शिक्षा में राजनीति

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पश्चिम बंगाल सरकार ने उच्च शिक्षा के बारे में जो फैसला किया है, वह राज्य के लिए तो हितकारी नहीं ही है, यदि अन्य राज्य इसे दोहराने लगे तो देश के विश्वविद्यालयों के वातावरण को भी प्रभावित करेगा। ममता बैनर्जी की सरकार ने तय किया है कि राज्य के सभी विश्वविद्यालयों में कुलपति की नियुक्ति की जिम्मेदारी राज्यपाल के हाथों से लेकर राज्य सरकार को सौंप दी जाए। सरकार इस आशय का एक विधेयक आगामी विधानसभा सत्र में लाने जा रही है। अभी राज्यपाल राज्य के 17 विश्वविद्यालयों के कुलपति/ कुलाधिपति हैं। वे इनके उपकुलपति/ कुलपति की नियुक्ति करते हैं, इनके कामकाज की समीक्षा करते हैं और समय-समय पर दिशा-निर्देश देते हैं। यद्यपि राज्यपाल विश्वविद्यालयों के मामले में पूरी तरह स्वतंत्र नहीं होता। राज्य सरकार का उच्च शिक्षा विभाग उसकी सहायता करता है तो उसका कामकाज में हस्तक्षेप भी रहता है किंतु इस मामले में बहुत हद तक राज्यपाल के विवेक के प्रयोग का संवैधानिक शिष्टाचार भी निभाया जाता है। राज्यपाल राज्य सरकार के फैसलों को विश्वविद्यालय के हित में रोक देता है तो सरकारें उसे मान्य करती हैं। यह संवैधानिक व्यवस्था राज्यों की उच्च शिक्षा को दो मार्गदर्शी स्तंभों के बीच सुचारू रूप से संचालित करती रही है। किंतु ममता बैनर्जी ने राज्यपाल जगदीप धनखड़ के खिलाफ जो मोर्चा खोला हुआ है, उसमें वे राज्यपाल नाम की संस्था पर ही प्रहार कर रही हैं। उनके और राज्यपाल के बीच पिछले दिनों काफी अप्रिय प्रसंग सामने आ चुके हैं। इस मामले में वे सामान्य राजनीतिक और संवैधानिक शिष्टाचार को भी धता बताने में नहीं चूकतीं। संघीय व्यवस्था में ऐसे विवाद केन्द्र-राज्य संबंधों में कड़वाहट घोलते हैं और लोकतंत्र को कमजोर करते हैं। ममता बैनर्जी ने उच्च शिक्षा के मामले में नया मोर्चा खोला है। पिछली जनवरी में ही राज्य सरकार ने 25 विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति कर दी थी। सरकार का कहना था कि राज्यपाल ने सर्च कमेटी द्वारा चयन के बावजूद नियुक्तियों को रोक रखा था और ऐसे में सरकार को ये पद भरने का अधिकार है। सरकार की दलील है कि क्यों हमें एक उपनिवेशवादी कानून को ढोना चाहिए। यह एक अलग बहस हो सकती है। बहस तो राज्यपाल के पद के अस्तित्व को लेकर भी होती है किंतु इस बहस की चलते उसके अधिकारों का अतिक्रमण करने की इजाजत नहीं मिल जाती और न ही यह बहस संवैधानिक शिष्टाचार को ताक में रखने की अनुमति देती। भले ही यह अंगरेजों के जमाने की परंपराएं हों, कम से कम इनसे उच्च शिक्षा क्षेत्र में एक साफ-सुथरे और कम से कम राजनीतिक फैसलों की उम्मीद तो बनी रहती है। बहरहाल, ममता बैनजी इस संबंध में जो विधेयक लाएंगी, वह भी इन्हीं राज्यपाल के हस्ताक्षर से मंजूर होगा, लिहाजा दुर्भाग्य से, विवादों का पिटारा अभी बंद नहीं होना।

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