श्रद्धा की नृशंस हत्या को चेतावनी मानें

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आफताब ने जिस नृशंसता से श्रद्धा की हत्या की है, उसकी कल्पना करना भी कठिन है। एक लड़की जो अपना परिवार, रिश्तेदार, धर्म-संस्कृति छोड़कर उसके साथ रहने आई, आफताब ने उसके ही 35 टुकड़े करके हत्या कर दी। मानव शरीर के 35 टुकड़े करने वाले को मनुष्य तो कम से कम नहीं ही कहा जा सकता। चिंता की बात यह है कि यह पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी इस तरह की घटनाएं हमारे सामने आ चुकी हैं, जिनमें घर-परिवार से लड़कर मुस्लिम संप्रदाय के लड़के से शादी करनेवाली लड़कियों की नृशंसता से हत्याएं की गई हैं। किसी को मारकर सूटकेस में भरकर फेंका गया है तो किसी को अन्य प्रकार से ठिकाने लगाने का प्रयास किया गया है। इन घटनाओं को हमें चेतावनी के तौर पर लेना चाहिए लेकिन हिन्दू समुदाय की युवतियां इस सच्चाई को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। युवतियां प्रेम के जाल में फंसती हैं और फिर अपना जीवन पूरी तरह बर्बाद कर लेती हैं। माता-पिता को भी अब अपने बच्चों से अधिक संवाद करना चाहिए और उन्हें रिश्तों का महत्व एवं उनकी मर्यादा सिखानी चाहिए। घर में इन विषयों पर बात नहीं होने से भी बच्चे गलत रास्ते पर चले जाते हैं। और जब परिजनों को जानकारी लगती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। इतनी देर की बच्चे अपने माता-पिता की कोई बात सुनने के लिए तैयार नहीं होते। श्रद्धा की हत्या के बाद जिस प्रकार से संपूर्ण देश में एक वातावरण बना है, उसके बाद तो कम से कम युवतियों को संभल जाना चाहिए। मुस्लिम लड़का और हिन्दू लड़की के प्रेम प्रसंग में हिन्दू युवतियों की हत्या का एक ट्रेंड जब साफ दिख रहा है तब उस रास्ते पर चलने से बचना ही श्रेयकर है। श्रद्धा को भी उसके माता-पिता एवं अन्य परिजनों ने खूब समझाया था कि यह बेमेल रिश्ता है। हम हिन्दू हैं और वह मुस्लिम है। इस तरह के रिश्ते सफल नहीं होते। लड़कियों को बहुत नुकसान उठाना पड़ता है। परंतु मतिभ्रम का शिकार श्रद्धा ने अपने ही परिवार को छोड़ दिया। जिस परिवार ने बहुत लाड़-प्यार से उसका लालन-पोषण किया था, उससे अधिक भरोसा श्रद्धा को एक नये लड़के आफताब पर हो गया। परिणाम सबके सामने है। तथाकथित सेकुलरों के चक्कर में इस बात को झुठलाने का खामियाजा भी हिन्दू युवतियों को उठाना पड़ रहा है कि लव जेहाद जैसी कोई साजिश नहीं है। लव जेहाद हिन्दूवादियों का एक शिगूफा है। जबकि सत्यता यह है कि केरल के ईसाईयों ने इस साजिश की पहचान सबसे पहले की और केरल उच्च न्यायालय में यह अवधारणा पहली बार आई कि इस तरह के प्रेम संबंधों के पीछे एक सुनियोजित साजिश दिखाई दे रही है, जिसे लव जेहाद कहा जा सकता है। श्रद्धा ने इस सच को स्वीकार किया होता और अपने माता-पिता की बात मानी होती तो निश्चित ही वह आज जीवित होती और अपने सपनों को पूरा करने की ओर आगे बढ़ रही होती। इस घटना के बाद से एक बार फिर तथाकथित सेकुलर बिरादरी की पोल खुल गई है। यह बिरादरी अधूरे सच को आधार बनाकर मुस्लिम उत्पीड़न, महिला और दलित शोषण की बातें करते हैं लेकिन ऐसी नृशंस घटनाओं पर आरोपी की मुस्लिम पहचान को छिपाने का बेशर्म प्रयास करती है। जब तक समस्या को स्वीकार नहीं किया जाएगा, तब तक समाधान मुश्किल है। समस्या पर पर्दा डालने से अच्छा है कि सच सबके सामने रखा जाए, ताकि लोग जागरूक रहें।

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