Home भोपाल बाघ,तेंदुआ के साथ अब चीतों के लिए भी जाना जायेगा मप्र

बाघ,तेंदुआ के साथ अब चीतों के लिए भी जाना जायेगा मप्र

19
0
  • भारत ही नहीं समूचे एशिया में विलुप्त है चीता की जगह
  • देश में 73 साल बाद चीता की वापसी
  • कूनो पालपुर नेशनल पार्क में आएंगे 14 चीते
  • एनटीसीए से मिली मंजूरी
  • शुरूआती तैयारी के लिए 14 करोड़ रुपये देगी केंद्र सरकार


स्वदेश ब्यूरो , भोपाल।

देश में 73 साल बाद चीते की वापसी हो रही है। खास बात यह कि देश से विलुप्त हुई इस प्रजाति के पुनर्वास के लिए मध्यप्रदेश के कूनो पालपुर को चुना गया है। श्योपुर व मुरैना जिले के इस नेशनल पार्क में इन्हें बसाया जायेगा । पहले चरण में नवंबर में दक्षिण अफ्रीका से 14 चीतों की आमद इस पार्क में होगी। इसकी शुरूआती तैयारियों के लिए भारत सरकार 14 करोड़ रुपये भी देगी।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट की साधिकार समिति की उप समिति ने मध्य प्रदेश के साथ झारखंड और राजस्थान में भी चीता को बसाने की संभावनाएं तलाश की थीं, पर सबसे उत्कृष्ट जगह कूनो पालपुर पाई गई। वैज्ञानिकों ने पार्क की जलवायु और भौगोलिक स्थिति को पूरी तरह से चीता के अनुकूल बताया । इसके बाद भारत सरकार ने इस पर मोहर लगा दी है। बुधवार को राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) का सहमति पत्र भी प्रदेश के वन विभाग को मिल गया है।

भारत ही नहीं समूचे एशिया में विलुप्त है चीता

देश में 73 साल बाद चीता की वापसी हो रही है। वर्ष 1947 में ली गई सरगुजा महाराज रामानुशरण सिंह के साथ चीते की तस्वीर को आखिरी माना जाता है। वर्ष 1952 में भारत सरकार ने चीते को विलुप्त जीव घोषित कर दिया था। अभी एशियाई चीते पूरी तरह विलुप्ति के कगार पर हैं, केवल ईरान के पास 50 चीते हैं।

इन्हें मिली चीतों को लाने की जिम्मेदारी

दक्षिण अफ्रीका से चीता लाने की जिम्मेदारी प्रदेश में वन विभाग के लुप्तप्राय वन्यजीव ट्रस्ट, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण और भारतीय वन्यजीव संस्थान को सौंपी गई है। चीता देने से पहले दक्षिण अफ्रीका के विशेषज्ञ यहां की व्यवस्थाएं देखना चाहते थे। गत 26 अप्रैल को वहां से एक विशेषज्ञ श्री विंसेंट कूनो पालपुर आए थे। उन्होंने दो दिन पार्क में रुककर पूरी व्यवस्था देखी और सहमति दी। भारतीय वन्यजीव संस्थान देहरादून के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. वाईबी झाला सहित अन्य वैज्ञानिक कूनो पालपुर को चीता के लिए पहले ही अनुकूल बता चुके हैं। भारत के वैज्ञानिकों का दल भी इस दिशा में लगातार अध्ययन करते रहा है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here