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भारतीय मूल की किरण आहूजा ने बढ़ाया भारत का मान, कमला हैरिस के वोट ने बाइडन को किया चिंता मुक्‍त

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वाशिंगटन। भारतीय मूल की किरण आहूजा को आफिस आफ पर्सनल मैनेजमेंट प्रमुख के पद पर नियुक्ति को सीनेट ने मंजूरी दे दी है। उनकी नियुक्ति के लिए उपराष्ट्रपति कमला हैरिस को वोटिंग में भाग लेना पड़ा। किरण आहूजा को राष्ट्रपति जो बाइडन ने नामित किया था।

किरण आहूजा की नियुक्ति के लिए सीनेट की मंजूरी दिए जाने के दौरान वोटिंग में समर्थन और विरोध में बराबरी पर पचास-पचास वोट आए, इससे यह मामला पेचीदा हो गया। किसी भी मामले में बराबरी की स्थिति में निर्णायक वोट उपराष्ट्रपति का होता है। उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने अपना वोट किरण आहूजा के समर्थन में देते हुए उनकी नियुक्ति का रास्ता साफ कर दिया।

बीस लाख सिविल सेवा अधिकारियों के प्रबंधन का काम देखेंगी

अमेरिका के बाइडन प्रशासन में लगातार भारतीय मूल के लोगों का दबदबा है। बाइडन प्रशासन में कई भारतीयों को अब तक अहम जगहों पर तैनात किया जा चुका है। अब बाइडन ने एक और भारतवंशी को कार्मिक प्रबंधन कार्यालय का प्रमुख बनाया गया है। किरण आहूजा एक वकील के साथ-साथ एक मानवाधिकार कार्यकर्ता भी हैं। वह अमेरिका के बीस लाख सिविल सेवा अधिकारियों के प्रबंधन के मामलों को देखेंगी। वह इस पद पर नियुक्त होने वाली पहली भारतीय-अमेरिकी महिला बन गईं। जाएंगी। वह पूर्व राष्‍ट्रपति ओबामा प्रशासन में किरण अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुकी हैं। करीब छह वर्षों तक वो एक योजना में कार्यकारी निदेशक थीं।

दो वर्ष तक निदेशक के चीफ ऑफ स्टाफ के रूप में काम का अनुभव

गौरतलब है कि इसके पूर्व किरण 2015 से 2017 तक इसी कार्यालय में निदेशक के चीफ ऑफ स्टाफ के रूप में काम कर चुकी हैं। व्‍हाइट हाउस में काम का उन्‍हें अच्‍छा अनुभव है। उन्हें पब्लिक सर्विस का करीब दस साल का अनुभव है। उन्‍होंने अपना करियर भी न्याय विभाग में बतौर वकील के रूप में शुरू किया था। किरण नागरिक अधिकारों के मामले देखती थीं।

अमेरिका में उनकी छवि तेजतर्रार अधिकारी के तौर पर है। उनके कार्मिक प्रबंधन कार्यालय में प्रमुख के तौर पर तैनाती के बाद माना जा रहा है कि वह ट्रंप की कई नीतियों में बदलाव कर सकती हैं। किरण ने जार्जिया यूनिवर्सिटी से पॉलिटिकल साइंस में डिग्री हासिल करने के बाद कानून की डिग्री हासिल की। अमेरिका के मीडिया ने किरण को तेजतर्रार अधिकारी बताया है।

सीनेट में उपराष्‍ट्रपति कब दे सकता है वोट

दरअसल, अमेरिकी कांग्रेस दो हिस्सों में बंटी हुई है। इसके पहले हिस्‍से को हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव यानी निचला सदन कहते हैं। दूसरे हिस्‍से को सीनेट यानी ऊपरी सदन कहते हैं। अमेरिकी व्‍यवस्‍था में दोनों सदन एक तरह से शक्ति संतुलन का काम करते हैं, यानी अगर सदन का एक पक्ष किसी बात पर अड़ जाए तो दूसरा ढांचा संतुलन बिठाता है।

अगर शक्ति के लिहाज से देखा जाए तो सीनेट के पास फैसले लेने की ताकत काफी ज्यादा होती है। इस समय अमेरिका में 50 राज्‍य हैं। हर राज्‍य से, चाहे उसकी आबादी कितनी ही कम या ज्यादा क्यों न हो, दो प्रतिनिधि चुनकर सदन में आते हैं। यानी सीनेट में कुल मिलाकर 100 सदस्य होते हैं। अमेरिका का यह सदन राज्यों का प्रतिनिधित्‍व करते हैं।

सीनेटरों के रहने की अवधि छह साल है, लेकिन इसका लगभग एक तिहाई हिस्सा एक दो साल के बाद रिटायर हो जाता है और उनकी जगह नए सीनेटर ले लेते हैं। देश का उप-राष्ट्रपति सीनेट का सभापति होता है। वह सदन की अध्यक्षता करता है, लेकिन किसी बहस का हिस्सा नहीं होता। उप-राष्ट्रपति को केवल तभी अपना वोट देने की अनुमति है, जब किसी मामले में सीनेट में वोट बराबर हो जाएं। ऐसे में वो जिस ओर जाता है, वही फैसला अंतिम माना जाता है।

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