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ग्लोबल वार्मिंग या प्रदूषण का असर, प्रचंड गर्मी से 2030 तक आर्कटिक में पिघल जाएगी समुद्री बर्फ

  • आर्कटिक महासागर में प्रचंड गर्मी से 2023 तक समुद्री बर्फ पूरी तरह पिघल जाएगी।
  • जीव-जंतुओं का प्राकृतिक आवास और अस्तित्व गहरे संकट में फंस जाएगा।
    नई दिल्ली ।
    दिनोंदिन बढ़ते प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग ने बड़ा संकट पैदा कर दिया है। जैसे-जैसे धरती का तापमान बढ़ रहा है, उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव पर बर्फ तेजी से पिघलने लगी है। जलवायु परिवर्तन के कारण पूरी दुनिया में मौसम का क्रम भी बिगड़ने लगा है। इस कारण दुनिया के कई देश भीषण गर्मी, बाढ़ की विभीषिका और जंगलों में भीषण आग का सामना कर रहे हैं।
    2030 तक आर्कटिक में पूरी तरह पिघल जाएगी समुद्री बर्फ
    एक नए अध्ययन में विज्ञानियों ने चिंता जताई है कि वर्ष 2030 तक आर्कटिक में समुद्री बर्फ पूरी तरह पिघल जाएगी। इससे जहां महासागर का जलस्तर बढ़ने से द्वीपों के डूबने का खतरा पैदा होगा, वहीं ध्रुवीय भालू जैसे कई जीव-जंतुओं का प्राकृतिक आवास और अस्तित्व गहरे संकट में फंस जाएगा। इस अध्ययन के निष्कर्ष को नेचर जर्नल में प्रकाशित किया गया है।
    ग्रीन हाउस गैसों से प्रकृति को हुआ बहुत नुकसान
    दक्षिण कोरिया में पोहांग यूनिवर्सिटी आफ साइंस एंड टेक्नोलाजी में येओन-ही किम के नेतृत्व में शोधकर्ताओं की एक अंतरराष्ट्रीय टीम द्वारा किए गए अध्ययन में चिंता जताई गई है कि ग्रीन हाउस गैसों (जीएचजी) के लगातार उत्सर्जन से प्रकृति को बहुत नुकसान हो रहा है। स्थिति यह है कि पहले के पूर्वानुमानों से दस वर्ष पहले ही बर्फ पूरी तरह पिघल सकती है।
    ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन बर्फ पिघलने का कारण
    2021 में आई आइपीसीसी की छठी क्लाइमेट रिपोर्ट में कहा गया था कि इस सदी के अंत तक आर्कटिक के ग्लेशियर खत्म हो जाएंगे, लेकिन नई रिपोर्ट के मुताबिक आने वाले 10 साल में ही ग्लेशियर पूरी तरह से पिघल जाएंगे। इससे आर्कटिक पर रहने वाले जीव जन्तुओं का घर छिन जाएगा।
    विज्ञानियों की बढ़ी चिंता
    अध्ययन में कहा गया है कि ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को बर्फ के पिघलने का प्रभावी कारक पाया गया है। इसके साथ ही मानवीय गतिविधियां तेज होने, एंथ्रोपोजेनिक एयरोसोल, सौर और ज्वालामुखीय दबाव के अलावा प्राकृतिक आंतरिक परिवर्तनशीलता सहित अन्य कारक भी विज्ञानियों की चिंता का कारण है। इससे आर्कटिक समुद्र के भीतर और बाहर पारिस्थितिकी तंत्र पर भारी प्रतिकूल असर पड़ेगा।

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