पाकिस्तान में हिंसक उठा-पटक

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पाकिस्तान की राजनीति अपने कर्मों का फल भोग रही है। सत्ता से हटने के बाद पूर्व प्रधानमंत्रियों के साथ वहाँ किस तरह का बर्ताव होता रहा है, यह इतिहास में दर्ज है। पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान पर हुआ जानलेवा हमला भी उसी हिंसक वर्चस्व की राजनीति का परिणाम है। इमरान खान पर यह हमला किसने कराया, क्यों कराया, इसका कितना सच सामने आ पाएगा, यह कहना कठिन है। पाकिस्तान में स्थिति यह है कि मौत के मुंह में जाने से बचे इमरान खान की प्रेसवार्ता एवं उनके भाषणों को वहाँ की मीडिया में दिखाने पर सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया है। भले ही हमलावर पकड़ा गया हो और वह यह स्वीकार कर रहा हो कि उसने इमरान खान को मारने के लिए हमला इसलिए किया क्योंकि वह उनके झूठे दावों से नाराज था, लेकिन कोई भी इस कहानी पर विश्वास करने को तैयार नहीं है। पाकिस्तान के अंदर और बाहर बहुत सारे लोग मान रहे हैं कि कहीं न कहीं हमले के पीछे सत्ता में बैठे ताकतवर लोगों का हाथ है। इसकी सबसे बड़ी वजह तो यह है कि पाकिस्तान में ऐसी साजिशों और हमलों का पुराना इतिहास रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की हत्या इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है जिसमें सेना और आईएसआई का हाथ होने की बात पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने भी कही थी। उल्लेखनीय है कि इमरान खान पिछले कुछ समय से पाकिस्तान के सत्ता प्रतिष्ठान, खासकर सेना की आंख की किरकिरी बने हुए हैं। पद से हटाए जाने के बाद से इमरान की लोकप्रियता आश्चर्यजनक ढंग से बढ़ी है। इसके सबूत उनकी सभाओं और रैलियों में जुट रही जबर्दस्त भीड़ के ही रूप में नहीं, उपचुनावों में उनकी पार्टी को मिलने वाली सीटों की संख्या में भी दिखे हैं। लोकप्रियता की इस लहर पर सवार इमरान खान वहां सरकार पर जल्दी चुनाव के लिए दबाव बढ़ाते जा रहे थे, जिसकी अनदेखी करना उसके लिए संभव नहीं रह गया था। जल्दी चुनाव की यह मांग शाहबाज शरीफ की अगुवाई वाली मौजूदा सरकार के लिए ही नहीं पाकिस्तानी सेना और इसके चीफ कमर जावेद बाजवा के लिए भी चिंताजनक है क्योंकि निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में इमरान नए सेना प्रमुख के रूप में कोई प्रतिकूल नाम चुनकर बाजवा की सत्ता पर पकड़ समाप्त कर सकते हैं। देखना होगा कि इस जानलेवा हमले का कितना लाभ इमरान खान और उनकी पार्टी को मिलेगा? यदि इमरान खान हमले के बाद से उपजी सहानुभूति की लहर पर सवार होकर पाकिस्तान की सत्ता पर फिर से काबिज होने में सफल रहते हैं, तब उन्हें यह विचार अवश्यक करना चाहिए कि जानलेवा हमले के लिए वह स्वयं कितने जिम्मेदार हैं? पाकिस्तान की जनता ने इमरान खान को इस भरोसे के साथ जनादेश दिया था कि वह बदहाल देश की तस्वीर बदलेंगे और नया पाकिस्तान बनाएंगे। परंतु सत्ता पाते ही इमरान खान सब वादे भूल गए। वे भी अन्य नेताओं की भाँति कट्‌टरपंथी गिरोहों और सेना के हाथ में खेलने लगे। भारत विरोध को ही उन्होंने पाकिस्तान की राजनीति की नियती मान लिया। उनके पास बेहतर करने का अवसर था, जिसे उन्होंने गंवा दिया था। सत्ता के लिए इस हिंसक वर्चस्व की प्रवृत्ति को रोकना है, तब पाकिस्तान के नेताओं को लोकतांत्रिक मूल्यों एवं व्यवस्था को मजबूत करने के प्रयास करने चाहिए। अन्यथा पाकिस्तान की फौज और कट्‌टरपंथी ताकतें मिलकर लोकतंत्र को कुचलती रहेंगी।

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