (छटवां) चिकित्सा काण्ड। इस ग्रंथ के प्रथम भाग बीजोत्पत्ति काण्ड में आठ अध्याय हैं जिनमें बीज के वृक्ष बनने तक की गाथा का वैज्ञानिक पद्धति से विवेचन किया गया है। इसका प्रथम अध्याय है बीजोत्पत्ति सूत्राध्याय, इसमें महर्षि पराशर कहते हैं- पहले पानी जेली जैसे पदार्थ को ग्रहण कर न्यूक्लियस बनता है और फिर वह धीरे-धीरे पृथ्वी से ऊर्जा और पोषक तत्व ग्रहण करता है। फिर उसका बीज के रूप में विकास होता है और आगे चलकर कठोर बनकर वृक्ष का रूप धारण करता है। दूसरे अध्याय भूमि वर्गाध्याय में पृथ्वी का उल्लेख है।

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