भोपाल गैस त्रासदी विशेषः पुलिस की आलोचना होती है, भोपाल गैस त्रासदी के दिन भी हुई

Share on facebook
Facebook
Share on twitter
Twitter
Share on linkedin
LinkedIn
Share on pinterest
Pinterest
Share on pocket
Pocket
Share on whatsapp
WhatsApp
  • डॉ. स्वराज पुरी, (तत्कालीन पुलिस अधीक्षक, भोपाल और पुलिस महानिदेशक पद से सेवानिवृत्त)


एक मित्र का लेख मेरी नजर में आया कि भारत एक लाख की आबादी पर 136 पुलिस वाले ही हैं। यह अनुपात दो- तीन दिसंबर 1984 को और भी कम था, जब मैं भोपाल गैस त्रासदी से जूझ रहा था। आज संयुक्त राष्ट्र का मापदंड एक लाख की आबादी पर 222 पुलिसकर्मियों का है। भारत का क्या होगा सोचने का प्रश्न है। गैस त्रासदी की उस रात की एक घटना का वर्णन करता हूं। अगले दिन प्रात: सूरज निकल रहा था। कड़कड़ाती ठंड थी। गैस त्रासदी के दौरान मैंने तत्काल संबंधितों को अवगत कराया और मैं स्वयं कंट्रोल रूम से रेलवे स्टेशन पहुंचा। रास्ते में प्राय: सन्नाटा था, इक्का-दुक्का लोगों का आवागमन हो रहा था।

रेलवे स्टेशन पर पहुंचा तो पूर्व सूचना होने के कारण तत्समय के रेलवे स्टेशन भोपाल के मुख्य गेट पर रुककर मैं तत्कालीन आयुक्त श्री रंजीत सिंह का इंतजार करने लगा। अन्य अधिकारी आ गए थे, जिनमें जीआरपी थाना के प्रभारी स्वर्गीय निरीक्षक एचएस बिल्ला ऊहापोह की स्थिति में दिखे। मैं अपने वरिष्ठ अधिकारी के आगमन के दबाव में, देर रात से निरंतर गैस के प्रभाव के कारण एक अजीब झुंझलाहट में था। रेलवे स्टेशन के मुख्य द्वार के सामने अंडाकार आकार के पार्क के पास पहुंचा जिसके पास ही जीआरपी थाना था। पार्क में लोगों को बेतरतीब सोते हुए देखकर परेशान हो उठा। श्री एच.एस. बिल्ला को इस बात के लिए डांटना शुरू किया कि वे लोग कौन हैं जो यहां पर सो रहे हैं और आप क्या देख रहे हैं।

श्री बिल्ला अलग से मुझसे कुछ बात करना चाह रहे थे। मेरी मन: स्थिति सुनने की नहीं थी। मैं तत्काल कार्यवाही चाहता था। इस स्थिति को भांपते हुए श्री बिल्ला ने मेरी जैकेट को पकड़कर झकझोर दिया और कहा-मेरी बात सुन लीजिए। तब मेरी चेतना लौटी। ‘ये सभी लाशें हैं। 26 लोगों की इन लाशों को नियत स्थान पर पहुंचाने के लिए एक उपनिरीक्षक को गाड़ी लाने के लिए भेजा है। 26 मौतें एक साथ देखकर मैं अंदर तक हिल गया और मुझे रात को सड़क पर भागते हुए नागरिक, मेरे आदेश पर ड्यूटी पर पहुंचे पुलिस कर्मी और अन्य लोग ध्यान में आने लगे जो निरंतर मौत से जूझ रहे थे।

घटना का यह वर्णन उस रात की भयावहता की मात्र एक झांकी है। स्टेट्स ऑफ पोलिसिंग इन इंडिया 2019 की रिपोर्ट देखने को मिली जिसमें उल्लेख है कि पिछले दशकों में केंद्र से करोड़ों रुपए राज्यों के पुलिस बल को आधुनिक बनाने के लिए उपलब्ध कराए गए हैं। शासन के लिए आधुनिकता का मतलब तेज रफ्तार गाडिय़ां, घातक हथियार, बेहतर संचार उपकरण या भवनों के निर्माण तक सीमित है। आजादी के बाद पुलिस का व्यवहार एक सबसे महत्वपूर्ण पक्ष होना था जो किसी की चिंता का विषय नहीं है। एक अलग ही समाज ‘पुलिस समाज बनता दिख रहा है।
आमतौर पर भारत में पुलिसकर्मी 18 से 25 वर्ष की उम्र तक नियुक्त हो जाते हैं।

पुलिस का अंग बनने के पहले ही वे समाज के मूल्यों का एक बोझ अपनी पीठ पर लेकर यह नई जिंदगी शुरू करते हैं। भारतीय समाज में आम नागरिकों के बीच दुर्भावनाएं अब तक प्रचलित हैं- जैसे दलित, महिला आदि। यह सभी पुलिसकर्मियों के आचरण में दिखती हैं। प्रशिक्षण के दौरान ये दुर्भावना दूर हो सकती हैं पर ऐसा नहीं हो पाता। प्रशिक्षण की अवधि में मुख्य जोर शारीरिक प्रशिक्षण पर होता था। यद्यपि वर्तमान परिवेश में सामुदायिक पुलिसिंग, नागरिकों से अपने व्यवहार में सुधार तथा सहायता करने के दृष्टिकोण को भी सम्मिलित किया जा रहा है।


मेरा अपना विशेष अनुभव इस बात को मानता है कि भारतीयता, समानता और न्यायप्रियता के साथ कर्तव्य परायणता की कोई मिसाल है तो वह पुलिस ही है। यह अलग बात है कि राजनीति भारतीयता, समानता और न्याय प्रियता को कभी-कभी प्रभावित करने का प्रयास करती है। गैस के कारण गंभीर रूप से प्रभावित होकर पुलिस नियंत्रण कक्ष में तैनात एक सहायक उपनिरीक्षक के पीएस चौहान व जीआरपी में पदस्थ निरीक्षक एचएस बिल्ला भी शहीद हुए।

Never miss any important news. Subscribe to our newsletter.

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Recent News

Related News