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चीन की घेराबंदी

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ब्रिटेन में सम्पन्न हुई जी-७ समिट के दौरान इस समूह के सदस्य देशों ने न केवल कोरोना महामारी के लिए बल्कि अन्य मुद्दों पर भी चीन को घेरने का प्रयास किया है। यह इस बात के संकेत हैं कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय में अब चीन के विरोध में एक वातावरण बन रहा है। जी-७ के देशों ने कोरोना वायरस की उत्पत्ति का पता लगाने के लिए नये सिरे से जाँच एवं अध्ययन करने की माँग की है।

वायरस कोविड-१९ जनित कोरोना महामारी को लेकर चीन पर न केवल आरोप लगते रहे हैं, बल्कि इस संबंध में गोपनीय एवं शोधपूर्ण दस्तावेज भी सामने आ रहे हैं, जो चीन को कठघरे में खड़ा करने के लिए पर्याप्त हैं। चीन अपने आचरण के कारण भी दुनिया के निशाने पर आने लगा है। ब्रिटेन में सम्पन्न हुई जी-७ समिट के दौरान इस समूह के सदस्य देशों ने न केवल कोरोना महामारी के लिए बल्कि अन्य मुद्दों पर भी चीन को घेरने का प्रयास किया है। यह इस बात के संकेत हैं कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय में अब चीन के विरोध में एक वातावरण बन रहा है। जी-७ के देशों ने कोरोना वायरस की उत्पत्ति का पता लगाने के लिए नये सिरे से जाँच एवं अध्ययन करने की माँग की है।

उल्लेखनीय है कि इसमें चीन की भूमिका को लेकर पहले भी जाँच की गई थी और विश्व स्वास्थ्य संगठन की टीम चीन भेजी गई थी लेकिन उसे पूरा डेटा नहीं दिया गया था। इसलिए भी यह संदेह और अधिक गहरा गया है कि चीन ने अपनी बायोलैब में कोरोना वायरस को एक जैविक हथियार के रूप में विकसित किया है। कोरोना संक्रमण की उत्पत्ति का पता लगाना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि तब ही इस महामारी से स्थायी तौर पर निजात पाई जा सकती है। इसके साथ यह भी पता लगाना चाहिए कि चीन ने और दूसरे जैविक हथियार तो विकसित नहीं कर लिए हैं।

साम्यवादी चीन अब दुनिया के लिए एक खतरा बनता जा रहा है। इसका उदाहरण है कि भारत के साथ एक वर्ष से चल रहा टकराव। चीन और भारत के बीच अच्छे संबंध बन रहे थे लेकिन अंतरराष्ट्रीय पटल पर भारत के बढ़ते प्रभाव को चीन पचा नहीं सका और अच्छे-भले संबंधों को उसकी विस्तारवादी मानसिकता ने रसातल में पहुँचा दिया। चीन के ही बुद्धिजीवी ने अपनी सरकार को सलाह दी है कि उसे भारत के साथ स्थायी शत्रुता की ओर नहीं बढऩा चाहिए। वरना इसका बहुत बड़ा नुकसान चीन को उठाना पड़ सकता है।

जी-७ समिट के संबंध में चीनी सरकार के भोंपू ग्लोबल टाइम्स ने जिस प्रकार की टिप्पणी की है, उससे भी उसकी अंहकारवादी सोच जाहिर होती है। बहरहाल, जी-७ समिट में चीन को मानवाधिकारों के उल्लंघन के लिए भी घेरा गया। दुनिया की सात बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का समूह जब यह कहे कि चीन को शिनजियांग में मानवाधिकारों का सम्मान करना चाहिए, हॉन्ग-कॉन्ग को ज्यादा स्वायत्ता देनी चाहिए और दक्षिण चीन सागर में सुरक्षा को नुकसान पहुंचाने से बचना चाहिए, तब यह चीन के लिए गंभीर मामला हो जाता है।

माना कि जी-७ समूह चीन को यह सब करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। चीन भी जी-७ के परामर्श को मानने के लिए किसी भी प्रकार से बाध्य नहीं है। लेकिन जी-७ में चीन को लेकर जो कुछ चिंताएं व्यक्त की गईं, उनका असर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन के प्रतिकूल जा सकता है। चीन को अंहकार का भाव छोड़कर आत्मावलोकन करना चाहिए।

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