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ये कैसी सरकार?

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भारत ने अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार को ‘सरकार’ की मान्यता न देकर उसे मात्र एक ‘व्यवस्था’ बताकर बहुत ही बड़ा संदेश दिया है। भारत का यह रुख बाकी सब देशों पर भी नैतिक दबाव बनाएंगे। अब जो भी देश तालिबान की व्यवस्था को ‘सरकार’ की मान्यता देगा, लोकतंत्र एवं मानवता के प्रति उसकी प्रतिबद्धता संदिग्ध हो जाएगी।


अफगानिस्तान में तालिबान ने सरकार बना ली है। हालाँकि सरकार को वैश्विक स्तर पर मान्यता नहीं मिली है। संयुक्त राष्ट्र से लेकर अन्य राष्ट्रों के आग्रह के बाद भी तालिबान सुधार के रास्ते पर नहीं है। भले ही तथाकथित प्रगतिशील यह सिद्ध करने में एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हों कि यह बदला/सुधरा हुआ तालिबान है परंतु कबीलाई मानसिकता वाले आदेश जारी करके तालिबान अपना वास्तविक रंग दिखा ही रहा है। अफगानिस्तान में चल रही उठा-पटक का असर भारत पर पडऩा तय है परंतु भारत सच के साथ खड़ा दिखाई दे रहा है। भारत ने अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार को ‘सरकार’ की मान्यता न देकर उसे मात्र एक ‘व्यवस्था बताकर बहुत ही बड़ा संदेश दिया है। भारत का यह रुख बाकी सब देशों पर भी नैतिक दबाव बनाएंगे। अब जो भी देश तालिबान की व्यवस्था को ‘सरकार की मान्यता देगा, लोकतंत्र एवं मानवता के प्रति उसकी प्रतिबद्धता संदिग्ध हो जाएगी।

क्या वास्तव में ऐसी ऐसी व्यवस्था को मान्यता दी जानी चाहिए जो महिलाओं के गुणवत्तापूर्ण जीवन के सभी अधिकार एक-एक करके छीन रही हो? क्या ऐसी व्यवस्था को सरकार की मान्यता दी जा सकती है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय आतंकवादियों को मंत्री बनाया गया हो? विश्व के बड़े एवं प्रभावशाली देशों को यदि किसी को मान्यता देनी ही है तब उन्हें अफगानिस्तान के उन नागरिकों को मान्यता देनी चाहिए जो तालिबान के अत्याचार के विरुद्ध अपना सीना तानकर खड़े हो गए हैं। उनके तालिबान के आतंकियों का कोई भय नहीं। उन्हें कबिलाई शासन व्यवस्था नहीं, आधुनिक और मानवीय मूल्यों से युक्त लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था चाहिए। तालिबान के सामने खड़े होने वाले नागरिकों का साहस हिमालय के समान है।

जरा सोचिए कि अमेरिका से आधुनिक हथियार एवं प्रशिक्षण प्राप्त अफगानिस्तान की जिस फौज ने तालिबान के सामने बिना लड़े ही हथियार डाल दिए हों, उसी तालिबान की क्रूरताओं का अंदाज होने के बाद भी कुछ महिलाएं एवं पुरुष निर्भय होकर उसके सामने खड़े हो गए। दुनिया के सभी देशों को अफगानिस्तान के इसी प्रकार के निर्भय लोगों का सहयोग एवं समर्थन करना चाहिए।

अमेरिका 20 वर्ष में भी अफगानिस्तान का वातावरण नहीं बदल सका, उसका कारण यही है कि उसने स्वतंत्र एवं आधुनिक सोच का संरक्षण एवं संवर्धन नहीं किया। अफगानिस्तान के नागरिक समाज की सोच बदलने के प्रयास हुए होते तो आज तालिबान लौट ही नहीं पाता। बहरहाल, लोकतंत्र के प्रति आस्था रखने वाले किसी भी देश को वर्तमान परिस्थितियों में तालिबान की सरकार को मान्यता नहीं देनी चाहिए।

या तो तालिबान को फिर से हटाने की सामूहिक रणनीति बनाएं या फिर भारत की अध्यक्षता में संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद ने जिस प्रकार के आग्रह तालिबान के सामने रखे हैं, उनका अनुसरण करने के लिए तालिबान पर दबाव बनाया जाए। साथ ही तालिबान पर इस बात के लिए भी दबाव बनाया जाए कि वह सत्ता में कम से कम ऐसे लोगों को शामिल नहीं करे, जो घोषित आतंकवादी हैं। हालाँकि दुनिया के सामने सबसे बेहतर विकल्प पहला ही है।

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