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लोकतंत्र के लिए खतरा बना तालिबान

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भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने शंघाई को-ऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन (एससीओ) की विदेश मंत्रियों की बैठक में अफगानिस्तान को लेकर कोई सर्वमान्य नीति निकालने की जरूरत बताई। अब तक अफगानिस्तान में शांति स्थापना के जितने प्रयास हुए हैं, उन सबमें पाकिस्तान शामिल रहा है। इस बीच, वह तालिबान लड़ाकों का समर्थन भी करता रहा है।

अफगानिस्तान में तालिबान का बढ़ता हुआ कब्जा न केवल वहां की अशरफ गनी सरकार और स्वतंत्र सोच वाली जनता के साथ ही लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास रखने वाले दुनियाभर के लोगों के लिए चिंता की बात है। भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने शंघाई को-ऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन (एससीओ) की विदेश मंत्रियों की बैठक में अफगानिस्तान को लेकर कोई सर्वमान्य नीति निकालने की जरूरत बताई।

अब तक अफगानिस्तान में शांति स्थापना के जितने प्रयास हुए हैं, उन सबमें पाकिस्तान शामिल रहा है। इस बीच, वह तालिबान लड़ाकों का समर्थन भी करता रहा है। जानकारी के अनुसार न केवल पाकिस्तानी सेना के वरिष्ठ और अनुभवी अधिकारी तालिबानियों का मार्गदर्शन कर रहे हैं बल्कि लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे अनेक पाकिस्तानी आतंकवादी संगठन भी तालिबान को सहयोग कर रहे हैं। तालिबान ने अगर हेरात में सलमा बांध पर मोर्टार से हमला किया तो उसे इसी संदर्भ में देखना होगा।

सलमा बांध को आधिकारिक तौर पर ‘अफगान-भारत मित्रता बांध’ कहा जाता है। इस बांध के लिए पैसा भारत ने लगाया था। इससे अभी 42 मेगावॉट बिजली पैदा होती है और लगभग 75 हजार एकड़ जमीन की सिंचाई भी। माना जाता है कि भारत और अफगानिस्तान की इस दोस्ती के प्रतीक को पाकिस्तान पसंद नहीं करता और वह तालिबानों से इस पर हमला करवा रहा है। 2017 में भी इस बांध पर तालिबान विद्रोहियों ने हमला किया था।

अफगानिस्तान में भारत की ओर भी परियोजनाएं चल रही हैं, जिनको पाकिस्तान के इशारे पर तालीबानी निशाना बना रहे हैं। ऐसे में यह बात आसानी से समझी जा सकती है कि तालिबान और अफगान सरकार के बीच सुलह करा कर बीच की कोई राह निकालने में पाकिस्तान की कितनी दिलचस्पी होगी। चीन, रूस और ईरान जैसे आसपास के देश भी तालिबान के साथ अपने स्तर पर बातचीत कर रहे हैं।

इनके अपने हित सध गए तो ये तालिबान की राह रोकने की जहमत मोल नहीं लेंगे। और, जैसे कि संकेत हैं कम से कम शुरुआती दौर में, समूचे देश पर पूरी तरह कब्जा होने तक तालिबान इन देशों को आश्वस्त करने में नहीं हिचकेंगे। मगर सवाल शुरुआती दौर का नहीं है। एक बार सत्ता पर काबिज हो जाने के बाद क्या तालिबान अपनी धार्मिक कट्टरपंथी सोच से तौबा कर लेंगे?

अगर नहीं तो वे दुनियाभर में इसे फैलाने के घोषित-अघोषित लक्ष्य को किसी न किसी रूप में पूरा करने की कोशिश करेंगे। यही वह बिंदु है, जहां से अफगानिस्तान के वैश्विक आतंक का नया केंद्र बनकर उभरने का खतरा है। यही वजह है कि अमेरिका में ऐसी आवाजें अभी से उठने लगी हैं कि जल्दबाजी में सैन्य वापसी का अमेरिकी राष्ट्रपति जो. बाइडन का निर्णय सब पर भारी पड़ सकता है और यही वजह है कि अन्य देशों को भी तात्कालिक, संकीर्ण हितों से ऊपर उठकर अफगानिस्तान में शांति के साथ-साथ लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना पर जोर देना चाहिए।

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