भारत निर्माण में मातृशक्ति की भूमिका

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आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है। यह दिन पश्चिम से आया है, जहाँ महिलाओं की अनदेखी लंबे समय से होती रही है। उनकी सामाजिक और राजनीतिक भागीदारी अत्यंत सीमित रही। कुछ वर्षों पूर्व तक यूरोप में महिलाओं को मतदान का अधिकार नहीं था। जो देश आज विकसित, प्रगतिशील और खुली संस्कृति के माने जाते हैं, वहाँ भी २०वीं सदी में जाकर महिलाओं को मताधिकार प्राप्त हुआ। अरब के देशों की बात करना बेमानी होगा, वहाँ तो अभी तक महिलाएं बिना पुरुष के घर से बाहर निकलने, कार चलाने और काम करने के अधिकार माँगती रही हैं। अमेरिका का लोकतंत्र सबसे पुराना है। अमेरिका को अधिक प्रगतिशील और खुली सोच का देश माना जाता है, लेकिन आपको जानकर हैरत होगी कि यहाँ १९२० में महिलाओं को मत देने का अधिकार प्राप्त हुआ। इसका अर्थ हुआ कि अमेरिका में महिलाओं को वोट देने का अधिकार पाने के लिए १४४ वर्ष तक प्रतीक्षा करनी पड़ी। इससे पहले अपना जनप्रतिनिधि और अपनी सरकार चुनने में महिलाओं की सहभागिता शून्य थी। इसी तरह रूस में १९१७, जर्मनी और ब्रिटेन में १९१८ तथा फ्रांस में बहुत बाद में वर्ष १९४४ में महिलाओं को लोकतंत्र में अपनी सहभागिता का अधिकार प्राप्त हुआ। स्विट्जरलैंड में तो वर्ष १९७४ तक महिलाओं को वोट डालने के लिए इंतजार करना पड़ा। जबकि स्वतंत्र भारत में पहले दिन से महिलाओं को मताधिकार दिया गया। वह अपने मन की सरकार चुन सकें, इस बात का ध्यान भारत का संविधान बनाने वालों को था। दरअसल, यह भारत की संस्कृति और उसकी परंपराओं में पूर्व से निहित है। भारतीय संस्कृति ने महिला को शक्ति का केंद्र माना, इसलिए यहां नारी सशक्तिकरण के लिए अगल से प्रयास करने की जरूरत कभी नहीं रही। उसे सहधर्मिणी और सहचर माना है। व्यक्तिगत जीवन से लेकर समाज जीवन में से समान अधिकार प्राप्त रहे हैं। हाँ, बाहरी संस्कृतियों के आक्रमण के कारण कालांतर में भारत में भी नारी की गरिमा और उसका स्थान थोड़ा घिसक गया था। सामाजिक एवं राजनीतिक सहभागिता कम हो गई थी, किंतु पूरी तरह समाप्त कभी नहीं हुई। इसलिए यदि कोई यह कहता है कि भारत में महिलाओं की स्थिति बाकी दुनिया से अधिक खराब रही है, तो वह या तो स्वयं भ्रम में है या फिर औरों को भ्रमित करने का प्रयास कर रहा है। अंग्रेजी सरकार के समय तक भारत में महिलाएं सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था संचालन में पूरी स्वतंत्रता के साथ अपना योगदान दे रही थीं। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, इंदौर की उदारमना शासक देवी अहिल्याबाई, गोंडवाना की शासक रानी दुर्गावती, रानी रुद्रम्मा देवी, रानी चेनम्मा और रानी अवंतीबाई जैसे और भी नाम हैं, जिन्होंने सफलतापूर्वक अपने राज्य की सत्ता संभाली। आज जबकि भारत अपनी स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मना रहा है, तब हमें कतई नहीं भूलना चाहिए कि स्वतंत्रता आंदोलन के प्रत्येक स्वरूप में मातृशक्ति की अग्रणी उपस्थिति रही है। आज जब हम अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाएं, तब भारतीय संस्कृति की गौरवशाली परंपरा पर अभिमान अवश्य करें, जिसने मातृशक्ति की भूमिका एवं उसके सामथ्र्य को पहचाना। आज जब हम नये भारत के निर्माण की ओर बढ़ रहे हैं, तब मातृशक्ति की सक्रिय सहभागिता अपेक्षित है।

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