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सीसीएफ की 47वीं ई-संगोष्ठी सह प्रशिक्षण में विषय विशेषज्ञों ने कहा-सभी वयस्क वेक्सीनेशन कराएं तो तीसरी लहर से बच सकेंगे बच्चे : डॉ. ढींगरा

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  • ब्लैक फंगस से डरे नही लेकिन व्हाट्सएप सलाह से बचें : डॉ. रमानी

स्वदेश संवाददाता, भोपाल।
कोरोना की तीसरी लहर बच्चों को प्रभावित करेगी इस पूर्वानुमान को लेकर समाज में भय का माहौल निर्मित किया जा रहा है। इस माहौल से हमें खुद को बचाना है और इस तीसरी संभाव्य लहर से ठीक वैसे ही सावधानी अपनाकर बचा जा सकता है, जैसे करोड़ों लोग दूसरी औऱ पहली लहर में सुरक्षित रहे हैं।

एम्स भोपाल में पीडियाट्रिक्स डिपार्टमेंट की प्रोफेसर डॉ. भावना ढींगरा ने आज यह जानकारी चाईल्ड कंजर्वेशन फाउंडेशन के 47वीं ई-प्रशिक्षण कार्यक्रम को संबोधित करते हुए दी। कार्यक्रम में बंसल अस्पताल की वरिष्ठ नेत्र सर्जन डॉ. विनीता रमानी ने ब्लैक फंगस को लेकर व्याप्त भय और भ्रांतियों का भी समाधान किया। फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ. राघवेंद्र शर्मा ने विषय विशेषज्ञों का धन्यवाद दिया और संगोष्ठी का संचालन फाउंडेशन के सचिव डॉ. कृपाशंकर चौबे ने किया। इस डिजिटल संगोष्ठी में 17 राज्यों के करीब दो सौ से ज्यादा प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

सुरक्षात्मक उपायों को अपनाएं

डॉ. भावना ढींगरा के अनुसार कोविड का प्रभाव बच्चों खासकर 18 से कम आयु वर्ग पर प्राकृतिक रूप से ही कम देखा गया है, क्योंकि आमतौर पर बच्चों में शुगर, हाइपरटेंशन या अन्य गंभीर बीमारियों के लक्षण वयस्कों की तरह नही होते है। कुछ विशेषज्ञ तीसरी लहर में बच्चों के प्रभावित होने का अंदेशा व्यक्त कर रहे है, लेकिन इसे लेकर भयादोहित होने की आवश्यकता नही है, क्योंकि मजबूत प्रतिरोधक क्षमता के बल पर हम दैनंदिन सुरक्षात्मक उपायों औऱ अनुशासन से अपने बच्चों को इस संभावित लहर से बचा सकते है। अभी से हमें यह प्रयास करना चाहिये कि 5 साल से अधिक के सभी बच्चों को मास्क पहनने की आदत विकसित करें।

माता-पिता से बच्चों को नहीं करें अलग

डॉ. भावना ने जोर देकर कहा कि अगर हमें बच्चों को सुरक्षित रखना है, तो घर के सभी वयस्कों को अपना वेक्सिनेशन समय पर करा लेना चाहिए। मौजूदा दौर में अगर बच्चे कोविड का शिकार होते है, तो अधिकांश मामले में यह सूक्ष्म संक्रमण ही होता है, ऐसे में केवल पैरासिटामोल के अलावा कोई भी अन्य दवा बच्चों को नही दी जानी चाहिये। आमतौर पर परिवार के संक्रमित होने पर बच्चों को अलग कर दूसरे घरों में भेजने से भी संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है, इसलिए बच्चों को माता-पिता से अलग नही किया जाना चाहिये। डॉ. भावना के मुताबिक कोविड संक्रमित मां से जन्मे बच्चे में संक्रमण का खतरा कम होता है, इसलिए प्रसव के बाद नवजात को मां बेहिचक अपना स्तनपान करा सकतीं है।

ब्लैक फंगस से ना हो भयभीत

ई-प्रशिक्षण संगोष्ठी को संबोधित करते हुए वरिष्ठ नेत्र सर्जन डॉ. विनीता रमनानी ने कहा कि ब्लैक फंगस की बीमारी से भयभीत होने की आवश्यकता नही है, कोविड से संक्रमित कुल मरीजों में से केवल 0.27 प्रतिशत लोगों में ही इसके लक्षण अभी तक पाए गए है।

उन्होंने सावधानी औऱ सतर्कता के साथ इस बीमारी को पहचानने एवं तत्काल उपचार की आवश्यकता पर जोर देते हुए बताया कि यह बीमारी शुगर, किडनी या अन्य गंभीर बीमारियों वाले मरीजों को ही ज्यादातर सामने आ रही है।

ये हैं ब्लैक फंगस के चरण

डॉ. विनीता रमनानी ने बताया कि ब्लैक फंगस के तीन चरण है पहला नाक में संक्रमण, दूसरा आंख औऱ अंतिम मस्तिष्क में। आमतौर पर लंबे समय ऑक्सीजन, वेंटीलेटर पर रहने के बाद घर लौटे मरीजों में एक से दो महीने के मध्य इस फंगस के संक्रमण का खतरा रहता है। आरम्भ में नाक में इसके लक्षण आते है जब लगातार नाक में दर्द, काला पानी या भूरे रंग की परत जमने लगती है। इसके बाद आंखों में दर्द या पुतली का न घूमना, काला घेरा निर्मित होना। इन लक्षणों के साथ तत्काल डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिये, क्योंकि तीसरी अवस्था मे यह बढ़ चढक़र सीधे दिमाग में फैल जाता है, तब इसका उपचार बहुत कठिन हो चुका होता है।

सोशल मीडिया के परामर्श से बचे

डॉ. रामनानी ने स्पष्ट किया कि शुगर का लेबल नियंत्रित रखना, पोस्ट कोविड मरीजों के लिए सबसे निर्णायक काम है। जिन मरीजों ने बगैर डॉक्टरी सलाह के स्टेरॉइड का इस्तेमाल कोविड के इलाज में किया है, उनके लिए फंगस का खतरा अधिक है। किसी भी मॉडल गाइडलाइन में आम लोगों के लिए स्टेरॉइड की सलाह नही दी गई है इसलिए जो लोग व्हाट्सएप मेसेज को देखकर इनका सेवन कर रहे है, वे अपने लिए गंभीर बीमारियों को न्यौता दे रहे है।

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