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आंदोलन या राजनीति

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सत्य तो यही है कि यह आंदोलन बिचौलियों और आढ़तियों के हितों एवं विपक्षी राजनीतिक दलों के राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए जबरन चलाया जा रहा है। प्रारंभ में जनता की सहानुभूति इस आंदोलन को प्राप्त हुई थी लेकिन गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में हुए अराजक एवं हिंसक प्रदर्शन के बाद इसने उस सहानुभूति को खो दिया।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने एक भाषण में स्वार्थों की पूर्ति के लिए आंदोलन का सहारा लेने वालों को आंदोलनजीवी की संज्ञा दी थी। कथित किसान आंदोलन में राकेश टिकैट जैसे नेता इस बात को सही सिद्ध कर रहे हैं। एक ओर वे कहते हैं कि उनके आंदोलन का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं। वहीं, दूसरी ओर वे चुनावी राज्यों में जाकर भारतीय जनता पार्टी के विरुद्ध प्रचार करते हैं। अब उन्हें इस बात से भी पीड़ा है कि असदुद्दीन ओवैसी उत्तरप्रदेश में चुनाव क्यों लड़ रहे हैं? चूँकि असदुद्दीन ओवैसी मुस्लिम राजनीति के लिए विवादित हैं और वे दूसरे राजनीतिक दलों के मुस्लिम वोटबैंक में सेंध लगा देते हैं। इसलिए राकेश टिकैत को कष्ट हो रहा है।

उन्होंने ओवैसी को अन्य राजनीतिक दलों के नेताओं की तरह भाजपा का सहयोगी कहा है। स्पष्ट है कि ओवैसी किसान आंदोलन की आड़ में राजनीति खेल रहे हैं। अन्यथा किसी किसान नेता को ओवैसी के चुनाव लडऩे या नहीं लडऩे से क्या फर्क पड़ता? उनकी इस राजनीतिक समझ से यह भी स्पष्ट होता है कि विभिन्न चुनावों में उनकी जमानत क्यों जब्त हुई। अगर ओवैसी मुस्लिम वोट काटकर भाजपा को लाभ पहुँचाने का सामथ्र्य रखते तब बंगाल के चुनाव में भाजपा नजदीकी मुकाबलों में हारती नहीं। आंकड़े देखें तो बंगाल में ओवैसी की पार्टी को मुसलमानों का वोट उस तरह नहीं मिला, जैसा वातावरण बनाया जाता है। वैसे भी मुस्लिम मतदाताओं के संबंध में अनेक शोध कहते हैं कि यह वर्ग रणनीतिक मतदान करता है।

बहरहाल, यह आंदोलन अब आम लोगों के लिए भी परेशानी का कारण बन चुका है। यह बात पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह भी समझ गए हैं। इसलिए उन्होंने आंदोलनजीवियों से कहा है कि वे अपने आंदोलन को पंजाब से समेटकर उत्तरप्रदेश या हरियाणा में ले जाएं। यहाँ अमरिंदर सिंह से भी पूछा जाना चाहिए कि उत्तरप्रदेश और हरियाणा के लोग क्यों जिद्दी लोगों की भीड़ को झेलें। अगर आंदोलन सही माँगों को लेकर हो रहा है तब कांग्रेस शासित राज्य को उनका साथ देना चाहिए। सत्य तो यही है कि यह आंदोलन बिचौलियों और आढ़तियों के हितों एवं विपक्षी राजनीतिक दलों के राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए जबरन चलाया जा रहा है।

प्रारंभ में जनता की सहानुभूति इस आंदोलन को प्राप्त हुई थी लेकिन गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में हुए अराजक एवं हिंसक प्रदर्शन के बाद इसने उस सहानुभूति को खो दिया। उसके बाद आंदोलन स्थल पर युवती के साथ दुव्र्यवहार एवं अन्य आपराधिक गतिविधियों ने तो रहा-सहा सद्भाव भी समाप्त कर लिया। बहरहाल, आज की स्थिति में देश के जिम्मेदार नागरिक राजनीति प्रेरित आंदोलन का मतलब बखूबी समझते हैं।

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