हंगामा खड़ा करना ही मकसद

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देश के प्रबुद्ध वर्ग और जनप्रतिनिधियों से अपेक्षा की जाती है कि देशहित से जुड़े मुद्दों पर समाधान निकालने के लिए साझा प्रयास करें। परंतु, कृषि सुधार कानूनों के संबंध में पहले दिन से यह देखने में आया कि देश के तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग और विपक्षी राजनीतिक दलों का उद्देश्य सिर्फ हंगामा खड़ा ही रहा। कृषि क्षेत्र और कमजोर आयवर्ग के किसानों की बेहतरी के लिए लाए गए ऐतिहासिक कृषि कानूनों पर अतार्किक आंदोलन को हवा देने में विपक्षी दलों एवं उनके सहयोगी बुद्धिजीवियों ने सहयोग ही नहीं दिया, बल्कि भ्रम फैलाकर मामले को और अधिक बिगाडऩे के प्रयत्न किए। परिणामस्वरूप ऐसी परिस्थितियां बन गईं कि केंद्र सरकार को अपने ऐतिहासिक कृषि कानून वापस लेने पड़ गए।

शीतकालीन सत्र की शुरुआत में पहले ही दिन मोदी सरकार ने गुरु नानक प्रकाश पर्व पर किए अपने वादे को निभाते हुए कृषि कानूनों को वापस ले लिया। जब लोकसभा में कृषि सुधार कानून वापसी विधेयक को पारित किया गया तब विपक्षी राजनीतिक दलों के सांसदों ने जमकर हंगामा किया। जबकि हंगामे की आवश्यकता ही नहीं थी। सरकार तो कानून वापस ही ले रही थी, फिर हंगामा किसलिए? सबसे दु:खद स्थितियां तो राज्यसभा जैसे सदन में देखने को मिल रही हैं। राज्यसभा को प्रबुद्ध सदन कहा जाता है। यह संसद का उच्च सदन है।

राजनीतिक दल राज्यसभा में ऐसे प्रतिनिधियों को भेजती है, जो जननेता नहीं होते लेकिन विभिन्न विषयों के जानकार होते हैं। उन्हें सदन में भेजा इसलिए जाता है ताकि उनकी बौद्धिक क्षमता का लाभ देश को मिले। पिछली चार-पाँच बार से इस सदन के सदस्य जिस प्रकार का व्यवहार कर रहे हैं, उससे लगता नहीं कि ये उच्च सदन के प्रतिनिधि हैं। हो-हल्ला करने में राज्यसभा के सदस्य लोकसभा के सदस्यों को भी पीछे छोड़ रहे हैं।

शीतकालीन सत्र के पहले ही दिन राज्यसभा में जिस प्रकार से हंगामा किया गया, उससे स्पष्ट हो गया है कि हंगामा खड़ा करना ही विपक्षी दलों का एकमात्र मकसद है। उन्हें संसदीय लोकतंत्र की कतई चिंता नहीं है। उधर, किसानों की आड़ लेकर नेतागिरी कर रहे राकेश टिकैत और उनके सहयोग भी समाधान नहीं चाहते। इसलिए कृषि सुधार कानून वापस होने के बाद भी कथित आंदोलन समाप्त करके घर नहीं लौट रहे बल्कि नयी माँगों को लेकर फिर से सड़क घेरकर बैठ गए हैं।

टिकैत तो बेशर्मी से भरे दिखाई दे रहे हैं। एक बार फिर गणतंत्र दिवस पर चार हजार ट्रैक्टर लेकर हुड़दंग करने की धमकी जैसी उन्होंने दी है। यह रवैया लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं। इस प्रकार की अराजक ताकतों का यथाशीघ्र उपचार आवश्यक है।

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