तालिबान ने अब मीडिया पर भी बैठाया पहरा

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  • सरकार के खिलाफ किसी भी प्रकार की रिपोर्ट के प्रकाशन पर लगाया बैन

काबुल। तालिबान की तरफ से नई मीडिया गाइडलाइन जारी किए जाने के बाद अफगानिस्तान में अभिव्यक्ति की आजादी खतरे में आ गई है। अफगानिस्तान की सत्ता पर कब्जा करने वाले संगठन ने एलान किया है कि उसके कथित प्रशासन के खिलाफ किसी भी मीडिया हाउस या न्यूज एजेंसी को समाचार प्रकाशित अथवा प्रसारित करने की इजाजत नहीं होगी।

खामा प्रेस ने अफगानिस्तान पत्रकार सुरक्षा समिति के हवाले से अपनी रिपोर्ट में कहा है कि बादक्षण प्रांत के स्थानीय अधिकारियों ने मीडिया हाउसों को समीक्षा और प्रमाणन के बाद ही किसी भी समाचार के प्रकाशन अथवा प्रसारण का आदेश दिया है। सूचना एवं संस्कृति विभाग के प्रांतीय निदेशक मुइजुद्दीन अहमदी ने कहा कि महिलाओं को सार्वजनिक रूप से रिपोर्टिग का अधिकार नहीं दिया गया है। महिला मीडियाकर्मी दफ्तर में पुरुषों से अलग काम कर सकती हैं।

257 मीडिया संस्थान बंद

तालिबान के इस आदेश के बाद कुछ पत्रकार देश छोड़ चुके हैं, तो कुछ छुप गए हैं। महिलाओं को तो काम भी छोड़ना पड़ा है। मीडिया की मदद करने वाली संस्था एनएआइ का कहना है कि अफगानिस्तान में अब तक 257 मीडिया संस्थान बंद हो चुके हैं, जिसके कारण 70 फीसद मीडियाकर्मी बेरोजगार हो गए हैं।

50 फीसद निजी शिक्षण संस्थानों पर लटके ताले

निजी शिक्षा केंद्र संघ के हवाले से स्थानीय मीडिया ने बताया है कि अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद से देश के 50 फीसद शिक्षण संस्थान बंद हो चुके हैं। संघ प्रमुख सांझर खालिद का कहना है कि इन संस्थानों के पास पर्याप्त संख्या में छात्र ही उपलब्ध नहीं हैं।

भारत में शिक्षा हासिल करने के लिए भेजे गए थे कुछ तालिबानी

आइएएनएस के अनुसार कुछ अहम तालिबानियों को छात्रवृत्ति कार्यक्रम के तहत भारत में शिक्षा हासिल करने के लिए भेजा गया था। वाल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के हवाले से खामा प्रेस ने बताया है कि ऐसे ही तालिबानियों में अहमद वली हकमल भी शामिल थे, जो अब अफगानिस्तान के वित्त मंत्रालय के प्रवक्ता हैं।

कंधार यूनिवर्सिटी में लेक्चरर रहे हकमल को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में मानवाधिकार की पढ़ाई करने के लिए भेजा गया था। लौटने के बाद हकमल को कंधार में तालिबान के लिए भर्तियां करने और प्रचार करने की जिम्मेदारी दी गई थी। रिपोर्ट में बताया गया है कि अब्दुल गनी सरकार के दौरान तालिबान के खुफिया एजेंट विदेशी पोशाक में विभिन्न विभागों और दफ्तरों में सक्रिय थे। इन्होंने काबुल पर कब्जे में तालिबान का सहयोग किया था।

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