Home भोपाल संस्कृति के संरक्षण हेतू जरूरी है संस्कृत भाषा : प्रमोद

संस्कृति के संरक्षण हेतू जरूरी है संस्कृत भाषा : प्रमोद

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भोपाल। संस्कृत भाषा वैज्ञानिक भाषा है। हमारी पहचान हमारी संस्कृति से है और संस्कृति की जड़ में संस्कृत है। उक्त बातें संस्कृत भारती के क्षेत्र संगठन मंत्री प्रमोद पंडित ने संस्कृत भारती जनपद सम्मेलन का शुभारंभ करते हुए कही हैं। रविवार को रवीन्द्र भवन में आयोजित जनपद सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत संघचालक अशोक जी पाण्डेय, भाजपा विधायक कृष्णा गौर, करुणाधाम आश्रम के सुदेश शांडिल्य जी महाराज ने भी संबोधित किया। समान सत्र में मंत्री ओमप्रकाश सखलेचा के साथ माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. केजी सुरेश, संस्कृत भारती के प्रांत संगठन मंत्री नीरज दीक्षित, अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विवि के कुलपति पो. रामदेव भारद्वाज, जन अभियान परिषद के महानिदेशक बीआर नायडू ने भी संबोधित किया।

संस्कृत सभी भाषाओं की जननी

जनपद सम्मेलन के शुभारंभ सत्र में बतौर मुख्य अतिथि अपने संबोधन में भाजपा विधायक कृष्णा गौर ने कहा कि संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है। उन्होंने कहा कि हमें संस्कृत बोलना नहीं आती, लेकिन उन्होंने मंच से कहा कि अब जब दूसरी बार संस्कृत भारती के सम्मेलन में आएंगी तो संस्कृत भाषा में संबोधित करेंगी। कार्यक्रम के सचिव भरत बाथम द्वारा संपूर्ण सम्मेलन की रूपरेखा बताई गई। इसी सत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत संघचालक अशोक पांडे जी ने भी अपने विचार रखे। कार्यक्रम में करुणाधाम आश्रम के परम पूज्यनीय सुदेश शांडिल्य जी का सानिध्य भी प्राप्त हुआ। शांडिल्य जी ने बताया कि संस्कृत बोलने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। संस्कृत बोलने में विसर्ग और अनुस्वार का उपयोग होता है, जिसमें योग की दो क्रियाएं होती है कपाल भारती और प्राणायाम, ये बेहतर स्वास्थ्य के लिए उपयोगी है।

लघु नाटिका का प्रदर्शन

कार्यक्रम में संस्कृत पर आधारित चलचित्र एवं लघुनाटिका का प्रदर्शन भी हुआ। इस दौरान संस्कृत विषय में उच्च प्रदर्शन करने वाले छात्रों का सम्मान भी किया गया।

संस्कृत को जनमानस की भाषा बनाने में जुटी है संस्कृत भारती

जनपद सम्मेलन के समापन सत्र के मुख्य वक्ता संस्कृत भारती के प्रांत संगठन मंत्री नीरज दीक्षित ने संबोधित करते हुए कहा कि संस्कृत की आवश्यकता हमारे जन्म के प्रारंभ से ही शुरू होती है। चूंकि हमारे षोडश संस्कार संस्कृत भाषा से ही संपन्न होती है। वर्ष 1981 से संस्कृत भारती संस्कृत भाषा को जनमानस की भाषा बनाने हेतु कार्य कर रही है क्योंकि हमारी संस्कृति की जड़ संस्कृत ही है। उन्होंने आह्वान किया कि सभी लोग अपने बच्चों को संस्कृति से जोडऩे के लिए संस्कृत भाषा की पढ़ाई कराए। संस्कृत भारती देश भर में लोगों को संस्कृत से जोडऩे के लिए बड़ा प्लेटफार्म उपलब्ध कराया है।

तमिल में 60 प्रतिशत संस्कृत शब्द

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. केजी सुरेश ने कहा कि मेरी मातृभाषा मलयालम है। मलयालम में 60 प्रतिशत से अधिक शब्द संस्कृत भाषा से मिलते हैं। सभी भारतीय भाषाओं के मूल में संस्कृत है। जब मैं भारतीय जनसंचार संस्थान में महानिदेशक था, तब लालबहादुर संस्कृत विवि से समझौता कर संस्कृत में तीन माह का पाठ्यक्रम शुरू किया था। अब भोपाल में केंद्रीय संस्कृत विवि से माखनलाल विवि का ऐसा ही समझौता जल्द होगा, जिससे छात्रों को संस्कृत में मदद मिलेगी। उन्होंने कहा की संवादहीनता के कारण अंगे्रजी व अन्य भाषाओं से संस्कृत को अलग रखने का कार्य किया गया है। अगर इसे खत्म करना है तो उन लोगों की भाषाओं में संस्कृत को समझाएं। इसके साथ ही अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विवि के कुलपति प्रो. रामदेव भारद्वाज, जन अभियान परिषद के महानिदेशक बी.आर. नायडू ने भी अपने विचार रखे। कार्यक्रम में भोपाल महानगर के सभी नगरों से संस्कृत भारती के कार्यकर्ता सम्मिलित हुए। कार्यक्रम स्थल पर विज्ञान में संस्कृत विषय पर प्रदर्शनी भी लगाई गई थी, जिसका सभी अतिथियों ने अवलोकन किया एवं भूरी-भूरी प्रशंसा की। इस अवसर प्रकाशित स्मारिका का भी विमोचन अतिथियों द्वारा किया गया।


पूरा विज्ञान संस्कृत में समाया हुआ है : सखलेचा

  • संस्कृत भारती जनपद सम्मेलन में वक्ताओं ने बताया संस्कृत भाषा ही सर्वश्रेष्ठ

भोपाल। संस्कृत व विज्ञान का बारीकी से अध्ययन करें तो एक ही बात निकली है कि पूरा विज्ञान संस्कृत भाषा में समाया हुआ है। संस्कृत से विस्तृत और संस्कृत से समृद्ध कोई भाषा नहीं है। विश्व की अधिकांश भाषाओं का मूल संस्कृत भाषा ही है। उक्त बातें प्रदेश के लघु, सूक्ष्म, उद्यम मंत्री ओमप्रकाश सखलेचा ने संस्कृत भारती जनपद सम्मेलन के समापन सत्र को संबोधित करते हुए कही हैं। समापन सत्र को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित करते हुए मंत्री श्री सखलेचा ने कहा कि हमारी भाषा, संस्कृति कितनी विकसित व एडवांस थी कि प्रकृति को बचाने के लिए हम पेड़ों में देवी-देवताओं का वास बताते। गाय को माता कहते हैं। संस्कृत भाषा और भारत की सनातन सभ्यता के आगे विज्ञान कहीं नहीं ठहरता। विश्व में ऐसी कोई मशीन नहीं है जो मनुष्य के लिए अनुपयोगी पदार्थ को 6 घंटे में डिकंपोज कर उपयोगी बना सके, लेकिन हमारे संस्कृति में है। गाय जो खाती है, उसे 6 घंटे में डिकंपोज कर हमारे उपयोग के लिए गोबर बना देती है। ऐसा विज्ञान में आज तक संभव नहीं हो सका है। पहले के जमाने के गुरुकुल शिक्षा ही नहीं जीवन जीने की कला सिखाते हैं।

आर्थिक युग की तरफ आए तो आध्यात्म पीछे छूट गया

मंत्री श्री सखलेचा ने कहा कि मैकाले ने कहा था कि जब तक भारत की शिक्षा व संस्कृति को नहीं बिगड़ेगी, राज नहीं कर सकते। अगर तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय ब्रिटेन में हों तो ब्रिटेन 500 साल तक विश्व में शासन कर सकता है। इतनी अच्छी हमारी शिक्षा पहले रही है। यह है हमारी पुरानी शिक्षा पद्धति और संस्कृत भाषा, लेकिन गुलामी के समय संस्कृत भाषा को खत्म करने के लिए कहा गया कि जो अंगे्रजी में पढ़ेगा, उसे ही सरकारी नौकरी मिलेगी। गुलामी के समय उन्हें अच्छा अंध फालोवर, अच्छा दास चाहिए था। कोरोना ने भी हमें यही सिखाया कि गांव में देश भारत बसता है। आत्मनिर्भर होना चाहिए, प्रकृति को बचाना चाहिए। हम जितना जल्दी संस्कृत भाषा और संस्कृति को मानेंगे, उतना जल्दी भारत महान बनेगा।

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