लेबनान में आया सबसे बड़ा बिजली संकट, दो सबसे बड़े पावर स्टेशन बंद होने से अंधेरे में डूबा देश

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बेरुत। चीन और भारत के बाद पश्चिम एशिया के देश लेबनान में सबसे बड़ा बिजली संकट आया है। ईंधन की कमी के कारण यहां के दो सबसे बड़े बिजली स्टेशनों के बंद होने के बाद पूरे देश में बिजली नहीं है। इस कारण यह देश अंधेरे में डूब गया है। कुछ दिनों तक बिजली कटौती जारी रहेगी। पश्चिम एशिया का यह देश पहले से कई और समस्याओं का सामना कर रहा है।

भारत के कई राज्यों में बिजली किल्लत

उधर, विद्युत उत्पादक संयंत्रों में कोयले की घोर किल्लत के चलते भारत के कई राज्यों में बिजली किल्लत बढ़ती जा रही है। झारखंड में आपूर्ति में कमी के कारण 285 मेगावाट से लेकर 430 मेगावाट तक की लोड शेडिंग करनी पड़ी। इसके चलते दिन में गांवों में आठ से दस घंटे तक की कटौती हुई। वहीं, बिहार में पांच गुना अधिक कीमत पर भी पूरी बिजली नहीं मिल पा रही है।

ऊर्जा विकास निगम के मुताबिक राज्यों को डिमांड के मुकाबले काफी कम बिजली सेंट्रल पूल से मिल रही है। नेशनल पावर एक्सचेंज में भी बिजली का टोटा है। पूरे देश में लगभग 10 हजार मेगावाट बिजली की कमी बताई जा रही है। इसकी वजह से नेशनल पावर एक्सचेंज में बिजली की प्रति यूनिट दर में चौतरफा वृद्धि हो गई है।

सामान्य तौर पर पांच रुपये प्रति यूनिट में मिलने वाली बिजली दर प्रति यूनिट 20 रुपये हो गई है। बिजली संकट की बड़ी वजह विद्युत उत्पादक संयंत्रों को कोयले की घोर किल्लत है। झारखंड के बिजली उत्पादक संयंत्रों के पास भी सीमित कोयले का भंडार है। राज्य सरकार ने बढ़ी दर पर नेशनल पावर एक्सचेंज से बिजली खरीदने की पहल की है, लेकिन इसकी उपलब्धता नहीं है। त्योहार के कारण आने वाले दिनों में यह संकट और बढ़ सकता है।

चीन में उत्पादन में कमी से आया बिजली संकट

पिछले दिनों चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने प्रदूषण, असमानता और वित्तीय अस्थिरता को दूर करने का संकल्प लिया था। लिहाजा उन्होंने प्रदूषण से मुक्ति पाने के लिए थर्मल बिजली संयंत्रों को आदेश दिया कि वे प्रदूषण को कम करें। नियमों का पालन न करने के कारण कई बिजली संयंत्रों को बंद कर दिया गया। इस कारण चीन में बिजली का उत्पादन कम हो गया। कई बिजली कंपनियों ने बड़ी आद्योगिक इकाइयों को बिजली देनी बंद कर दीं। कहीं-कहीं शहरों में पावर कट भी लागू करने पड़े हैं।

गलत नीतियां बनीं चीन में बिजली संकट का कारण

चीन इस समय कई दशक के सबसे गंभीर बिजली संकट का सामना कर रहा है। इसका दुष्प्रभाव चीन की पूरी सप्लाई चेन पर पड़ रहा है। इससे महामारी के बाद सुधार की राह पर चल रही वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी नुकसान की आशंका जताई जा रही है। मोटे तौर पर इस संकट का कारण कोयले पर चीन की निर्भरता है। हालांकि विदेश नीति की एक रिपोर्ट में इसके लिए सरकार की नीतियों को भी वजह बताया गया है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार ने नीतिगत स्तर पर कुछ गलत फैसले किए। साथ ही, महामारी की शुरुआत में बाजार पर पड़ने वाले असर के आकलन में भी सरकार से चूक हुई। बिजली संकट का ही नतीजा रहा कि सितंबर में चीन के औद्योगिक उत्पादन में गिरावट आई। कोरोना के चलते लगे लाकडाउन के हटने के बाद से पहली बार इसमें गिरावट दर्ज की गई।

रिपोर्ट में कहा गया, बिजली उत्पादकों को चुकाई जाने वाली कीमत सरकार तय करती है, लेकिन कोयले की कीमतें वैश्विक बाजार पर निर्भर हैं। वैश्विक स्तर पर कोयले की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। ऐसे में महंगे कोयले के साथ घाटे में बिजली बेचना संयंत्रों के लिए संभव नहीं है। बहुत से संयंत्र किसी तकनीकी खराबी का हवाला देकर या फिर जरूरी कोयला खरीदने में असमर्थता जताकर बिजली उत्पादन कम कर रहे हैं। यही बिजली की किल्लत का कारण बन रहा है। चीन में 70 प्रतिशत बिजली उत्पादन कोयले पर निर्भर है।

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