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अफगानिस्‍तान को लेकर हर्ट ऑफ एशिया की बैठक में जयशंकर ने गिनाए तीन अहम बिंदु

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नई दिल्‍ली । तजाकिस्‍तान की राजधानी दुशांबे में अफगानिस्‍तान में शांति को लेकर चल रही हर्ट ऑफ एशिया-इस्‍तांबुल प्रोसेस की 9वीं बैठक में शामिल भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कुछ खास बात कहीं हैं। उन्‍होंने बेहद स्‍पष्‍ट शब्‍दों में कहा कि भारत अफगानिस्‍तान में दोहरी शांति का पक्षधर है। इसमें एक शांति अफगानिस्‍तान के अंदर की है जो उसके विकास में अहम योगदान देगी तो दूसरी शांति है अफगानिस्‍तान से संबंधित पड़ोसी देशों में। उन्‍होंने ये भी कहा कि अफगानिस्‍तान में शांति के लिए ये बेहद जरूरी है कि सभी पक्षों को एक दूसरे पर भरोसा हो।

साथ ही अफगानिस्‍तान में शांति के पक्षधर के रूप में शामिल सभी सदस्‍य इसका एक राजनीतिक समाधान ढूंढने के लिए प्रतिबद्ध हों। उन्‍होंने ये भी साफ कर दिया है कि ये बेहद जरूरी है कि अफगानिस्‍तान में शांति को लेकर हार्ट ऑफ एशिया प्रक्रिया के सिद्धांतों का पालन हर कीमत पर हो। अफगानिस्‍तान के संदर्भ में जयशंकर ने अमेरिका के उस प्रस्ताव का भी समर्थन किया जिसमें यूएस ने संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में शांति प्रक्रिया की बात कही है। इसमें अमेरिका ने रूस, चीन, पाकिस्तान, ईरान, भारत और अमेरिका के विदेश मंत्रियों को शामिल करने की बात कही है।

आपको बता दें कि अफगानिस्‍तान की शांति प्रक्रिया में भारत पहली बार शामिल हो रहा है। इससे पहले भारत को इस प्रक्रिया से बाहर रखा गया था। अफगानिस्‍तान में शांति को लेकर तालिबान और अमेरिका के बीच में फरवरी 2020 में एक समझौता हुआ था। इस समझौते में कहा गया था कि अमेरिका मई 2020 तक अपने सभी जवानों को अफगानिस्‍तान से वापस ले जाएगा। हालांकि पिछले दिनों बाइडन ने इस बात की भी आशंका जताई थी कि हो सकता है कि अमेरिका अपने जवानों को अफगानिस्‍तान से निकालने की तय सीमा से आगे बढ़ जाए।

हालांकि उन्‍होंने ये भी साफ कर दिया था कि अब अमेरिका यहां पर लंबे समय तक नहीं रहेगा। इसके जवाब में तालिबान ने कहा था कि अमेरिका को अपनी कही गई बात पर टिके रहना होगा। यदि ऐसा नहीं हुआ तो ये उसके लिए गलत होगा। यहां पर ये भी बताना जरूरी है कि अफगानिस्‍तान में शांति के लिए जो समझौता तालिबान और अमेरिका के बीच में पूर्व राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप के कार्यकाल में दोहा में हुआ था कि उसके तहत तालिबान से अफगानिस्‍तान में हमले कम करने की भी अपील की गई थी, जिसको पूरा नहीं किया गया है। अफगानिस्‍तान में तालिबान के हमले लगातार जारी है। हर्ट ऑफ एशिया की बैठक को लेकर जयशंकर ने सिलसिलेवार तरीके से कई ट्वीट कर अपनी कही बातों की जानकारी दी है।

अफगानिस्‍तान में शांति को लेकर हर्ट ऑफ एशिया में जो भी कुछ सामने आया है उससे ये बात साफ हो गई है कि भारत चाहता है कि अमेरिका अभी वहां पर बना रहे। साथ ही भारत इस बात का भी पक्षधर है कि वहां पर लोकतांत्रिक सरकार ही बनी रहे। भारत पहले भी कभी तालिबान के पक्ष में नहीं रहा है। जिस वक्‍त अफगानिस्‍तान में तालिबान का शासन था उस वक्‍त भी पाकिस्‍तान समेत कुछ गिने-चुने देशों ने उसको मान्‍यता दी थी। भारत ने कभी भी तालिबान को सही नहीं माना है। भारत हमेशा से ही उसको निरंकुश और आतंकी संगठन बताता आया है।

हर्ट ऑफ एशिया की बैठक में जयशंकर ने तालिबान का जिक्र करते हुए कहा कि भारत चाहता है कि अफगान सरकार और तालिबान के बीच बातचीत की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाना चाहिए। भारत इसका समर्थन करता है। गौरतलब है कि हार्ट ऑफ एशिया प्रक्रिया की शुरुआत 2011 में हुई थी। इसका मकसद अफगानिस्‍तान में शांति को लेकर मजबूत विकल्‍पों को तलाशना और इस पर अंतरराष्‍ट्रीय सहमति बनाना है।

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