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ईशनिंदा के नाम पर पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों से बर्बरता, अंतरराष्ट्रीय कानूनों का हो रहा उल्लंघन

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इस्लामाबाद। पाकिस्तान में दर्ज ईशनिंदा के बढ़ते मामले मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के लिए चिंता का कारण बने हुए हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने बार-बार इस प्रथा का विरोध किया है और यूरोपीय संघ सहित विश्व निकायों से इस मुद्दे पर ध्यान देने का आग्रह किया है। ईशनिंदा ने पाकिस्तान में रहने वाले अल्पसंख्यकों का जीवन बर्बाद कर दिया है।

अधिकार समूहों की कई रिपोर्टों के अनुसार, 1987 से आज तक पाकिस्तान ने लगभग 1600 ईशनिंदा मामले दर्ज किए हैं, जो हिंदुओं, ईसाइयों, शिया और अहमदिया मुसलमानों जैसे धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हैं। पाकिस्तान में बड़ी संख्या में ईशनिंदा के मामले अभी भी न्याय का इंतजार कर रहे हैं।

मुल्तान के बहाउद्दीन जकारिया विश्वविद्यालय के पूर्व व्याख्याता जुनैद हफीज पर ईशनिंदा का आरोप लगाया गया था, जो उन्होंने कभी नहीं किया। ईशनिंदा के आरोप में वजीह-उल-हसन को 18 सालों तक जेल में रहना पड़ा था, जो सितंबर 2019 में निर्दोष साबित हुआ था। पाकिस्तान में चरमपंथी समूहों द्वारा अल्पसंख्यक समूहों के खिलाफ ईशनिंदा का हमेशा दुरुपयोग किया जाता रहा है।

ईशनिंदा पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में एशिया के निदेशक ब्रैड एडम्स का कहना है कि आमतौर पर ईशनिंदा का आरोप धार्मिक अल्पसंख्यकों या अन्य कमजोर समुदायों के सदस्यों पर लगाया जाता है, अपना आमतौर पर अपना बचाव करने में असमर्थ होते हैं।

यूरोपीय संसद (एमईपी) के पूर्व सदस्य और दक्षिण एशिया डेमोक्रेटिक फोरम के संस्थापक और कार्यकारी निदेशक पाउलो कासादा ने कहा, “पाकिस्तान में लोगों पर बिना किसी तथ्य के ईशनिंदा का आरोप लगाया जाता है और अक्सर इन मामलों को लड़ने वाले वकीलों को भी हमले का सामना करना पड़ता है।

29 अप्रैल, 2021 को यूरोपीय संघ ने पाकिस्तान के कठोर ईशनिंदा कानूनों पर चिंता जताई थी। दिसंबर 2020 में यूएस हाउस आफ रिप्रेजेंटेटिव ने एक प्रस्ताव पारित किया था जिसमें दुनिया भर में ईशनिंदा कानूनों को निरस्त करने का आह्वान किया गया था, जिसके परिणामस्वरूप इस्लाम के खिलाफ बोलने के आरोप में कई ईसाइयों को मौत की सजा सुनाई गई थी।

अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता पर संयुक्त राज्य आयोग (USCIRF) 2019 की रिपोर्ट ने इस बात पर प्रकाश डाला कि पाकिस्तान में विभिन्न राजनीतिक दलों और प्रमुख राजनेताओं ने 2018 के राष्ट्रीय चुनावों के दौरान धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ असहिष्णुता को बढ़ावा दिया। रिपोर्ट में आगे बताया गया है कि पाकिस्तान अल्पसंख्यक समूहों की पर्याप्त रूप से रक्षा करने में विफल रहा है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान में ईशनिंदा के लिए वर्तमान में कम से कम 40 लोगों को मौत की सजा या आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है। हिंदू विवाह अधिनियम के पारित होने के बाद भी गैर-मुसलमानों का जबरन धर्म परिवर्तन जारी है। पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, हर साल 1000 लड़के और लड़कियों को इस्लाम में परिवर्तित किया जाता है।

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