दृष्टिकोण: जीवन में होती है प्रतिध्वनि

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जीवन में भी प्रतिध्वनि होती है। हम जैसा व्यवहार दूसरों से करते हैं, वैसा ही व्यवहार हमारे साथ होता है।

एक बच्चा खेलने निकला था। वह काफी दूर निकल गया और वह एक पहाड़ी पर पहुंच गया। पहाड़ी के शिखर पर पहुंचकर वह बहुत खुश हुआ और चिल्ला कर बोला- अरे वाह, मैं पहाड़ी पर पहुंच गया। तब पहाड़ी के दूसरी ओर से भी यही आवाज आई कि अरे वाह, मैं पहाड़ी पर पहुंच गया। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। उसे लगा कि कोई व्यक्ति पहाड़ी के दूसरी तरफ से बोल रहा है। उसने चिल्लाकर पूछा- पहाड़ी के दूसरी तरफ कौन है? तो उधर से भी यही आवाज गूंजी- पहाड़ी के दूसरी तरफ कौन है।

बच्चे को लगा कि कोई छिपकर उसकी नकल उतार रहा है। उसने क्रोध से कहा- तुम बहुत बुरे हो। उधर से भी यही आवाज आई। वह बोला मैं तुमसे नफरत करता हूं। यह कहकर वह घर लौट आया।घर आकर उसने अपनी मां से सारी घटना कह सुनाई। मां ने हंसकर कहा कि वह किसी और की नहीं, तुम्हारी ही आवाज थी।

उस पहाड़ी पर जो भी बोलो, उसकी प्रतिध्वनि आती है यानी तुम्हारी आवाज ही लौटकर आती है। वह बच्चा बहुत खुश हुआ। वह अगले दिन सुबह ही पहाड़ी पर पहुंच गया और बोला- तुम बहुत अच्छे हो, तो उधर से भी यही आवाज आई। वह बोला- मैं तुमसे प्यार करता हूं। उधर से जब उसने अपनी ही आवाज सुनी, तो उसे बहुत अच्छा लगा।

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