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घरेलू यात्राओं पर पाबंदी बढ़ा सकता है कोरोना का संक्रमण, यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो का शोध

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नई दिल्ली । देश एक बार फिर से कोरोना जैसी जानलेवा बीमारी की गंभीर चपेट में है। इसकी दूसरी लहर पहली लहर से ज्यादा खतरनाक है। स्थितियां ज्यादा डरावनी हैं। सवाल यह है कि क्या लोगों को एक जगह रोककर इस महामारी पर काबू पाया जा सकता है? क्या इसके संक्रमण को रोकने के लिए घरेलू यात्राएं प्रतिबंधित कर देना जायज है? जैसा कि इसकी पहली लहर के दौरान ट्रेन, बस और विमान पर प्रतिबंध लगाकर किया गया था, जबकि इसके उलट उस दौरान सरकार की पाबंदियों के बाद देश के अलग-अलग हिस्सों से प्रवासी श्रमिक पैदल मीलों की यात्रा तय कर अपने घर पहुंचे थे। घरेलू यात्राओं पर यह प्रतिबंध कितना जायज है, इस पर यूनिवर्सिटी और शिकागो की तरफ से एक अध्ययन किया गया। हालिया इस अध्ययन में भारत समेत चीन, इंडोनेशिया, फिलीपींस, दक्षिण अफ्रीका और केन्या जैसे देशों को शामिल किया गया। इस अध्ययन के मुताबिक कोरोना संक्रमण के प्रसार को रोकने के लिए घरेलू यात्राओं पर लगाया गया प्रतिबंध अनुचित हो सकता है। सरकार की ओर से निर्धारित प्रतिबंध की अवधि के आधार पर संक्रमण और ज्यादा प्रभावी हो सकता है, खासकर जब एक बड़ी शहरी-ग्रामीण प्रवासी आबादी साथ हो। शिकागो यूनिवर्सिटी के शिक्षाविद के मुताबिक, स्थिति को नियंत्रित करने के उद्देश्य से यात्राओं पर लगाया गया प्रतिबंध स्थितियों को बिगाड़ सकता है, खासकर तब जब एक शहरी क्षेत्र में बड़ी आबादी ग्रामीण श्रमिकों की होती है और आप उन्हें उनके घर जाने से रोकते हैं। स्थिति को समझने के लिए शोधकर्ताओं ने यात्राओं पर पाबंदी, शहरी-ग्रामीण प्रवास और संक्रण के डाटा का अध्ययन किया है। इसके आधार पर वे कहते हैं कि लॉकडाउन का मुख्य उद्देश्य इन प्रवासियों को अपने घर जाने से रोकना था, ताकि संक्रमण के प्रसार को रोका जाए। इसका नतीजा सबसे सामने है। इसे मुंबई की स्थिति से बेहतर तरीके से समझा जा सकता है।
ऐसे किया गया शोध
अध्ययन के लेखक और द इनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट, साउथ एशिया के डायरेक्टर अनंत सुदर्शन बताते हैं कि पहली लहर में किया गया देशव्यापी लॉकडाउन प्रवासी श्रमिकों को बड़े शहरों में कैद कर दिया, जहां संक्रमण तेजी से फैल रहा था। स्थिति की भयावहता को देख कर लोग अपने-अपने घर लौटना चाहते थे, लेकिन सरकार की तरफ से इन्हें एक लंबी अवधि तक रोक कर रखा गया। इनकी यात्रा पर पाबंदी हटाना कितना सही निर्णय रहा, इसे इस बात से भी समझ सकते हैं कि जिन्हें श्रमिक एक्सप्रेस व अन्य साधनों से जल्दी घर लौटा दिया गया, वहां संक्रमितों की संख्या बेहद कम रही। इसके उलट जहां बड़ी संख्या में श्रमिक शहरों में कंटोनमेंट जोन में लंबे समय तक फंसे रह गए, वहां मजदूर जब अपने गंतव्य की ओर लौटे तो वहां भी केस बढ़ गए। कारण साफ था, उनका कंटोनमेंट जोन में लंबे समय तक फंसे रहना।

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