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जमीन खरीद विवाद पर बढ़ा जांच का दबाव, भविष्य में ऐसी डील के लिए ली जा सकती है एक्सपर्ट की मदद

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नई दिल्ली. धर्मनगरी अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण करा रहे श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं. ऐसे में ट्रस्ट पर जांच कराने को लेकर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है. आम आदमी पार्टी और समाजवादी पार्टी ने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि जिस जमीन की कीमत 2 करोड़ रुपये थी, उसे 5 मिनट बाद ही 18.5 करोड़ में खरीदकर बड़ा घोटाला किया गया है. जमीन के लेन-देन के दौरान ट्रस्ट के तीन सरकारी प्रतिनिधियों से मदद या राय नहीं मांगी गई थी. इस ट्रस्ट में केंद्रीय गृह मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के साथ यूपी सरकार के एक सीनियर ऑफिसर और अयोध्या के जिलाधिकारी हैं. लेकिन ऐसा लग रहा है कि जमीन का सौदा मुख्य रूप से ट्रस्ट के सचिव और विहिप नेता चंपत राय और सदस्य अनिल मिश्रा के द्वारा किया गया. इतना ही नहीं इस ज़मीन का कोई स्वतंत्र या विशेषज्ञ मूल्यांकन भी नहीं किया गया था. ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास के प्रतिनिधि महंत कमल नयन दास ने ट्रस्ट के सदस्यों पर किसी भी फैसले की सूचना अध्यक्ष को नहीं देने का आरोप लगाया है. ट्रस्ट के एक अन्य सदस्य ने नाम न छापने की शर्त पर बात करते हुए कहा कि लेन-देन को टाला जा सकता था. साथ ही उन्होंने कहा कि ट्रस्ट को जमीन बेचने वालों के आने का इंतजार करना चाहिए था न कि ट्रस्ट को मांगना चाहिए था. सदस्य ने कहा, ‘ऊपर से देखें तो ये डील जनता की नजर में संदेहास्पद लगती है.’ पूरे घटनाक्रम पर केंद्र सरकार की कड़ी नजर है. कहा जा रहा है कि केंद्र भविष्य में इस तरह की खरीद के लिए एक बेहतर प्रक्रिया पालन करने के पक्ष में है. इसके तहत जमीन का मूल्यांकन करने के लिए विशेषज्ञों की एक कमेटी का गठन किया जा सकता है. इसी दौरान ये कमेटी जमीन बेचने वालों से बातचीत भी कर सकती है. ट्रस्ट को ये भी सुझाव दिया जा सकता है कि इस तरह के लेनदेन और कानूनों की बारीक वैधता का अध्ययन करने के लिए ट्रस्ट में तीन सरकारी प्रतिनिधियों की मदद लें. बता दें कि अयोध्या के प्रमुख संत जैसे राम जन्मभूमि मंदिर के मुख्य पुजारी सत्येंद्र दास, हनुमानगढ़ी के पुजारी राजू दास और स्वामी स्वरूपानंद सौदे पर सवाल उठा रहे हैं. निर्वाणी अखाड़े के महंत धर्म दास, जो सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर मामले में एक पक्षकार थे उन्होंने ट्रस्ट को ‘भ्रष्ट’ करार दिया है. जबकि रामल्या ट्रस्ट के स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने जांच की मांग की है. इसके अलावा उन्होंने ट्रस्ट से चंपत राय और अनिल मिश्रा को हटाने की मांग की है. ट्रस्ट के एक सदस्य ने बताया कि इन सभी संतों को सरकार द्वारा राम मंदिर ट्रस्ट में सदस्यों के रूप में शामिल नहीं किया गया था. और इसी के चलते ये सब पहले से ही नाराज हैं. बता दें कि गुरुवार को ताजा खुलासे के बाद ट्रस्ट ने चुप्पी साध ली है. समाजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी द्वारा इस मामले को उजागर करने के बाद अब यूपी में कांग्रेस भी ट्रस्ट को घेरने में जुट गई है. समाजवादी पार्टी अब अपने नेता और अयोध्या के पूर्व विधायक पवन पांडे द्वारा इस मामले का खुलासा करने के बाद अब और अधिक सतर्क हो गई है. समाजवादी पार्टी के एक नेता ने बताया, ‘हमें एक संतुलन बनाए रखना होगा. क्योंकि हम उत्तर प्रदेश में 2022 के चुनाव से पहले अपने हिंदू मतदाता को बदनाम नहीं सर सकते. आप और कांग्रेस की यूपी में बहुत कम हिस्सेदारी है, इसलिए वे जितना चाहें उतना आगे बढ़ सकते हैं. हम जांच की मंग करते हैं.’ केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि ऐसे विपक्षी दल हमेशा मंदिर के खिलाफ थे और ट्रस्ट द्वारा इसके निर्माण में बाधा डालना चाहते थे. मौर्य ने कहा है कि अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश देने वाले समाजवादी पार्टी के नेताओं को इस मामले पर बोलने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है. समाजवादी पार्टी ने हालांकि कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के मामले को निपटाने के बाद वो मंदिर निर्माण के विरोध में नहीं है.

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