Home भोपाल छोला विश्रामघाट में रोपे जाएंगे 56 प्रजातियों के 6500 पौधे

छोला विश्रामघाट में रोपे जाएंगे 56 प्रजातियों के 6500 पौधे

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  • तीन माह में 24 हजार पौधे रोपने का लक्ष्य, 12 जून से होगी शुरूआत, मियावाकी तकनीक का करेंगे उपयोग


स्वदेश संवाददाता, भोपाल


राजधानी भोपाल के छोला विश्राम घाट परिसर में पर्यावरण दिवस के अवसर पर पहली बार जापान की मियावाकी तकनीक पर आधारित पौधरोपण किया जाएगा। यह पहला अवसर है जब किसी विश्रामघाट पर इस तकनीक से पौधरोपण किए जाने की तैयारी चल रही है। छोला विश्रामघाट में 12 जून को एक साथ लगभग 6500 पौधे लगाए जाएंगे। पौधरोपण का यह कार्य श्रीराम आस्था मिशन फाउंडेशन और छोला विश्राम घाट समिति मिलकर कर रही है। फाउंडेशन के सदस्यों की मानें तो पौधरोपण लगभग 2 एकड़ जमीन पर होगा। जिससे परिसर में आने वाले तीन सालों में एक डेंस फॉरेस्ट विकसित हो जाएगा। पौधरोपण की तैयारी को लेकर विश्रामघाट में गड्डे खोद फेंसिंग से जुड़ा कार्य किया जा रहा है।

56 प्रजाति के पौधे लगाए जाएंगे

छोला विश्रामघाट में कुल 24 हजार पौधे लगाए जाने का लक्ष्य है। पौधरोपण का यह कार्य 12 जून से शुरू होकर अगले तीन महीने तक चलेगा। चारु त्रिपाठी ने बताया कि फाउंडेशन की ओर से पूरे परिसर में 56 प्रजातियों के पौधे लगाए जाएंगे। इनमें ज्यादातर वो प्रजाति लगाई जाएगी जो आसानी से प्रदेश में उपलब्ध है। यह पौधे वन विभाग की अहमदपुर स्थित नर्सरी से खरीदे जाएंगे।

ये होंगी प्रमुख प्रजातियां

पौधारोपाण में मुख्य रूप से बबूल, सफेद बबूल, इमली, बेल, महानीम, काला सीरस, सतपरनी, सीताफल, कदंब, नीम, कचनार, सेमल, पलाश, अकउआ, करोंदा, आम, मेंहदी, आंवला, अमरुद, अनार, जामुन आदि प्रजाति के पौधे लगाए जाएंगे। साथ ही पौधरोपण में अंतिम संस्कार के बाद एकत्रित की हुई राख का उपयोग खाद के रूप में किया जाएगा। क्योंकि छोला विश्राम घाट परिसर में अंतिम संस्कार की प्रक्रिया में गोकाष्ट का उपयोग किया जाता है जो पौधो के लिए लाभदायक होगा।

तकनीक के यह हैं फायदे

02 फीट चौड़ी और 30 फीट पट्टी में 100 से भी अधिक पौधे रोपे जा सकते हैं। पौधे पास-पास लगने से मौसम की मार का असर नहीं पड़ता और गर्मियों के दिनों में भी पौधे के पत्ते हरे बने रहते हैं। पौधों की ग्रोथ दोगुनी गति से होती है। जहां दूर-दूर होने वाले पौधारोपण को पांच साल तक देखरेख का समय देना पड़ता है। मियावाकी तकनीक से लगे पौधे तीन साल में ही बढ़ जाते हैं। कम स्थान में लगे पौधे एक ऑक्सीजन बैंक की तरह काम करते हैं और बारिश को आकर्षित करने में भी सहायक हैं। इस तकनीक का इस्तेमाल केवल वन क्षेत्र में ही नहीं बल्कि घरों के गार्डन में भी किया जा सकता है।

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