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हिंद महासागर में सैन्‍य अभ्‍यास: भारत ने चीन को दिया संदेश, संकट की घड़ी में अकेले नहीं हैं हम

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नई दिल्‍ली। क्‍वाड सदस्‍य देशों के बीच हिंद महासागर में चल रहे सैन्‍य अभ्‍यास को देखकर चीन की चिंता स्‍वाभाविक है। खासकर तब जब इस अभ्‍यास में अमेरिका के साथ भारत की नौसेना भी हिस्‍सा ले रही है। चीन ने इस पर प्रतिक्रिया भी दी है। चीन एकलौता मुल्‍क है, जिसने युद्धाभ्‍यास पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। चीन ने कहा कि क्‍वाड सदस्‍य देशों के बीच सैन्‍य अभ्‍यास या सहयोग क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के अनुकूल होना चाहिए। अक्‍सर देशों के बीच सैन्‍य अभ्‍यास चलता है, लेकिन इस तरह की प्रतिक्रिया पहली बार आई है। हालांकि चीन ने क्‍वाड शिखर सम्‍मेलन के दौरान भी अपनी तीखी प्रतिक्रिया दी थी।

भारत का चीन का संदेश, अकेले नहीं है हम

प्रो. हर्ष पंत का कहना है कि जिस तरह से चीन दक्षिण सागर में अपना प्रभुत्‍व बढ़ा रहा है, यह भारत के लिए खतरे की घंटी है। चीन के साथ दक्षिण चीन सागर में जो हालात पैदा हो रहे हैं उससे भारत को अपनी नीति में थोड़ा बदलाव करना होगा। उन्‍होंने कहा कि भारत ने परिस्थितियों के अनुरूप फैसला भी लिया है। चीन की चुनौती को देखते हुए भारत ने दूसरे देशों के साथ सामरिक रिश्‍तों को पहले से ज्‍यादा मजबूत किया है। इस नौसेना अभ्‍यास को इस कड़ी के रूप में देखा जाना चाहिए।

इस अभ्‍यास के जरिए भारत कहीं न कहीं यह महसुस करना चाहेगा कि वह अकेला नहीं है। उसके साथ अमेरिका, जापान, फ्रांस और ऑस्‍ट्रेलिया भी खड़ा है। भारत की सैद्धांतिक नीति पर कायम है कि वह किसी गुट में शामिल नहीं है, लेकिन वह अपनी सामरिक हितों की अनदेखी नहीं कर सकता। उन्‍होंने जोर देते हुए कहा कि इस तरह के युद्धाभ्‍यास के जरिए भारत अपने विरोधियों को यह संदेश देना चाहता कि वह अकेला नहीं है अमेरिका उसके साथ खड़ा है।

उन्‍होंने कहा कि वर्ष 1991-92 से अमेरिका और भारत इस तरह के सैन्‍य अभ्‍यास करते आ रहे हैं। इसके अलावा युद्धाभ्‍यास नौसेनाओं के बीच बेहतर आदान-प्रदान और काम को सहजता के स्‍तर को बढ़ाने में भी सहायक है। भारतीय नौसेना को युद्ध लड़ने के लिए अपने कौशल को बेहतर बनना होगा। नौसेना की जरूरतों के साथ संतुलन बनाना होगा। सामरिक चुनौती को देखते हुए नौसेना के बजट की समीक्षा जरूरी है। रक्षा बजट के कुछ फीसद से अब काम चलने वाला नहीं है। इसके अलावा भारत को अन्‍य विकल्‍पों पर भी विचार करने की जरूरत है। भारत के क्वाड का सदस्‍य बन जाने के बाद अब चीजें आसान हो गई हैं। भारत, अमेरिका से लंबी अवधि के लिए युद्धपोत पट्टे पर ले सकता है।

भारत को घेरने की चीन की क्‍या है तैयारी

चीन का मध्‍य एशिया मे प्रवेश भारत के लिए कतई ठीक नहीं है। चीन और ईरान ने हाल में एक बड़े समझौते पर हस्‍ताक्षर किए हैं। ईरान में चीन की मौजूदगी भारत और अमेरिका के लिए खतरे की घंटी है। इसके गंभीर मायने हैं। दरअसल, तेल आपूर्ति मार्गों के भौगोलिक संदर्भ में ईरान का अपना महत्‍व है। अगर यहां चीन का दखल बढ़ा तो इससे तेल मार्गों में बाधा उत्‍पन्‍न हो सकती है। इसके अलावा चीन हिंद महासागर क्षेत्र में एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता के रूप में उभरा है। म्‍यांमार, श्रीलंका और पाकिस्‍तान को सैन्‍य उपकरण मुहैया करा रहा है। इन देशों के लिए चीन सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है। हाल में बांग्‍लादेश ने चीनी पनडुब्बियों को अधिग्रहण किया है। हिंद महासागर क्षेत्र में भारत पर इसका असर पड़ेगा।

उन्‍होंने कहा कि चीन नौसेना ने पहली बार वर्ष 2008-09 में पायरेसी रोकने के लिए हिंद महासागर में प्रवेश किया। इसके बाद चीन की नौसेना यही डट गई। बाद में चीन के रणनीतिकारों ने यह तय किया कि हिंद महासागर के उन क्षेत्रों में उसकी उपस्थिति बनी रहे, जो उसके लिए सामरिक रूप से उपयोगी है। चीन ने पिछले दशक में हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति कई गुना बढ़ाई है।

हिंद महासागर में चीन भारत के लिए एक बड़ी चुनौती के रूप में उभरा है। भारत को यह समझना होगा कि चीन की सीमा देश से मिलती है। इसके साथ अब उसने समुद्री निकटता भी हासिल कर ली है। युद्ध की स्थिति में चीन कुछ घंटों में ही भारत की समुद्री सीमा में प्रवेश करने की स्थिति में है। भारत के लिए यह चिंता का विषय है। भारत को अपनी नौसेना की क्षमता में वृद्धि करनी चाहिए। नौसेना के उपकरणों में इजाफा किया जाना चाहिए।

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