वीर सावरकर की तपिश

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सावरकर भी गांधीजी के प्रति श्रद्धा रखते थे और उन्हें महात्माजी कहकर संबोधित करते थे। इतिहास को निष्पक्ष और निर्दोष दृष्टि से देखेंगे तो अतार्किक बहसों में पड़ेंगे और न ही महापुरुषों को संकीर्ण दृष्टि से देखने का अपराध करेंगे।

स्वातंत्र्यवीर सावरकर का उल्लेख जैसे ही आता है, कांग्रेस और कम्युनिस्ट जैसे राजनीतिक दलों एवं उनके सहयोगी बुद्धिजीवियों को कष्ट होने लगता है। वीर सावरकर के प्रखर विचारों की तपिश ऐसी है कि अभारतीय विचारधारा में पढ़े-लिखे लोगों को जलन होना स्वाभाविक है। वीर सावरकर पर लिखी गयी पुस्तक के विमोचन समारोह में जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि महात्मा गांधीजी के कहने पर सावरकर जी ने कालापानी से बाहर आने के लिए दया याचिका लगाई थी, तो उनके इस कथन के बाद से ही तथ्यों को अस्वीकार कर एक अनावश्यक वितंडावाद शुरू हो गया। रक्षा मंत्री ने जो कहा वह सब प्रमाणित है।

अच्छी बात यह है कि स्वयं महात्मा गांधीजी ने इसे कहा और लिखा है। महात्मा गांधीजी ने अपने समाचार पत्र ‘यंग इंडिया में 26 मई, 1920 को ‘सावरकर बंधु शीर्षक से लेख लिखा है। यह लेख उन सब लोगों को पढऩा चाहिए, जो क्रांतिवीर सावरकर पर तथाकथित ‘क्षमादान याचना का आरोप लगाते हैं। इस लेख में हम तथाकथित ‘माफीनामे प्रसंग को विस्तार से समझ पाएंगे और यह भी जान पाएंगे कि स्वयं महात्मा गांधीजी सावरकर बंधुओं की मुक्ति के लिए कितने आग्रही थे? सावरकर बंधुओं के साथ हो रहे अन्याय पर भी महात्माजी ने प्रश्न उठाया है। इस टिप्पणी में महात्मा गांधी ने उस ‘शाही घोषणा को भी उद्धृत किया है, जिसके अंतर्गत उस समय अनेक राजनीतिक बंदियों को रिहा किया जा रहा था। वे लिखते हैं कि ”भारत सरकार और प्रांतीय सरकारों ने इस संबंध में जो कार्रवाई की उसके परिणामस्वरूप उस समय कारावास भोग रहे बहुत लोगों को राजानुकम्पा का लाभ प्राप्त हुआ है। लेकिन कुछ प्रमुख ‘राजनीतिक अपराधी अब भी नहीं छोड़े गए हैं। इन्हीं लोगों में मैं सावरकर बंधुओं की गणना करता हूँ।

वे उसी माने में राजनीतिक अपराधी हैं, जिस माने में वे लोग हैं, जिन्हें पंजाब सरकार ने मुक्त कर दिया है। किंतु इस घोषणा (शाही घोषणा) के प्रकाशन के आज पाँच महीने बाद भी इन दोनों भाइयों को छोड़ा नहीं गया है। इस टिप्पणी से स्पष्ट है कि महात्मा गांधी यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि अंग्रेज सरकार जल्द से जल्द सावरकर बंधुओं को स्वतंत्र करे। सावरकर बंधुओं के प्रकरण में अपनायी जा रही दोहरी नीति को उन्होंने अपने पत्र के माध्यम से जनता के बीच उजागर कर दिया। महात्मा गांधी अपने आलेख में तर्कों से इस सिद्ध कर रहे थे कि ब्रिटिश सरकार के पास ऐसा कोई कारण नहीं कि वह अब सावरकर बंधुओं को कैद में रखे। महात्मा गांधी अधिवक्ता थे। सावरकर बंधुओं पर लगाई गईं सभी कानूनी धाराओं का उल्लेख और अन्य मामलों के साथ तुलना करते हुए गांधीजी ने स्वातंत्र्यवीर सावरकर बंधुओं का पक्ष मजबूती के साथ रखा है।

इसके साथ ही गांधीजी ने ‘यंगइण्डिया में ही 18 मई, 1921 को एक और लेख लिखा है, जिसमें उन्होंने न केवल सावरकर को भारतमाता का सपूत, बहादुर और देशभक्त बताया है बल्कि देश की जनता से आग्रह भी किया है कि सावरकर बंधुओं की मुक्ति के लिए प्रयास किए जाएं। जब सावरकर कालापानी से बाहर आकर रत्नागिरी में नजरबंद थे, तब स्वयं महात्माजी मिलने भी गए। जब सावरकर के भाई का निधन हुआ तब भी गांधीजी ने पत्र लिखा। सावरकर भी गांधीजी के प्रति श्रद्धा रखते थे और उन्हें ‘महात्माजी कहकर संबोधित करते थे। इतिहास को निष्पक्ष और निर्दोष दृष्टि से देखेंगे तो हम न तो अतार्किक बहसों में पड़ेंगे और न ही महापुरुषों को संकीर्ण दृष्टि से देखने का अपराध करेंगे।

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