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समलैंगिक विवाह पर जल्दी में न हो निर्णय

अभारतीय विचारधाराएं भारतीय संस्कृति और सामाजिक व्यवस्थाओं को तोड़ने के लिए समय–समय पर नाना प्रकार के प्रपंच रचती हैं। ऐसे ही प्रपंचों में से एक प्रपंच चल रहा है समलैंगिक विवाह का। भारत के सर्वोच्च न्यायालय तक यह मामला पहुँच गया। न्यायालय ने समलैंगिक विवाह से संबंधित याचिका को स्वीकार कर और उस पर टीका-टिप्पणी करके इस बहस को और बड़ा बना दिया। अच्छी बात यह है कि केंद्र में भारतीय मूल्यों की रक्षा करनेवाली सरकार है, जिसने सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा दाखिल कर समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने का विरोध किया है। यदि सरकार का समर्थन मिल जाता तब भारतीय समाज के सामने एक नयी चुनौती खड़ी हो जाती। इस संदर्भ में विश्व हिन्दू परिषद की ओर से जारी किया गया वक्तव्य बहुत महत्वपूर्ण है। विहिप ने इस विषय के सभी पहलुओं पर प्रकाश डाला है और न्यायालय से आग्रह किया है कि इस संबंध में जल्दबाजी निर्णय लेना समाज के लिए घातक होगा और अनेक प्रकार की विसंगतियों को जन्म देगा। यदि न्यायालय ने किसी दबाव में समलैंगिक विवाह को मान्यता दे दी तो कानून से संबंधित अंतहीन विवाद पैदा हो जाएंगे, जो न्यायालय के लिए ही बहुत बड़ी चुनौती बन जाएगी। यह ऐसा विषय है, जिस पर समाज के प्रबुद्ध नागरिकों, धर्मगुरुओं, चिकित्सा क्षेत्र के विद्वानों, समाज विज्ञानियों एवं शिक्षाविदों के सुझाव लेने चाहिए। उल्लेखनीय है कि भारतीय परंपरा में विवाह एक संस्कार है और उसका एक पवित्र उद्देश्य है। जबकि समलैंगिक विवाह की माँग के पीछे न तो संस्कार पक्ष है और न ही उसका कोई पवित्र उद्देश्य है। इसलिए संत समाज की ओर से भी इसका प्रतिरोध किया जा रहा है। कुछ लोग कुतर्क करते हुए भारतीय इतिहास से कुछेक उदाहरण देकर समलैंगिक विवाह को सही ठहराने का प्रयास कर रहे हैं, जबकि ऐसा है नहीं। उन प्रसंगों को समग्रता से देखेंगे, तब ध्यान में आएगा कि वे समलैंगिक विवाह नहीं हैं। जैसे हिन्दू धर्म में भगवान विष्णु और भगवान शिव के स्त्री रूप के मिलन से भगवान अयप्पा का जन्म हुआ था। इसी प्रकार एक श्राप के चलते राजा इल के स्त्री रूप में परिवर्तित होने के बाद ही उनका विवाह बुध से हुआ, लेकिन किसी देवी का अन्य देवी या फिर किसी देवता का किसी अन्य देवता के साथ विवाह का कोई जिक्र नहीं मिलता है। स्पष्ट है कि पौराणिक कथाओं में स्त्री श्रापवश या किसी अन्य कारण से स्त्री से पुरुष होने का प्रसंग तो मिलता है, लेकिन किसी पुरुष का पुरुष से या फिर स्त्री का स्त्री से विवाह होने का कोई भी जिक्र नहीं मिलता है। काशी विद्वत् परिषद् के महामंत्री प्रो. रामनारायण द्विवेदी के अनुसार हिंदू धर्म के किसी भी पवित्र ग्रंथ में समलैंगिक विवाह को स्वीकृति प्रदान नहीं की गई है। यह बिल्कुल भी शास्त्र सम्मत नहीं है, यही कारण है कि हमारे ऋषि-मुनियों ने न तो इसकी अनुमति दी और न ही कहीं इसका उल्लेख किया है। इस बहस में एक ओर बात ध्यान देनेवाली है कि समलैंगिक विवाह के पक्ष में नगण्य लोग हैं, जबकि केन्द्र सरकार और साधु-संन्यासियों से लेकर भारत का आम समाज तक इसके विरोध में खड़ा है। भारत के लगभग सभी लोगों का मानना है कि समलैंगिक विवाह समाज में कुरीति पैदा करने वाली परंपरा है। ऐसे विवाह की कोई सामाजिक उपयोगिता भी नहीं है। भारत की परंपरा को देखेंगे तो पाएंगे कि असुरों के बीच भी समलैंगिक विवाह की व्यवस्था नहीं थी। यानी जिन्हें हम सब प्रकार की बुराइयों का प्रतीक मानते हैं, ऐसे असुर भी इस अवगुण से मुक्त थे। कुल मिलाकर कहना यही है कि इस अनैतिक कार्य को न तो मान्यता देना चाहिए और न ही होने देना चाहिए क्योंकि यह मानसिक विकृति है। ऐसे में किसी भी व्यक्ति की मानसिक समस्या को भूलकर भी सामाजिक समस्या में नहीं बदलने देना चाहिए। और यदि न्यायालय फिर भी इस मुद्दे पर आगे बढ़ना चाहता है तब उसे सबसे पहले इसके विभिन्न पक्षों तथा उनके परिणामों का गहनता के साथ अध्ययन कराना चाहिए।

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