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तेल की कीमतें साधने की तैयारी

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तेल और गैस की बढ़ती कीमतों से परेशान दुनिया के प्रमुख तेल उपभोक्ता देशों ने पूरे तालमेल के साथ अपने भंडार से तेल की आपूर्ति बढ़ाने का निर्णय लिया है। इस नवाचारी पहल का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों को नीचे लाना है। ध्यान रहे, पिछले लगभग एक वर्ष में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में 50 प्रतिशत से अधिक बढ़ोतरी हो चुकी है।

पिछले महीने यह तीन वर्ष के शिखर 86 डॉलर प्रति बैरल को भी पार कर गया था। भारत और अमेरिका समेत तमाम तेल उपभोक्ता देश तेल निर्यातक देशों के समूह ओपेक (ऑर्गनाइजेशन ऑफ पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज) से बार-बार तेल उत्पादन में मांग के अनुरूप बढ़ोतरी लाने का आग्रह कर रहे हैं, लेकिन वह इस पर ध्यान नहीं दे रहा है। ऐसे में अमेरिका, चीन, भारत, जापान, साउथ कोरिया और ब्रिटेन जैसे देशों ने अपने भंडारों से तेल की आपूर्ति बढ़ाने का निर्णय लिया है। गौर करने की बात है कि कोरोना महामारी के उथल-पुथल भरे इस दौर में ऊर्जा बाजार को असाधारण उतार-चढ़ावों से गुजरना पड़ा।

लॉकडाउन जैसे कदमों के प्रभाव में एक समय उत्पादन संबंधी गतिविधियां ठप पडऩे से तेल की मांग में अभूतपूर्व कमी आ गई थी। उसके बाद धीरे-धीरे हालात बदले। लेकिन अब जब मांग महामारी से पहले के स्तर पर पहुंच रही है, तेल की आपूर्ति उस अनुपात में नहीं बढ़ रही, जिससे न केवल इन देशों में पेट्रोल और गैस के भाव आसमान छू रहे हैं बल्कि आम लोगों को कई अन्य समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। भारत में भी बेलगाम हो रही पेट्रोल की कीमतों को कुछ हद तक नियंत्रित करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों ने अपने करों में कटौती की। दरअसल, तेल की ऊंची कीमतें न केवल महंगाई बढ़ा रही हैं बल्कि इस वजह से आर्थिक रिकवरी में भी मुश्किल हो रही है।

अपने रिजर्व से तेल निकाल कर ओपेक देशों को उपयुक्त संदेश देने का यह निर्णय इसी मजबूरी से निकला है। हालांकि चाहे भारत के 3.8 करोड़ बैरल के भंडार में से 50 लाख बैरल निकालने की बात हो या अमेरिका के 60 करोड़ बैरल के भंडार में से 5 करोड़ बैरल निकालने की, यह मात्रा इतनी कम है कि इसका कोई और अर्थ नहीं लिया जा सकता। निश्चित रूप से यह एक सांकेतिक कदम है। अब देखने वाली बात यह है कि ओपेक देश इसे किस रूप में लेते हैं। उनकी अगली बैठक 2 दिसंबर को होनी है जिसमें वे जनवरी के लिए अपनी उत्पादन योजना को अंतिम रूप देंगे।

उम्मीद की जानी चाहिए कि ओपेक तेल उपभोक्ता देशों के इस कदम को सही संदर्भों में लेते हुए इस पर सकारात्मक ढंग से समाधान की ओर बढ़ेंगे। बहरहाल, आम जनता के लिए संतोष की बात है कि वर्तमान सरकार ने सक्रियता से व्यावहारिक पहल करते हुए रणनीतिक तेल भंडारण की व्यवस्था की। कूटनीतिक और रणनीतिक दृष्टि से भी इस संबंध में भारत तेल उत्पादक और तेल आयातक देशों से बेहतर तालमेल बैठा पाने की स्थिति में है।

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