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भारत-अमेरिका की दोस्ती का नया दौर

अमेरिका में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का जिस तरह स्वागत हो रहा है, वह वैश्विक पटल पर भारत की बढ़ती साख का साक्षी है। विश्व के प्रमुख लोगों ने उत्साहित होकर प्रधानमंत्री मोदी के साथ मुलाकात कीं। टेस्ला एवं ट्वीटर के प्रमुख एलन मस्क ने तो यहाँ तक कह दिया कि प्रधानमंत्री मोदी अपने देश भारत को आगे ले जाने के लिए जिस प्रकार प्रयासरत हैं, वह प्रशंसनीय है। मैं प्रधानमंत्री मोदी का बड़ा प्रशंसक हूँ। देश की प्रगति के लिए प्रतिबद्धता एवं लगन के कारण प्रधानमंत्री मोदी को मिली वैश्विक लोकप्रियता का लाभ भारत को भरपूर मिल रहा है। बहरहाल, नरेन्द्र मोदी 2014 के बाद से बतौर प्रधानमंत्री छह बार अमेरिका जा चुके हैं, लेकिन इस यात्रा को उनकी पिछली सभी यात्राओं से अधिक महत्व दिया जा रहा है। इसके पीछे अनेक महत्वपूर्ण कारण हैं। पहली बात तो यही कि यह पहला अवसर है, जब प्रधानमंत्री अमेरिकी राष्ट्रपति जो. बाइडन के आमंत्रण पर वहां जा रहे हैं। अमेरिका में उनकी यह पहली राजकीय यात्रा है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में उनसे पहले सिर्फ दो नेता ऐसे रहे, जो अमेरिका की राजकीय यात्रा पर गए हैं। वर्ष 1963 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन और 2009 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह। स्पष्ट है कि अगर अमेरिका ने आज के वातावरण में प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा को इतना अधिक महत्व देने का निर्णय लिया तो वह अकारण नहीं है। ऐसी कूटनीतिक पहल काफी सोच-समझकर तय की जाती है। इस संदर्भ में देखें तो इसमें कोई शक नहीं कि भारत और अमेरिका के रिश्ते नई ऊंचाइयां छूने की ओर हैं। पहले की तरह अब इसमें विश्वास का कोई संकट नहीं रह गया है। जिन समझौतों पर दोनों पक्षों में सहमति बन चुकी है और जिन पर हस्ताक्षर की औपचारिकता इस दौरे में पूरी होनी है, वे न केवल दोनों देशों के लिए लाभदायक हैं बल्कि द्विपक्षीय रिश्तों के नए चरण की शुरुआत के भी साक्षी बनेंगे। खासकर जीई 414 फाइटर जेट इंजन भारत में बनाने का समझौता और अमेरिकी ड्रोन खरीदने का समझौता। ये सौदे दोनों देशों के बीच रक्षा संबंधों को मजबूत आधार देंगे और अमेरिका में यह उम्मीद बन रही है कि इससे हथियारों के मामले में भारत की रूस पर निर्भरता कम करने में भी मदद मिलेगी। यूक्रेन युद्ध के मामले में भारत की स्वतंत्र भूमिका अमेरिका को शुरू से खटकती रही है। उसकी कोशिश रही है कि भारत खुलकर रूस की निंदा करे। अच्छी बात यह है कि दोनों देश एक दूसरे की स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए आपसी सहयोग बढ़ाने की राह पर चल रहे हैं। इसलिए आगे भी इसमें कोई बाधा आने के आसार नहीं हैं। एक अन्य पहलू चीन का है, जिसकी बढ़ती आक्रामकता ने दोनों देशों में चिंता पैदा की है। क्वॉड से लेकर अन्य मंचों पर भारत और अमेरिका आपसी तालमेल कायम रखते हुए इस साझा चुनौती का मुकाबला कर रहे हैं। यह समीकरण भी इस सोच को मजबूती दे रहा है कि अगर भारत और अमेरिका एक-दूसरे के साथ सहयोग करें तो कई मामलों में चीन से आपूर्ति पर निर्भरता कम की जा सकती है। खास तौर पर कोरोना महामारी के बाद के दौर में लोकतांत्रिक और उदार मूल्यों के साथ जी रहे देशों में यह जरूरत तीव्रता से महसूस की जा रही है। उम्मीद है कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय हालात में प्रधानमंत्री मोदी का यह दौरा न सिर्फ द्विपक्षीय मामलों में सहयोग बढ़ाएगा बल्कि पूरी दुनिया को सकारात्मक संदेश देने वाला सिद्ध होगा।

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