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आईसीएमआर की मनाही के बाद भी निजी अस्पतालों में दी जा रही प्लाज्मा थैरेपी

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  • डॉक्टरों द्वारा प्लाज्मा मांगे जाने पर सोशल मीडिया पर चला रहे अभियान
  • प्लाज्मा थैरेपी को आईसीएमआर ने स्टेंडर्ड ट्रीटमेंट प्रोटोकॉल से भी हटाया, सरकारी अस्पतालों में उपयोग बंद

भोपाल। कोरोना के खतरे के बीच एक तरफ जहां अस्पतालों में ऑक्सीजन सुविधा युक्त बेड वेंटिलेटर की परेशानी है वहीं दूसरी तरफ रेमेडिसिवर इंजेक्शन, दवाओं का भी संकट परेशान कर रहा है। आईसीएमआर की रोक के बावजूद निजी अस्पतालों में कोरोना मरीजों को प्लाज्मा चढ़ाया जा रहा है। मरीज के परिजन भी प्लाज्मा के लिए ब्लड बैंक या अस्पताल ही नहीं, सोशल मीडिया पर भी दौड़ लगा रहे हैं। हालात यह है कि बीते साल शहर में जितने मरीजों को प्लजमा नहीं चढ़ाया गया जितने दो महीने में चढ़ गए। यह स्थिति तब है जब इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च ( आईसीएमआर ) प्लाज्मा थैरेपी को नकार चुका है। यही नहीं आईसीएमआर ने प्लाज्मा थैरेपी कोरेाना के स्टेंडर्ट ट्रीटमेंट प्रोटोकॉल से भी हटा दिया है। इसके बाद भी निजी अस्पतालों के डॉक्टर मरीजों के लिए प्लाज्मा मंगा रहे हैं।

सरकारी में नौ हजार तो निजी में 20 हजार का

गांधी मेडिकल कॉलेज से अब तक 180 यूनिट प्लाज्मा जारी किया जा चुका है , इनमें से 146 निजी अस्पतालों के लिए जारी हुए। यहां बाहरी मरीजों को प्लाज्मा के लिए नौ हजार रुपए खर्च करने पड़ते हैं। लेकिन बड़े निजी अस्पताल में एक युनिट के लिए 15 से 20 हजार रुपए तक लेते हैं। यही नहीं इसमें प्लाज्मा के साथ प्रोसेसिंग चार्ज, टेस्ट और बेड चार्ज अलग से जोड़ा जा रहा है।

हमीदिया अस्पताल में नहीं हो रहा उपयोग

गांधी मेडिकल कॉलेज या हमीइिया अस्पताल में मेडिकल प्रोटोकॉल के तहत प्लाज्मा पद्धति से कम ही इलाज कर रहे हैं। आईसीएमआर की स्टडी भी कह चुकी कि कोरोना रोगियों के इलाज में प्लाज्मा थैरेपी कारगर नहीं है। इतना ही नहीं कोरोना रोगियों के स्टैंडर्ड ट्रीटमेंट प्रोटोकॉल में भी उल्लेख नहीं है।

सोशल मीडिया पर लगा रहे गुहार

मरीज के परिजन प्लाज्मा के लिए दर दर भटक रहे हैं। बैंकों के चक्कर काटने के साथ ही परिजन सोशल मीडिया पर एक यूनिट के लिए गुहार लगा रहे हैं। ये लोग किसी भी कीमत पर प्लाज्मा खरीदने को तैयार भी हैं।

सरकारी डॉक्टर कह रहे- लक्षण दिखने के 3 से 5 दिन में प्लाज्मा चढ़ाएं तो उपयोगी

गांधी मेडिकल कॉलेज के एसो, प्रोफेसर डॉ पराग शर्मा बताते हैं मरीजों की क्लिनिकल कंडीशन के हिसाब से प्लाजमा थैरेपी दी जाती है। आईसीएमआर के निर्धारित नियम है कि प्लाज्मा थैरेपी मरीज में कोरोना के लक्षण होने पर तीन से पांच दिन के भीतर दी जाती है और उन्हें ही दी जाती है जिनमें कोरोना के विरुद्ध आईजीजी एंट्री बॉडी नहीं होती। यदि कोई मरीज वेंटिलेटर या एनआईवी पर है तब प्लाज्मा थैरेपी कोई काम की नहीं है।

जीएमसी में कलेक्श बैंक, लेकिन अभी डोनर ही नहीं मिल रहे

मार्च से 20 से अब तक 180 यूनिट प्लाज्मा इश्यू हो चुका है। जीएमसी में प्लाजमा कलेक्शन सेंटर बनाए हुए हैं। शनिवार को भी यहां प्लाज्मा डोनेशन कैंप का आयोजन किया गया लेकिन दिनभर में कोई भी डोनर नहीं पहुंच। ब्लड बैंक प्रभारी डॉ.़ यूएम शर्मा बताते हैं कि कोरेाना के लिए प्लाज्मा लेने की प्रक्रिया लंबी है। इसमें डोनेशन से पहले एंटीबॉडी टेस्ट, एचआईवी और अन्य बीमारियों के टेस्ट करने पड़ते हैं। सामान्यत: यह टेस्ट डोनेशन के बाद भी हो जाते हैं।


इनका कहना है
आईसीएमआर के अलावा विदेशों में हुई स्टडी में भी यह सामने आया है कि कोरोना मरीजों में प्लाज्मा थैरेपी कारगर नहीं है। वर्तमान में चल रहे कोरोना के स्टैंडर्ड ट्रीटमेंट प्रोटोकॉल में भी प्लाज्मा थैरेपी नहीं है। आईसीएमआर की ओर से जारी गाइडलाइन के अनुसार भी कोरोना मरीजों पर चल रही स्टडी में ही मरीज को प्लाज्मा दिया जा सकता है, अन्यथा नहीं।
-प्रो. सरमन सिंह, निदेशक, एम्स

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