बदजुबानी पर लगे लगाम

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राजनीतिक विरोध की अपनी एक मर्यादा होती है, लेकिन देखने में आता है कि हमारे नेता सार्वजनिक संवाद एवं व्यवहार की सभी मर्यादाओं को तोड़ते रहते हैं। आए दिन विपक्षी दल के नेताओं के लिए बदजुबानी चिंता का कारण बन गई है। क्योंकि जिस तरह का व्यवहार नेता करते हैं, कार्यकर्ता भी उसी व्यवहार का अनुसरण कर उसे समाज में नीचे तक लेकर जाते हैं। इससे समाज में नकारात्मक एवं आपस में द्वेष का वातावरण बनता है। एक ओर कांग्रेस के शीर्ष नेता आरोप लगाते हैं कि भाजपा घृणा की राजनीति करती है लेकिन स्तरहीन एवं घृणा की भावना से ओतप्रोत बयान देने में कांग्रेस के नेता सदा ही आगे रहे हैं। एक बार फिर कांग्रेस की ओर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए आपत्तिजनक भाषा का उपयोग किया गया है। गुजरात विधानसभा चुनाव के लिए घोषणा-पत्र जारी करने के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मधुसूदन मिस्त्री ने प्रधानमंत्री मोदी को लक्षित करते हुए कहा है कि वे गुजरात चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी को उनकी ‘औकात’ दिखाएंगे। मिस्त्री का यह बयान कांग्रेस की उस परंपरा से मेल खाता है जिसमें उसके नेता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का अपमान करने के लिए आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करते हैं। कांग्रेस के नेता भी यह जानते हैं और राजनीतिक विश्लेषक भी यह मानते हैं कि प्रधानमंत्री के लिए की जानेवाली आपत्तिजनक टिप्पणियों से कांग्रेस को भारी नुकसान होता है। इसके बाद भी चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस की ओर से इस प्रकार के बयान आना, क्या साबित करता है? क्या कांग्रेस के नेता अपनी पार्टी के नुकसान के प्रति बेपरवाह हैं या फिर शीर्ष नेतृत्व को खुश करने के लिए पार्टी का नुकसान भी उन्हें स्वीकार है? या फिर प्रधानमंत्री मोदी के प्रति घृणा का एक वातावरण कांग्रेस में बन गया है, जिसका असर उसके वरिष्ठ नेताओं की जुबान पर भी दिखता है? इस बात की पूरी उम्मीद है कि मिस्त्री के इस बयान की भारी कीमत गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस चुकाएगी। दुर्भाग्यजनक एवं चिंताजनक स्थिति यह है कि विपक्षी दल के नेता प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति जैसे संवैधानिक एवं सम्मानित पदों का भी सम्मान नहीं कर रहे हैं। अपनी घृणा एवं संकीर्ण मानसिकता के चलते संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों पर व्यक्तिगत हमले कर रहे हैं। यह सभी मानते हैं कि लोकतंत्र में कोई भी पद आलोचना से परे नहीं होना चाहिए। स्वस्थ आलोचना का स्वागत है लेकिन बदजुबानी का नहीं। देश में पहली बार अनुसूचित जनजाति समुदाय की महिला द्रोपदी मुर्मू राष्ट्रपति जैसे देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद को सुशोभित कर रही हैं। उनका स्वागत करने की जगह पहले दिन से विपक्षी दल उन पर व्यक्तिगत कटाक्ष कर रहे हैं। राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू के संबंध में टिप्पणी करते समय ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं पश्चिम बंगाल के मंत्री अखिल गिरि ने तो सब प्रकार की मर्यादाएं ही लांघ दीं। उन्होंने न केवल घटिया टिप्पणी की अपितु शारीरिक हाव-भाव का भी भोंडा प्रदर्शन किया। एक महिला नेता होने के नाते ममता बनर्जी को अखिल गिरि की इस बदतमीजी को कतई बर्दाश्त नहीं करना चाहिए था। अनुसूचित जनजाति की नेता एवं राष्ट्रपति मुर्मू के प्रति घृणित भावना का प्रदर्शन करने पर गिरि को न केवल मंत्री पद से हटा देना चाहिए अपितु उन्हें पार्टी से भी अविलंब बाहर का रास्ता दिखाना चाहिए। परंतु प्रतीत होता है कि ममता बनर्जी ऐसा कोई निर्णय नहीं लेंगी। इस प्रकार की बदजुबानियों को रोकना है, तब सभी पार्टियों को कठोर कार्रवाई करनी होंगी। भारतीय राजनीति में इस प्रकार की मानसिकता को पनपने से रोकना आवश्यक है।

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